“कनेक्शन और करेक्शन के बैलेन्स से कमाल”
टीचर्स को विशेष दो बातों का अटेन्शन रखना चाहिये - वह दो बातें कौन-सी हैं? मधुबन से, बाप के साथ तथा दैवी परिवार के साथ मर्यादापूर्वक कनेक्शन हो। मर्यादापूर्वक कनेक्शन यह है कि जो भी संकल्प व कर्म करते हो, उसके हर समय करेक्शन करने के अभ्यासी हो। दो बातें - एक यथार्थ कनेक्शन और दूसरा हर समय, अपनी हर करेक्शन करने का अटेन्शन, अगर दोनों ही बातों में से एक में भी कमी है तो सफलतामूर्त नहीं बन सकते। करेक्शन करने के लिये सदैव साक्षीपन की स्टेज चाहिये। अगर साक्षी हो करेक्शन नहीं करेंगे तो यथार्थ कनेक्शन रख नहीं सकेंगे। तो यह सदैव चेक करो कि हर समय हर बात में करेक्शन करते हैं? एक है बुद्धि की करेक्शन, जिसको याद की यात्रा कहते हैं, दूसरा है साकार कर्म में आते हुए, साकार परिवार व साकार सम्बन्ध के कनेक्शन में आना, दोनों ही कनेक्शन ठीक हों। साकार में कनेक्शन में आने में मर्यादापूर्वक हैं। जैसे रूहानी परिवार का कनेक्शन रुहानियत के बजाय देह-अभिमान का कनेक्शन है तो वह भी यथार्थ कनेक्शन नहीं हुआ।
जो करेक्शन और कनेक्शन करना जानते हैं, वह सदा रूहानी नशे में होंगे। उनका न्यारेपन और प्यारेपन का बैलेन्स होगा। देखो, सिर्फ बैलेन्स का खेल दिखाने के लिये कितनी कमाई का साधन बना है, वह है सर्कस। बैलेन्स को कमाल के रूप में दिखाते हैं तो यहाँ भी अगर बैलेन्स होगा तो कमाल भी होगा और कमाई भी होगी। अगर जरा भी कम अथवा ज्यादा हो जाता है तो न कमाल होता है, न कमाई। जैसे कोई भी खाने की चीज़ बनाते हैं, अगर उसमें सब चीजों का बैलेन्स न हो तो कितनी भी अच्छी चीज़ हो पर उसमें टेस्ट नहीं आयेगा। तो अपने जीवन को भी श्रेष्ठ और सफल बनाने के लिये बैलेन्स रखो अर्थात् समानता रखो।
दूसरी बात - जैसी समस्या हो, जैसा समय हो, वैसे अपने शक्तिशाली रूप को बना सको। अगर परिस्थिति सामना करने की है, तो सामना करने की शक्ति का स्वरूप हो जाओ। अगर परिस्थिति सहन करने की है, तो सहन शक्ति का स्वरूप हो जाओ - ऐसा अभ्यास हो। टीचर्स माना बैलेन्स। जैसा समय, वैसा स्वरूप धारण करने की शक्ति हो। स्नेह की जगह अगर शक्ति को धारण करते हो और शक्ति की जगह अगर स्नेह को धारण किया तो इसको क्या कहेंगे? अर्थात् जैसा समय, वैसा स्वरूप धारण करने की शक्ति नहीं है। तो सर्विस की रिजल्ट भी नहीं निकलती और सफल भी नहीं होते हैं। अगर नम्बर वन टीचर बनना है तो कोई भी धारणा पहले स्वयं करो, फिर कहो। ऐसे नहीं कि खुद करो नहीं, केवल औरों को कहो। जो दूसरों को डायरेक्शन देते हो, वह पहले स्वयं में देखो कि वह आपमें है! दूसरों को कहो कि सहनशील बनो और खुद न हो तो वह टीचर्स नहीं। टीचर माना शिक्षक अर्थात् शिक्षा देने वाला। अगर स्वयं शिक्षा स्वरूप नहीं तो वह यथार्थ टीचर कहला नहीं सकते। सदैव यह स्लोगन याद रखो - शिक्षक अर्थात् शिक्षा स्वरूप और बैलेन्स रखने वाला। अब क्वॉलिटी की टीचर बनना है। क्वॉन्टिटी पर नज़र न हो। क्वॉलिटी ही सबके कल्याण के निमित्त बन सकती है। तो अब टीचर की क्वॉन्टिटी नहीं बढ़ानी है लेकिन क्वॉलिटी बढ़ानी है। समझा!
सेवाधारी ग्रुप के साथ प्रश्न उत्तर के रूप में पर्सनल मुलाकात
प्रश्न :- सर्व प्वॉइन्ट्स का सार एक शब्द में सुनाओ?
उत्तर :- प्वॉइन्ट्स का सार - प्वाइन्ट्स रूप अर्थात् बिन्दु रूप हो जाना।
प्रश्न :- बिन्दु रूप स्थिति होने से कौन-सी डबल प्राप्ति होती है?
उत्तर :- बिन्दु रूप अर्थात् पॉवरफुल स्टेज जिसमें व्यर्थ संकल्प नहीं चलते हैं और बिन्दु अर्थात् बीती सो बीती। इससे कर्म भी श्रेष्ठ होते हैं और व्यर्थ संकल्प न होने के कारण पुरुषार्थ की गति भी तीव्र होगी। इसलिए बीती सो बीती को सोच-समझ कर करना है। व्यर्थ देखना, सुनना व बोलना सब बन्द। समर्थ आंखें खुली हों अर्थात् साक्षीपन की स्टेज पर रहो।
प्रश्न :- कमल-पुष्प समान न्यारा बनने की युक्ति क्या है?
उत्तर :- कोई की भी कमी देखकर के उनके वातावरण के प्रभाव में न आये, तो इसके लिए उस आत्मा के प्रति रहम की दृष्टि-वृत्ति हो, सामना करने की नहीं अर्थात् यह आत्मा भूल के परवश है, इसका दोष नहीं है, इस संकल्प से उस वातावरण का वा बात का प्रभाव आप आत्मा पर नहीं होगा इसी को कहते हैं कमल-पुष्प समान न्यारा।
प्रश्न :- सफलतामूर्त बनने के लिए क्या करना है?
उत्तर :- बदला नहीं लेना, बल्कि स्वयं को बदलना है। महावीर बनना है, मल्ल-युद्ध नहीं करना है। मल्ल-युद्ध करना माना अगर कोई ने कोई बात कही तो उसके प्रति संकल्प चलने लगे - यह क्या किया, यह क्यों कहा, उसको कहा जाता है मन्सा से व वाचा से मल्ल-युद्ध करना। नमना अर्थात् झुकना। तो जब नमेंगे तब ही नमन योग्य होंगे। ऐसे नहीं समझो कि हम तो सदैव झुकते ही रहते हैं लेकिन हमारा कोई मान नहीं, जो झुकते नहीं व झूठ बोलते हैं उनका ही मान है - नहीं। यह अल्पकाल का है, लेकिन अब दूरान्देशी बुद्धि रखो यहाँ जितनों के आगे झुकेंगे अर्थात नम्रता के गुण को धारण करेंगे तो सारा कल्प ही सर्व आत्मायें मेरे आगे नमन करेंगी। सतयुग त्रेता में राजा के रिगार्ड में, काँध से नहीं लेकिन मन से झुकेंगे और द्वापर, कलियुग में काँध झुकायेंगे। अच्छा।
