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16 Nov 1981
“विजयमाला में नम्बर का आधार”
16 November 1981 · हिंदी
आज बापदादा अपने सिकीलधे श्रेष्ठ आत्माओं से फिर से मिलने आये हैं। याद आता है कि इसी समय, इसी रुप में कितने बार मिले हो? अनेक बार मिलन की स्मृति स्पष्ट रुप में अनुभव में आती है? नॉलेज के आधार पर, चक्र के हिसाब से समझते हो वा अनुभव करते हो? जितना स्पष्ट अनुभव होगा उतना ही श्रेष्ठ वा समीप की आत्मा होंगे। वर्तमान सर्व प्राप्ति और भविष्य श्रेष्ठ प्रालब्ध की अधिकारी आत्मा होंगे। अपने आपको इसी अनुभव के आधार पर जान सकते हो कि मुझ आत्मा का विजयमाला में कौन सा नम्बर है! वर्तमान समय बापदादा भी बच्चों के पुरुषार्थ और प्राप्ति के आधार पर नम्बरवार याद करते अर्थात् माला और यादगार रुप की विजयमाला - जिसको वैजयन्ती माला कहते हैं तो दोनों मालाओं में मेरा नम्बर कौन सा है, यह जानते हो? अपने नम्बर को स्वयं ही जानते हो वा यह कहेंगे कि बापदादा सुनावें? बापदादा तो जानते ही हैं, लेकिन अपने आपको जानते जरुर हो। बाहर से वर्णन करो न करो लेकिन अन्दर तो जानते हो ना? हाँ कहेंगे, वा ना कहेंगे? अभी अगर बापदादा माला निकलवायें तो क्या अपना नम्बर नहीं दे सकते? संकोच वश न सुनाओ वह दूसरी बात है। अगर नहीं जानते तो क्या कहेंगे? औरों को चैलेन्ज करते हो, निश्चय और फखुर से कहते हो कि हम अपने 84 जन्मों की जीवन कहानी जानते हैं, यह कहते हो ना सभी? तो 84 जन्म में यह वर्तमान का जन्म तो सबसे श्रेष्ठ है ना! इसको नहीं जान सकते हो? मैं कौन? इस पहेली को अच्छी तरह से जाना है ना? तो यह भी क्या हुआ? मैं कौन की पहेली जानने का हिसाब बहुत सहज है।
एक है याद की माला, जितना स्नेह और जितना समय आप बाप को याद करते उतना और उसी स्नेह से बाप भी याद करते हैं। तो अपना नम्बर निकाल सकते हो? अगर आधा समय याद रहता और स्नेह भी 50 परसेन्ट का है, वा 75 परसेन्ट का है तो उसी आधार से सोचो 50 परसेन्ट स्नेह और आधा समय याद तो माला में भी आधी माला समाप्त होने के बाद आयेंगे। अगर याद निरन्तर और सम्पूर्ण स्नेह, सिवाए बाप के और कोई नज़र ही नहीं आता, सदा बाप और आप भी कम्बाइण्ड हैं तो माला में भी कम्बाइण्ड दाने के साथ-साथ आप भी कम्बाइण्ड होंगे अर्थात् साथ-साथ मिले हुए होंगे। सदा सब बातों में नम्बरवन होंगे। तो माला में भी नम्बरवन होंगे। जैसे लौकिक पढ़ाई में फर्स्ट डिवीजन, सेकेण्ड, थर्ड होती हैं, वैसे यहाँ भी महारथी, घोड़ेसवार और पैदल तीन डिवीजन हैं।
फर्स्ट डिवीजन - सदा फास्ट अर्थात् उड़ती कला वाले होंगे। हर सेकेण्ड, हर संकल्प में बाप के साथ का, सहयोग का, स्नेह का अनुभव करेंगे। सदा बाप के साथ और हाथ में हाथ की अनुभूति करेंगे। ‘सहयोग दो,' यह नहीं कहेंगे। सदा स्वयं को सम्पन्न अनुभव करेंगे।
सेकेण्ड डिवीजन - चढ़ती कला का अनुभव करेंगे लेकिन उड़ती कला का नहीं। चढ़ती कला में आये हुए विघ्नों को पार करने में कभी ज्यादा, कभी कम समय लगायेंगे। उड़ती कला वाले ऊपर से क्रास करने के कारण ऐसे अनुभव करेंगे जैसे कोई विघ्न आया ही नहीं। विघ्न को विघ्न नहीं लेकिन साइडसीन समझेंगे, रास्ते के नज़ारे हैं। और चढ़ती कला वाले रुकेंगे नहीं लेकिन विघ्न आया और पार किया। विघ्न की अनुभूति करेंगे, विघ्न है यह महसूस करेंगे। इसलिए जरा सा लेसमात्र कभी-कभी पार करने की थकावट वा दिलशिकस्त होने का अनुभव करेंगे।
तीसरी डिवीज़न - उसको तो जान गये होंगे। रुकना, चलना और चिल्लाना। कभी चलेंगे, कभी चिल्लायेंगे। याद की मेहनत में रहेंगे क्योंकि सदा कम्बाइण्ड नहीं रहते। सर्व सम्बन्ध निभाने के प्रयत्न में रहते हैं। पुरुषार्थ में ही सदा लगे रहते हैं। वह प्रयत्न में रहते और वह प्राप्ति में रहते।
तो इससे अभी समझो - “मेरा नम्बर कौन सा?'' माला के आदि में हैं अर्थात् फर्स्ट डिवीजन में हैं वा माला के मध्य में अर्थात् सेकेण्ड डिवीजन में वा माला के अन्त में अर्थात् थर्ड डिवीजन में हैं? तो याद और विजय दोनों के आधार से अपने आपको जान सकते हो। तो जानना सहज है वा मुश्किल है? तो हरेक का नम्बर निकलवायें? निकाल सकेंगे ना?
बापदादा सदा अमृतवेले से बच्चों की माला सिमरण करने शुरु करते हैं। हरेक रत्न की वा मणके की विशेषता देखते हैं। तो अमृतवेले सहज ही अपने आपको भी चेक कर सकते हो। याद की शक्ति से, सम्बन्ध की शक्ति से, स्पष्ट रुहानी टी.वी. में देख सकते हो कि बापदादा किस नम्बर में मुझे सिमरण कर रहे हैं। उसके लिए विशेष बात - बुद्धि की लाइन बहुत क्लीयर चाहिए। नहीं तो स्पष्ट नहीं देख सकेंगे। अच्छा, समझा मैं कौन हूँ?
अब तो समय की समीपता कारण स्वयं को बाप के समान अर्थात् समानता द्वारा समीपता में लाओ। संकल्प, बोल, कर्म, संस्कार और सेवा सब में बाप जैसे समान बनना अर्थात् समीप आना। चाहे पीछे आने वाले हों चाहे पहले। लेकिन समानता से समीप आ सकते हो। अभी सभी को चांस है। अभी सीट फिक्स की सीटी नहीं बजी है। इसलिए जो चाहो वह बन सकते हो। अभी ‘टू लेट' का बोर्ड नहीं लगा है। इसलिए क्या करेंगे? महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश दोनों हैं ना! महाराष्ट्र का तो नाम ही “महा'' है। तो महान ही हो गया ना! मध्य प्रदेश की क्या विशेषता है? जानते हो? बापदादा की सेवा के आदि में पहली नज़र मध्य प्रदेश की तरफ गई। बच्चों को भी भेजा था। तो सेवा के क्षेत्र में पहली नज़र जब मध्य प्रदेश पर गई तो मध्य प्रदेश की सेवा में और सेवा का प्रत्यक्षफल खाने में पहला नम्बर होगा ना? क्योंकि बापदादा की विशेष नज़र पड़ी। जहाँ नज़र पड़ी वो नम्बरवन नज़र से निहाल हो गये ना। इसलिए दोनों ही महान हो।
महाराष्ट्र में बापदादा के साकार में चरण पड़े। चरित्र भूमि भी महाराष्ट्र को बनाया। तो महाराष्ट्र क्या करेगा? महाराष्ट्र को तो डबल फल देना पड़ेगा। क्या डबल फल देंगे? देखें, पहले टच होता है कि क्या फल देना है? अगर टच नहीं होता तो महाराष्ट्र से मध्य-प्रदेश वन नम्बर हो जायेगा।
एक हैं वारिस और दूसरे हैं वी. आई. पीज्। तो वारिस भी निकालने हैं और वी. आई. पीज् भी निकालने हैं, यह है डबल फल। कहाँ वी. आई. पीज् निकालते, कहाँ वारिस निकालते लेकिन दोनों निकालने हैं। वारिस भी नामीग्रामी हों और वी. आई. पीज् भी नामीग्रामी हों। तो इसमें कौन नम्बरवन लेगा? फारेन लेगा, महाराष्ट्र लेगा वा मध्य प्रदेश लेगा? कौन लेगा? और भी ले सकते हैं लेकिन आज तो यह सामने बैठे हैं? अच्छा, तो क्या सुना? जो ओटे सो अर्जुन गाया हुआ है ना? इसमें जो भी आगे जाये जा सकता है। अभी नम्बर आउट नहीं हुए हैं इसलिए जो भी निमित्त बन नम्बरवन आने चाहे वह आ सकते है। समझा क्या करना है? उसका साधन भी सुनाया - “उड़ती कला''। चढ़ती कला नहीं उड़ती कला। उसके लिए सदा डबल लाइट रहो। यह तो जानते हो ना! जानते सब हो अभी स्वरुप और अनुभव में लाओ। अच्छा।
ऐसे सदा बाप के साथी, हर संकल्प, बोल और कर्म में बाप समान अर्थात् बाप के समीप रत्न, सदा स्वरुप और सफलता स्वरुप, विजय माला के समीप रत्नों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।