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1 Feb 2025
“अब स्नेह और सहयोग की रूपरेखा स्टेज पर लाओ, हर एक को गुण और शक्तियों की गिफ्ट दो''
1 February 2025 · हिंदी
मधुबन अव्यक्त बापदादा ओम् शान्ति 15-12-2005
परमप्यारे अव्यक्त मूर्त मात-पिता बापदादा के अति लाडले, सदा परमात्म प्यार में समाये हुए, नि:स्वार्थ प्यार का अनुभव करने वाले सदा साथी और सहयोगी सर्व निमित्त टीचर्स बहिनें तथा देश विदेश के सर्व ब्राह्मण कुल भूषण भाई बहिनें, ईश्वरीय स्नेह सम्पन्न मधुर याद स्वीकार करना जी।
बाद समाचार - सभी परमात्म प्यार में लवलीन बाबा के बच्चे, सदा रमणीक जीवन का अनुभव करते हुए आगे बढ़ते रहते हैं। बाबा कहते बच्चे, ब्राह्मण जीवन का जीयदान ही परमात्म प्यार है। अगर इस प्यार की कमी है तो यह जीवन सूखा है, रमणीकता का अनुभव नहीं होता। परमात्म प्यार जीवन में सदा साथ भी देता और साथी बन सदा सहयोगी भी बनता है। जहाँ प्यार है, साथ है, वहाँ सब कुछ बहुत सहज और सरल हो जाता है।
देखो, ब्रह्मा बाप ने अपने ऊपर अटेन्शन रखा, मेहनत नहीं की। बच्चों को अभी तक संस्कार परिवर्तन करने में मेहनत का अनुभव होता है क्योंकि लवली तो बने हैं लेकिन लवलीन नहीं रहते। बापदादा हर बच्चे की जन्मपत्री को जानते हैं, हर एक बच्चे को एक द्वारा एक जैसी पढ़ाई मिलती, एक जैसी पालना मिलती, एक जैसे वरदान मिलते फिर भी कोई फर्स्ट नम्बर हैं तो कोई लास्ट नम्बर। बापदादा किसी भी बच्चे के अवगुण, कमजोरी संकल्प में भी नहीं रखते, सभी लाडले, सिकीलधे हैं, इसी दृष्टि और वृत्ति से देखते हैं, इसी वृत्ति और श्रेष्ठ दृष्टि से कमजोर भी महावीर बन जाता है।
बाप और दादा दोनों के समान संस्कार सदा हर आत्मा के प्रति उदारचित के रहे हैं, बापदादा हर आत्मा के प्रति स्नेह और सम्मान स्वरूप में सहयोगी रहे हैं। तो ऐसे ही आप बच्चे भी हर आत्मा के प्रति सदा सहयोगी बनो। कोई सहयोग दे तो सहयोगी बनो, नहीं। स्नेह दे तो स्नेही बनो, नहीं। जैसे ब्रह्मा बाप हर बच्चे के प्रति सहयोगी, स्नेही बनें, ऐसे सर्व के सदा स्नेही और सहयोगी बनो, इसको ही कहते हैं समान बनना। बोलो, अभी ऐसी समान स्थिति का अनुभव होता है ना!
अव्यक्त-वतनवासी बाबा हम सभी बच्चों को कितनी प्यार की पालना दे रहे हैं। रोज़ अनेक वरदानों से सजाते हैं। बापदादा की सभी बच्चों के प्रति यही आश हैं कि मेरे बच्चे समान और सम्पन्न बनें और साथ में उड़कर अपने घर चलें। मुक्ति का गेट खुले। अभी सबको ऐसी ही तैयारी करनी है।
देखो, इस समय सेवा का टर्न गुजरात ज़ोन का है। काफी संख्या में बाबा के बच्चे पहुंचे हुए हैं। विदेश के भाई बहिनों की भी बहुत अच्छी रिमझिम है। विदेश सेवाओं के सभी निमित्त भाई बहनें पूरे वर्ष के लिए सेवा और स्व-उन्नति के प्रोग्राम बनाते हैं, विशेष मीटिंग्स चलती हैं, साथ-साथ गहन योग तपस्या भी करते हैं। यह फरवरी और मार्च दो मास डबल विदेशी भाई बहिनों की मधुबन घर में रौनक रहती है। अच्छा - सभी को बहुत-बहुत याद... ओम् शान्ति।
01-02-25 ओम् शान्ति “अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज-वीडियो-15-12-05 मधुबन
आज परमात्म बाप अपने चारों ओर के परमात्म प्यार के अधिकारी बच्चों को देख रहे हैं। यह परमात्म प्यार विश्व में कोटों में से कोई को प्राप्त होता है। यह परमात्म प्यार नि:स्वार्थ प्यार है क्योंकि एक परमात्मा पिता ही निराकार, निरहंकारी है। मनुष्य आत्मा शरीरधारी होने के कारण कोई न कोई स्वार्थ में आ ही जाती है। परमात्म बाप ही अपने बच्चों को ऐसा नि:स्वार्थ प्यार देते हैं। परमात्म प्यार ब्राह्मण जीवन का विशेष आधार है। ब्राह्मण जीवन का जीयदान है। अगर ब्राह्मण जीवन में परमात्म प्यार का अनुभव कम है, तो प्यार के बिना जीवन रमणीक नहीं, सूखा जीवन हो जाता है। परमात्म प्यार ही जीवन में सदा साथ भी देता और साथी बन सदा सहयोगी रहता। जहाँ प्यार है, साथ है, वहाँ सब कुछ बहुत सहज और सरल हो जाता है। मेहनत का अनुभव नहीं होता है। ऐसा अनुभव है ना! परमात्म प्यारे कोई भी व्यक्ति वा साधनों की आकर्षण में नहीं आ सकते क्योंकि परमात्म आकर्षण, परमात्म प्यार ऐसा अनुभव कराता जो सदा प्यार के कारण लवलीन रहते हैं, जिसको लोगों ने परमात्मा में लीन होना समझ लिया है। परमात्मा में लीन नहीं होता लेकिन परमात्म प्यार में लवलीन हो जाता है।
बापदादा चारों ओर के बच्चों को देखते हैं - परमात्म प्यारे तो सभी बने हैं लेकिन एक हैं लवली बच्चे, दूसरे हैं लवलीन बच्चे। तो अपने आपसे पूछो लवली तो सभी हैं, लेकिन लवलीन कहाँ तक रहते हैं? लवलीन बच्चों की निशानी है वह सदा परमात्म फरमान में सहज चलते हैं। फरमान में भी रहते और देहभान से कुर्बान भी रहते हैं क्योंकि प्यार में कुर्बान होना मुश्किल नहीं है। सबसे पहला फरमान है - योगी भव, पवित्र भव। बाप का बच्चों से प्यार होने के कारण बाप बच्चों को मेहनत करते देख नहीं सकते क्योंकि बाप जानते हैं 63 जन्म बहुत मेहनत की, अभी यह अलौकिक जन्म मेहनत से मुक्त हो अतीन्द्रिय सुख की मौज मनाने का है। तो मौज मना रहे हो कि मेहनत करनी पड़ती है? प्यार में फरमान पर चलना मेहनत नहीं लगती। अगर मेहनत करनी पड़ती है तो प्यार की परसेन्टेज कम है। कहाँ न कहाँ प्यार में कुछ न कुछ लीकेज है। दो बातों की लीकेज मेहनत कराती है - एक पुराने संसार की आकर्षण, संसार में सम्बन्ध, पदार्थ सब आ जाता है। और दूसरा - पुराने संस्कार की आकर्षण। यह पुराना संसार और पुराने संस्कार अपने तरफ आकर्षित कर देते हैं तो परमात्म प्यार में परसेन्टेज हो जाती है। चेक करो - इन दोनों लीकेज से मुक्त हैं? याद करो आप आत्मा के अनादि संस्कार और आदि संस्कार क्या थे और अभी अन्त के ब्राह्मण जीवन के संस्कार क्या हैं? अनादि भी हैं, आदि भी हैं और अन्त में भी श्रेष्ठ संस्कार हैं। यह पुराने संस्कार मध्य के हैं, न अनादि हैं, न आदि हैं, न अन्त के हैं। लेकिन सभी का लक्ष्य क्या है? किसी भी बच्चे से पूछो तो एक ही उत्तर देते हैं - लक्ष्य है बाप समान बनने का। यही है ना! है तो हाथ उठाओ। यही लक्ष्य है पक्का? या बीच-बीच में बदली हो जाता है?
तो बाप बच्चों से पूछते हैं कि बाप और दादा दोनों के समान संस्कार कौन से हैं? सदा बाप हर आत्मा के प्रति उदारचित रहे हैं। हर आत्मा के प्रति स्नेह और सम्मान स्वरूप में सहयोगी रहे हैं। ऐसे स्वयं भी अपने को हर आत्मा के प्रति सहयोगी अनुभव करते हो? सहयोग दे तो सहयोगी बनें, नहीं। स्नेह दे तो स्नेही बनें, नहीं। जैसे ब्रह्मा बाप हर बच्चे के प्रति सहयोगी बनें, स्नेही बनें, ऐसे सर्व के सदा स्नेही और सहयोगी, इसको कहा जाता है समान बनना। अगर कोई भी बच्चे को संस्कार परिवर्तन करने में मेहनत करनी पड़ती है तो उसका कारण क्या है? ब्रह्मा बाप ने अपने ऊपर अटेन्शन रखा लेकिन मेहनत नहीं की। संस्कार परिवर्तन में मेहनत का कारण है - लवली बने हैं, लवलीन नहीं बने हैं।
बापदादा तो हर बच्चे को लवली बच्चे समझते हैं, जानते भी हैं, जन्मपत्री हर एक की जानते हैं फिर भी क्या कहेंगे? लवली हैं। बापदादा हर बच्चे को एक ही पढ़ाई, एक ही पालना, एक ही वरदान सदा देते हैं। चाहे जानते भी हैं कि यह लास्ट नम्बर है फिर भी बापदादा किसी भी बच्चे का अवगुण, कमजोरी संकल्प में भी नहीं रखते। लाडला है, सिकीलधा है, मीठा-मीठा है.... इसी दृष्टि और वृत्ति से देखते क्योंकि बापदादा जानते हैं इसी वृत्ति और श्रेष्ठ दृष्टि से कमजोर महावीर बन जायेगा। ऐसे ही अपने श्रेष्ठ वृत्ति और शुभ भावना, शुभ कामना द्वारा किसी का भी परिवर्तन कर सकते हो। जब आपने चैलेन्ज किया है कि प्रकृति को भी परिवर्तन करके दिखायेंगे तो क्या आत्माओं का परिवर्तन नहीं कर सकते! प्रकृतिजीत बनते हो तो आत्मा, आत्मा की श्रेष्ठ भावना से, कल्याण की कामना से परिवर्तन नहीं कर सकते हो!
तो नये वर्ष में सर्व बेहद के ब्राह्मण परिवार के बीच एक दो के प्रति अपने शुभ भावना, श्रेष्ठ कामना द्वारा हरेक एक दो के परिवर्तन करने में सहयोगी बनो, चाहे कमजोर है, जानते हो इसके संस्कार में यह कमजोरी है लेकिन आप स्नेह और सहयोग की शक्ति द्वारा सहयोगी बनो। एक दो को सहयोग का हाथ मिलाओ। इस सहयोग के हाथ मिलाने का दृश्य ऐसा बन जायेगा जैसे हाथ में हाथ स्नेह का मिलाना, सहयोग का मिलाना, माला बन जाये। शिक्षा नहीं दो, स्नेह भरा सहयोग दो। न्यारा नहीं बनो, किनारा नहीं करो, सहारा बनो क्योंकि आपका यादगार विजयमाला है। हर एक मणका, मणके के साथी सहयोगी है तब माला का चित्र बना है।
अब सन्देश-वाहकों के सहयोग और स्नेह की रूपरेखा स्टेज पर लाओ। महादानी बनो, अपने गुणों का सहयोगी बनो, बनाओ। ऐसे अपने गुणों का, हैं तो परमात्म गुण लेकिन जो गुण आपने अपने में बनाये है, उस गुण की शक्ति से उन्हों की कमजोरी दूर करो। यह कर सकते हैं? कर सकते हैं या मुश्किल है? टीचर्स बताओ, कर सकते हैं? कर सकते हैं या करना ही है? करना ही है। कोई कमजोर नहीं रहे, क्योंकि कोटों में कोई है ना! चाहे लास्ट दाना भी है, है तो कोटों में कोई। आपका टाइटिल ही है - मास्टर सर्वशक्तिवान। तो सर्वशक्तिवान का कर्तव्य क्या है? शक्ति की लेन-देन करना। बाप द्वारा मिला हुआ गुण आपस में लेन-देन करो। यही सहयोग की गिफ्ट एक दो में दो। अगर कल्याण की भावना रखेंगे तो जैसे भाषण करके वाणी द्वारा सन्देश देते हो ना, वैसे अपने कल्याण की भावना द्वारा, कल्याण की वृत्ति द्वारा, कल्याण के वायुमण्डल द्वारा यह गुणों की गिफ्ट दो, शक्तियों की गिफ्ट दो। कमजोर को सहयोग देना, यह समय पर गिफ्ट देना है, गिरे हुए को गिराओ नहीं, चढ़ाओ, ऊंचा चढ़ाओ। यह ऐसा है, यह ऐसा है..., नहीं। यह प्रभु प्यार के पात्र है, कोटों में कोई आत्मा है, विशेष आत्मा है, विजयी बनने वाली आत्मा है, यह दृष्टि रखो। अभी वृत्ति, दृष्टि, वायुमण्डल चेंज करो। कुछ नवीनता करनी चाहिए ना! कमजोरी देखते, देखो नहीं, उमंग दो, सहयोग दो। ऐसा ब्राह्मण संगठन तैयार करो तो बापदादा विजय की ताली बजायेगा। आप भी बार-बार तालियां बजाते हो ना, बापदादा भी मुबारक हो, बधाई हो, ग्रीटिंग्स हो, उसकी तालियां बजायेगा। आप भी साथ में ताली बजायेंगे ना। अभी ताली बजाई तो अच्छा किया लेकिन विश्व के आगे ताली बजे। सबके मुख से यह आवाज निकले, हमारे ईष्ट आ गये। हमारे पूज्य आ गये। लक्ष्य पक्का है ना! पक्का है लक्ष्य, करना ही है? या देखेंगे, प्लैन बनायेंगे! करना ही है, प्लैन क्या, करना ही है। अभी सभी इन्तजार कर रहे हैं, अभी इन्हों का इन्तजार समाप्त करो। प्रत्यक्ष होने का इन्तजाम करो। देखो प्रकृति भी अभी कितनी तंग हो रही है। तो प्रकृति को भी शान्त बना दो। आप प्रत्यक्ष हो जायेंगे तो विश्व शान्ति स्वत: हो जायेगी। अच्छा। इस बारी भी नये-नये बच्चे बहुत आये हैं। अच्छा है।
गुजरात की ही सेवा है , गुजरात वाले ही मिलन मनाने आये हैं:- गुजरात वाले जो भी हैं, चाहे आये हैं, चाहे सेवा में आये हैं, वह हाथ उठाओ। बहुत हैं, बहुत अच्छा। अच्छा चांस लिया है। गुजरात को बापदादा कहते हैं, सिन्धी में कहावत है जो चुल पर वह दिल पर। तो सबसे नजदीक में नजदीक गुजरात है। जो नजदीक होता है ना, उसको कहा जाता है शडपंद पर (बिल्कुल करीब) है, बुलाओ और पहुंच जाये। तो गुजरात वाले ऐसे एवररेडी है ना - कभी भी बुलायें आ जाओ, तो आ जायेंगे? ऐसे है? परिवार को नहीं देखेंगे क्या करेंगे, आ जायेंगे? एवररेडी हैं। अच्छा है, गुजरात साकार ब्रह्मा की प्रेरणा से स्थापन हुआ है। गुजरात ने गुजरात को निमंत्रण नहीं दिया, ब्रह्मा बाप ने गुजरात को खोला है। तो गुजरात के ऊपर विशेष ब्रह्मा बाप की नज़र पड़ी हुई है।
डबल विदेशी:- डबल विदेशी तो सदा डबल पुरूषार्थ करते होंगे ना! पुराना संसार और पुराने संस्कार का नामनिशान नहीं रहे, यह है डबल पुरुषार्थ। तो ऐसा डबल पुरुषार्थ चल रहा है? चलता है? कांध तो हिलाओ। जिसका अटेन्शन है इस डबल पुरुषार्थ पर वह हाथ उठाओ। अच्छा-फिर तो प्रत्यक्षता विदेश से होगी। डबल पुरुषार्थ करने वालों की विजय प्रत्यक्ष हो जायेगी। बापदादा को खुशी है कि डबल फारेनर्स सेवा और पुरुषार्थ दोनों तरफ अटेन्शन दे आगे बढ़ रहे हैं। बढ़ रहे हैं, इसकी मुबारक है लेकिन आगे इस अटेन्शन में और भी तीव्रता लाओ। अच्छा।
आजकल विश्व में दो बातें विशेष चलती हैं - एक एक्सरसाइज़ और दूसरा भोजन के ऊपर अटेन्शन। तो आप भी यह दोनों बातें करते हो? आपकी एक्सरसाइज कौन सी है? शारीरिक एक्सरसाइज तो सब करते हैं लेकिन मन की एक्सरसाइज अभी-अभी ब्राह्मण, ब्राह्मण सो फरिश्ता और फरिश्ता सो देवता। यह मन्सा ड्रिल का अभ्यास सदा करते रहो। और शुद्ध भोजन, मन का शुद्ध संकल्प। अगर व्यर्थ संकल्प, निगेटिव संकल्प चलता है तो यह मन का अशुद्ध भोजन है। तो मन में सदा शुद्ध संकल्प रहे, दोनों करना आता है ना! जितना समय चाहो उतना समय शुद्ध संकल्प स्वरूप बन जाओ। अच्छा।
चारों ओर के परमात्म प्यार के अधिकारी विशेष आत्माओं को, सदा एक दो के सहयोगी बनने वाले बाप के स्नेही और सहयोगी आत्माओं को, सदा विजयी है और विजय का झण्डा विश्व में फैलाना है, इस लक्ष्य को प्रैक्टिकल में लाने वाले विजयी बच्चों को, सदा इस पुराने संसार और संस्कार के आकर्षण से परे रहने वाले बाप समान बच्चों को दिलाराम बाप का दिल से यादप्यार और नमस्ते।