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1 Dec 1971
“सर्व-शक्तियों के सम्पत्तिवान बनो”
1 December 1971 · हिंदी
विदेही, विदेशी बापदादा का बच्चों के समान देह का आधार लेकर, जैसा देश वैसा वेष धारण करना पड़ता है। विदेही को भी स्नेही श्रेष्ठ आत्मायें अपने स्नेह से अपने जैसा बनाने का निमन्त्रण देती हैं। और बाप फिर बच्चों का निमन्त्रण स्वीकार कर मिलने के लिए आते हैं। आज सभी बच्चों को निमन्त्रण देने आये हैं। कौन सा निमन्त्रण, जानते हो? अभी घर जाने के लिए पूरी तैयारी कर ली है वा अभी भी करनी है? अभी तैयारी करेंगे? तैयारी करने में कितना समय लगना है? इस नई फुलवाड़ी को विशेष नवीनता दिखानी चाहिए। ऐसे तो नहीं समझते हो कि हम नये क्या कर सकेंगे? लेकिन सदा यह स्मृति में रखना कि यह पुरुषोत्तम श्रेष्ठ संगमयुग का समय कम होता जाता है। इस थोड़े से संगम के समय को वरदाता द्वारा वरदान मिला हुआ है - कोई भी आत्मा अपने तीव्र पुरुषार्थ से जितना वरदाता से वरदान लेने चाहे उतना ले सकते हैं। इसलिए जो नई-नई फुलवाड़ी सम्मुख बैठी है, सम्मुख आयी हुई फुलवाड़ी को जो चाहें, जैसा चाहें, जितने समय में चाहें वरदाता बाप से वरदान के रूप में वर्सा प्राप्त हो सकता है। इसलिए विशेष बापदादा का इस नई फुलवाड़ी पर, स्नेही आत्माओं पर विशेष स्नेह और सहयोग है। इसी बाप के सहयोग को सहज योग के रूप में धारण करते चलो। यही वरदान थोड़े समय में हाई जम्प दिला सकता है। सिर्फ सदा यही स्मृति में रखो कि मुझ आत्मा का इस ड्रामा के अन्दर विशेष पार्ट है। कौन सा? सर्वशक्तिमान् बाप सहयोगी है। जिसका सहयोगी सर्वशक्तिमान् है तो क्या वह हाईजम्प नहीं दे सकता? सहयोग को सहजयोग बनाओ। योग्य बाप के सहयोगी बनना यही योगयुक्त स्टेज है ना। जो निरन्तर योगी होगा उनका हर संकल्प, शब्द और कर्म बाप की वा अपने राज्य की स्थापना के कर्तव्य में सदा सहयोगी रहने का ही दिखाई देगा, इसको ही ‘ज्ञानी तू आत्मा', ‘योगी तू आत्मा' और सच्चा सेवाधारी कहा जाता है। तो सदा सहयोगी बनना ही सहजयोग है। अगर बुद्धि द्वारा सदा सहयोगी बनने में कारणे-अकारणे मुश्किल अनुभव होता है तो वाचा वा कर्मणा द्वारा भी अपने को सहयोगी बनाया तो योगी हो। ऐसे निरन्तर योगी तो बन सकते हो ना कि यह भी मुश्किल है? मन से नहीं तो तन से, तन से नहीं तो धन से, धन से नहीं तो जो जिसमें सहयोगी बन सकता है उसमें उसको सहयोगी बनना भी एक योग है।
एक होती है अपने में हिम्मत, हिम्मत से सहयोगी बनाना। अगर हिम्मत नहीं है, तन में भी हिम्मत नहीं है, मन में भी नहीं है, धन में भी नहीं है तो क्या करेंगे? ऐसा भी सदा योगी बन सकता है। कोई ऐसे होते हैं जो भले अपनी हिम्मत नहीं होती है लेकिन उल्लास होता है, हौंसला होता है। धन की शक्ति नहीं भी है, मन में कन्ट्रोलिंग पावर नहीं है, व्यर्थ संकल्प जास्ती चलते हैं लेकिन जो कोई बात जीवन के अनुभव में उल्लास और हौंसला दिलाने वाली हो, उसी द्वारा औरों को हौंसला दिलाओ तो औरों को हिम्मत आने से आपको भी हिस्सा मिल जायेगा। इतना तो अवश्य है जो भी आत्मायें आदि से वा अभी आई हुई हैं, उन हर आत्मा को अपने जीवन में कोई प्राप्ति का अनुभव अवश्य है तब तो आये हैं। यही विशेष अनुभव अनेक आत्माओं को उल्लास और हौंसला बढ़ाने के काम में लगा सकते हो। इस धन से कोई वंचित नहीं। जो अपने पास है, जितना भी है उस द्वारा औरों को हिम्मतवान बनाना वा सहयोगी बनाना - यह भी आप के सहयोग की सब्जेक्ट में मार्क्स जमा होगी। अब बताओ योग सहज है वा मुश्किल? निरन्तर योगी बनना मुश्किल है? जो बाप के बन चुके हैं, इसमें तो परसेन्टेज नहीं हैं ना? इसमें तो फुल पास हो ना। जब हैं ही बाप के, तो एक बाप और दूसरा क्या रहा? बाप और आप, बस। तीसरा तो कोई नहीं। बाप में वर्सा तो है ही। तीसरा कुछ है क्या? सिवाय बाप और अपने आप अर्थात् आत्मा (शरीर नहीं) तो आप और बाप ही रह गया, तो दो के मिलने में तीसरी रुकावट ही नहीं तो निरन्तर योगी हुए ना। तीसरा है ही नहीं तो आया फिर कहाँ से? फिर यह तो कभी नहीं कहेंगे कि आ जाता है, आता है तो क्या करें? अब यह भाषा खत्म। सदैव यही सोचो कि हम हैं ही सदा बाप के सहयोगी अर्थात् सहजयोगी। वियोग क्या होता है - इसका जैसे मालूम ही नहीं। जैसे भविष्य में, ‘माया होती भी है' - यह मालूम नहीं होगा, वैसे ही अब की स्टेज रहे। यह बचपन की बातें बीत चुकी। अब तो गेट के सामने आ गये हो। जो जैसे बाप के बच्चे हैं, उसमें कोई परसेन्टेज नहीं होती है। ऐसे ही निरन्तर सहजयोगी वा योगी बनने की स्टेज में भी अब परसेन्टेज खत्म होनी चाहिए। नेचुरल और नेचर हो जानी चाहिए। जैसे कोई की विशेष नेचर होती है, उस नेचर के वश न चाहते भी चलते रहते हैं। कहते हैं ना मेरी नेचर है, चाहती नहीं हूँ लेकिन नेचर है। वैसे निरन्तर सहजयोगी अथवा सहयोगी की नेचर बन जाए। नैचुरल हो जाए। क्या करूँ, कैसे योग लगाऊं - यह बातें खत्म। हैं ही सदा सहयोगी अर्थात् योगी। इसी एक बात को नेचर और नेचुरल करने से भी सब्जेक्ट परफेक्ट हो जायेंगे। परफेक्ट अर्थात् इफेक्ट से परे, डिफेक्ट से भी परे हो जायेंगे। तो आज से सभी निरन्तर सहजयोगी बने वा अभी बनेंगे? जब वरदाता बाप वर्से के साथ वरदान भी देते हैं तो जिनको वर्से का अधिकार भी हो, वरदान भी प्राप्त हो उनके लिए मुश्किल है? अब देखना, कोई आकर कहे कि मुश्किल है तो याद दिलाना - वर्सा और वरदान। बाकी एक कदम रहा हुआ है घर जाने का। अभी तो हर कदम में पदमपति बने हुए हो। इतना वरदान वरदाता द्वारा प्राप्त है। जब हर कदम में पदमपति हो तो कदम व्यर्थ होगा क्या? हर कदम में समर्थ हैं, व्यर्थ नहीं। स्मृति में समर्थी लाओ। साधारणता को समाप्त करो और स्मृति में समर्थी लाते, हर कदम में पदम लाते जाओ तब तो विश्व के मालिक बनेंगे।
अच्छा, आज विशेष फुलवाड़ी के लिए स्नेह से खिंचे-खिंचे आये हैं। छोटों से सदैव अति स्नेह होता है, तो अपने को अति सिकीलधे समझना। अति लाडले हो, तो बाप समान बनकर दिखाना। भाई बहन समान नहीं बनना, बाप समान बनना। जिस स्नेह से बुलाया उसी स्नेह से बाप मुलाकात भी करते और नमस्ते भी करते हैं।
बिना साज के राज समझ सकते हो? ऐसे अभ्यासी बने हो जो राज़ आपके मन में हैं वह राज़ दूसरे को बिना साज के समझा सकते हो? पिछाड़ी की सेवा में तो साज़ समा जायेगा, राज़ को ही समझाना पड़ेगा तो ऐसी प्रैक्टिस करनी चाहिए। जब साइंस बहुत कुछ करके दिखा रही है। तो क्या साइलेन्स में वह शक्ति नहीं है? जितना-जितना स्वयं राजयुक्त, योगयुक्त बनते जायेंगे उतना-उतना औरों को भी बिना साज के राजयुक्त बना सकते हो। इतनी सारी प्रजा कैसे बनायेंगे? इसी स्पीड से इतनी प्रजा बन सकेगी! पिछली प्रजा के ऊपर भी इतनी मेहनत करेंगे? जैसे ठप्पे बने हुए होते हैं तो एक सेकेण्ड में लगाते जाते हैं। वैसे ही एक सेकेण्ड की पावरफुल स्टेज ऐसे रहेगी जो बिगर बोले, बिगर मेहनत करते दैवी घराने की आत्मा का छाप लगा देंगे। यही सर्वशक्तिमान् का गायन है। वरदानी बन एक सेकेण्ड में भक्तों को वरदान देना। वरदान देने में मेहनत नहीं लगती, वर्सा पाने में मेहनत है। वर्सा पाने वाले मेहनत कर रहे हैं। मेहनत ले रहे हैं लेकिन वरदानी मूर्ति जब बन जायेंगे फिर मेहनत लेने वाले न लेंगे न देने वाले मेहनत करेंगे। तो तुम्हारी लास्ट स्टेज है वरदानी मूर्त। जैसे लक्ष्मी के हस्तों से स्थूल धन देते हुए दिखाते हैं। यह तुम्हारा लास्ट शक्ति रूप का है, न कि लक्ष्मी का। शक्ति रूप से सर्वशक्तिमान् का वरदान देते हुए का यह चित्र है। जिसको स्थूल धन के रूप में दिखाते हैं तो ऐसा अपना स्वरूप सदा वरदानी अपने आप को साक्षात्कार होता है? इससे ही समय का अन्दाज़ लगा सकते हो। फिर वरदानी मूर्त शक्तियों के आगे सभी आयेंगे। इसके लिए एक तरफ वरदान का बीज पड़ेगा। तो अपने में सर्व शक्ति जमा करनी है। ऐसे वरदानी मूर्त बनते और बनाते जाओ। आवाज़ से परे जाना है। अच्छा।