
सेवा का गहरा स्वरूप: मन, वचन, एवं कर्म द्वारा
सेवा केवल मदद करना ही नहीं है। जब हमारा मन शक्तिशाली हो, हमारे शब्द प्रेम और नम्रता से भरे हों, और हमारे कर्म निःस्वार्थ भावना से किए जाएं। जब परमात्मा की याद जीवन में सहज और स्वाभाविक बन जाती है, तब हमारी सोच, बोल और कर्म अपने आप सेवा बन जाते हैं।


