“स्वच्छ और आत्मिक बल वाली आत्मा ही आकर्षणमूर्त है”
अपने को इस श्रेष्ठ ड्रामा के अन्दर हीरो एक्टर और मुख्य एक्टर समझते हो? मुख्य एक्टर्स के तरफ सभी का अटेन्शन होता है। तो हर सेकेण्ड की एक्ट अपने को मुख्य एक्टर समझते हुए बजाते हो? जो नामीग्रामी एक्टर्स होते हैं उन्हों में मुख्य तीन बातें होती हैं। वह कौन-सी हैं? एक तो वह एक्टिव होगा, दूसरा एक्यूरेट होगा और तीसरा अट्रेक्टिव होगा। यह तीनों बातें नामीग्रामी एक्टर्स में अवश्य होती हैं। तो ऐसे अपने को नामीग्रामी वा मुख्य एक्टर समझते हो? अट्रेक्ट किस बात पर करेंगे? हर कर्म में, हर चलन में रुहानियत की अट्रेक्शन हो। जैसे कोई शरीर में सुन्दर होता है तो वह भी अपनी तरफ अट्रेक्ट करता है ना। ऐसे ही जो आत्मा स्वच्छ है, आत्मिक बल वाली है, वह भी अपनी तरफ आकर्षित करती है। जैसे महात्माएं आदि भी द्वापर आदि में अपनी सतोप्रधान स्थिति वाले थे तो उन्हों में भी रूहानी आकर्षण तो था ना। जो अपनी तरफ आकर्षित करके औरों को भी इस दुनिया से अल्पकाल के लिये वैराग्य तो दिला देते थे ना। जब उल्टे ज्ञान वालों में भी इतनी अट्रेक्शन थी, तो जो यथार्थ और श्रेष्ठ ज्ञान स्वरूप हैं उन्हों में भी रूहानी आकर्षण वा अट्रेक्शन रहेगी। शारीरिक ब्युटी नज़दीक वा सामने आने से आकर्षण करेगी, रूहानी आकर्षण दूर बैठे भी किसी आत्मा को अपने तरफ आकर्षित करती है। इतनी अट्रेक्शन अर्थात् रुहानियत अपने आपमें अनुभव करते हो? ऐसे ही फिर एक्यूरेट भी हो। एक्यूरेट किसमें? जो मन्सा अर्थात् संकल्प के लिये भी श्रीमत मिली हुई है - वाणी के लिये भी जो श्रीमत मिली हुई है और कर्म के लिये भी जो श्रीमत मिली हुई है इन सभी बातों में एक्यूरेट। मन्सा भी अनएक्यूरेट न हो। जो नियम हैं, मर्यादा है, जो डायरेक्शन हैं उन सभी में एक्यूरेट और एक्टिव। जो एक्टिव होता है वह जिस समय जैसा अपने को बनाने चाहे, चलाने चाहे वह चला सकता है वा ऐसा ही रूप धारण कर सकता है। तो जो मुख्य पार्टधारी हैं उन्हों में यह तीनों ही विशेषताएं भरी हुई रहती हैं। इसमें ही देखना है कि इनमें से कौन-सी विशेषता किस परसेन्टेज में कम है। स्टेज के साथ-साथ परसेन्टेज को भी देखना है। रुहानियत है, आकर्षित कर सकते हैं, लेकिन जितनी परसेन्टेज होनी चाहिए वह है? अगर परसेन्टेज की कमी है तो इसको सम्पूर्ण तो नहीं कहेंगे ना। पास तो हो गये फिर भी मार्क के आधार पर नम्बर तो होते हैं ना। थर्ड डिवीजन वाले को भी पास तो कहते हैं लेकिन कहाँ थर्ड वाला, कहाँ फर्स्ट क्लास, फर्क तो है ना। तो अब परसेन्टेज को चेक करना। स्टेज तो अब नेचुरल बात हो गई क्योंकि प्रैक्टिकल एक्ट में स्टेज पर हो ना। अब सिर्फ परसेन्टेज के आधार पर नम्बर होने हैं।
आज बहुत बड़ा संगठन हो गया है। जैसे बाप को भी समान बच्चे प्रिय लगते हैं, आप लोग आपस में भी एक समान मिलते हो तो यह सितारों का मेला भी बहुत अच्छा लगता है ना। संगमयुगी मेला तो है ही। लेकिन उस मेले में भी यह मेला है। मेले के अन्दर जो विशेष मेला लगता है वह फिर ज्यादा प्रिय लगता है। बड़े-बड़े मेलों के अन्दर भी फिर एक विशेष स्थान बनाते है जहाँ सभी का मिलन होता है। संगमयुग बेहद का मेला तो है ही लेकिन उसके अन्दर भी यह स्थूल विशेष स्थान है, जहाँ समान आत्माएं आपस में मिलती हैं। हरेक को अपने समान वा समीप आत्माओं से मिलना-जुलना अच्छा लगता है। विशेष आत्माओं से मेला मनाने के लिये स्वयं को भी विशेष बनना पड़े। कोई विशेष हो, कोई साधारण हो, वह कोई मेला नहीं कहा जाता। बाप के समान दिव्य धारणाओं की विशेषता धारण करनी है। बाप से जो पालना ली है इसका सबूत देना है। बाप ने पालना किसलिये की? विशेषतायें भरने के लिये। लक्ष्य हो और लक्षण न आयें तो इसको क्या कहा जाये? ज्यादा समझदार। एक होते हैं समझदार, दूसरे होते हैं बेहद के समझदार। बेहद में कोई लिमिट नहीं होती है। अच्छा!
