वरदानिमूर्त - Blessed soul

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20/05/1971“विधाता, वरदाता-पन की स्टेज़”20/09/1971“रूहानी स्नेही बनो”09/10/1971“पॉवरफुल वृत्ति से सर्विस में वृद्धि”01/12/1971“सर्व-शक्तियों के सम्पत्तिवान बनो”15/05/1972“श्रेष्ठ स्थिति बनाने का साधन तीन शब्द - निराकारी, अलंकारी और कल्याणकारी”16/01/1977“सन्तुष्ट आत्मा ही अनेक आत्माओं का इष्ट बन सकती है”03/05/1977“कर्मों की अति गुह्य गति”05/05/1977“वरदानी, महादानी और दानी आत्माओं के लक्षण”16/02/1978“माया और प्रकृति द्वारा सत्कार प्राप्त आत्मा ही सर्वश्रेष्ठ आत्मा है”29/11/1978“सन्तुष्टता से प्रसन्नता और प्रशंसा की प्राप्ति”30/01/1979“सर्व बन्धनों से मुक्ति की युक्ति”28/11/1979“प्रवृत्ति में रहते भी निवृत्ति में कैसे रहें?”23/01/1980“पवित्रता का महत्व”20/01/1981“मन, बुद्धि, संस्कार के अधिकारी ही वरदानी मूर्त”02/10/1981“सदा मिलन के झूले में झूलने का आधार”27/10/1981“दीपावली के शुभ अवसर पर अव्यक्त बापदादा के उच्चारे हुए महावाक्य”17/03/1982“संगमयुग का विशेष वरदान - ‘अमर भव’”08/04/1982“लौकिक, अलौकिक सम्बन्ध का त्याग”09/05/1984“सदा एकरस उड़ने और उड़ाने के गीत गाओ”07/03/1986“पढ़ाई की चारों सब्जेक्ट का यथार्थ यादगार - ‘महा-शिवरात्रि’”23/11/1989“वरदाता को राज़ी करने की सहज विधि”31/12/1993“नये वर्ष में सदा उमंग-उत्साह में उड़ना और सर्व के प्रति महादानी, वरदानी बन व्यर्थ को समाप्त करना”

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