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6 Sept 1975
“तीन कम्बाइन्ड स्वरूप”
6 September 1975 · हिंदी
हर एक अपने तीन रूपों से कम्बाइन्ड रूप जानते हो? एक है अनादि कम्बाइन्ड रूप, दूसरा है संगमयुगी कम्बाइन्ड रूप और तीसरा है भविष्य कम्बाइन्ड रूप - इन तीनों को जानते हो?
आप मनुष्यात्माओं का अनादि कम्बाइन्ड रूप कौनसा है? पुरुष और प्रकृति कहो या आत्मा और शरीर कहो। यह अनादि कम्बाइन्ड रूप इस अनादि ड्रामा में नूँधा हुआ है। भविष्य कम्बाइन्ड रूप कौनसा है? विष्णु चतुर्भुज। संगमयुगी कम्बाइन्ड रूप आपका कौनसा है? शिव और शक्ति। शक्ति शिव के सिवाय कुछ कर नहीं सकती और शिव बाप भी शक्तियों के बिना कुछ कर नहीं सकते। तो संगमयुगी कम्बाइन्ड रूप सबका है - शिव-शक्ति। सिर्फ माताओं का ही नहीं है, पाण्डव भी शक्ति स्वरूप हैं। यादगार के रूप में आजकल के जगद्गुरु भी आपके कम्बाइन्ड रूप शिव-शक्ति का पूजन करते आ रहे हैं।
तो सदा यह स्मृति रहनी चाहिए कि हम हैं ही कम्बाइन्ड शिव-शक्ति। जब है ही कम्बाइन्ड तो भूल सकते हैं क्या? फिर भूलते क्यों हो? अपने को अकेला समझते हो इसलिए भूल भी जाते हो। कल्प पहले के यादगार में भी अर्जुन को जब बाप का साथ भूल जाता था अर्थात् जब वह सारथी को भूल जाता था तो क्या बन जाता था? निर्बल कहो व कायर कहो। और जब स्मृति आती थी कि मेरा साथी और सारथी बाप है तो विजयी बन जाता था। निरन्तर सहज याद की सहज युक्ति एक ही है कि अपने कम्बाइन्ड रूप को सदा साथ रखो व स्मृति में रखो तो कभी भी कमज़ोरी के संकल्प भी क्या स्वप्न भी नहीं आयेंगे। जागते-सोते कम्बाइन्ड रूप हो।
जबकि बाप स्वयं बच्चों से सदा साथ रहने का वायदा कर रहे हैं और निभा भी रहे हैं तो वायदे का लाभ उठाना चाहिए। ऐसे कम्पनी व कम्पेनियन, फिर कब मिलेंगे? बहुत जन्मों से आत्माओं की कम्पनी लेते हुए दु:ख का अनुभव करते हुए भी अब भी आत्माओं की कम्पनी अच्छी लगती है क्या, जो बाप की कम्पनी को भूल औरों की कम्पनी में चले जाते हो? कोई वैभव को व कोई व्यक्ति को कम्पेनियन बना लेते हो, अर्थात् उस कम्पनी को निभाने में इतने मस्त हो जाते हो, जो बाप से किये हुए वायदे में भी अलमस्त हो जाते हो! ऐसे समय मालूम है कौनसा खेल करते हो? खेल करने के टाइम तो बड़े मस्त हो जाते हो। अभी भूल गए हो। कलाबाजी से भी बहुत रमणीक खेल करते हो? ऐसे नहीं कि जो सुनायेंगे वह खेल करते होंगे, देखने वाले भी सुना सकते हैं। आपके ही इस साकारी दुनिया में खेल दिखाते हैं - बन्दर और बन्दरी का। बन्दरिया को बन्दर से सगाई के लिए पकड़ कर ले जाते हैं और बन्दरिया नटखट हो घूँघट निकाल किनारा कर लेती, पीठ कर लेती है। वह आगे करता है वह पीछे हटती है। तो जैसे वह रमणीक खेल मनोरंजन के लिए दिखाते हैं, ऐसे ही बच्चे भी उस समय ऐसे नटखट होते हैं। बाप सम्मुख आते और बच्चे अलमस्त होने के कारण देखते हुए भी नहीं देखते, सुनते हुए भी नहीं सुनते। ऐसा खेल अभी नहीं करना है। अपने तीनों कम्बाइन्ड रूपों को स्मृति में रखो तो ही सदा के लिए सदा साथी से साथ निभा सकेंगे।
अपने को अकेला समझने से चलते-चलते जीवन में उदासी आ जाती है। अतीन्द्रिय सुखमय जीवन, सर्व सम्बन्धों से सम्पन्न जीवन और सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न जीवन उस समय नीरस व बिल्कुल असार अनुभव करते हो। त्रिनेत्री होते हुए भी कोई राह नज़र नहीं आती। क्या करुँ, कहाँ जाऊं कुछ समझ में नहीं आयेगा। खुद जीवन-मुक्ति के गेट्स खोलने वाले को कोई ठिकाना नज़र नहीं आता! त्रिकालदर्शी होते हुए अपने वर्तमान को नहीं समझ सकते। सृष्टि के सर्व आत्माओं के भविष्य परिणाम को जानने वाले अपने उस समय के कर्म के परिणाम को जान नहीं सकते! यह कमाल करते हो न? ऐसी कमाल रोज़ कोई-न-कोई बच्चे दिखाते रहते हैं।
ऐसे समय पर बापदादा क्या करते हैं? बहुत मनाते और रिझाते हैं लेकिन फिर भी बच्चे नटखट करते हैं और फिर जब वह समय बीत जाता है तब फिर बाप को रिझाते हैं। बच्चे भी बड़े चतुर होते हैं। ज्ञान स्वरूप को याद दिलाते हैं। वह तो जानते हो न क्या करते हैं? आप क्षमा के सागर हो, कृपालु हो, दयालु हो, रहमदिल हो - ऐसी कई बातों से रिझाते हैं। फिर बाप क्या करते हैं? बाप फिर लव और लॉ का बैलेन्स रखते हैं। यह कहानी है बच्चों और बाप की। कहानी सुनने में सभी खुश हो रहे हैं। लेकिन यह कहानी परिवर्तन में लानी है। जैसे बाप ओबीडियेन्ट सर्वेन्ट बन सेवा पर उपस्थित हैं, ऐसे ही हरेक बाप के साथी व सहयोगी बच्चों को भी बाप के समान ओबीडियेन्ट सर्वेन्ट बनना है। ओबीडियेन्ट सर्वेन्ट अलमस्त नहीं होते। दिन-रात सेवा में तत्पर रहते हैं। जैसे बाप बच्चों के आगे वफादार स्वरूप से साथ निभा रहे हैं, ऐसे ही बच्चों को भी फरमानबरदार अर्थात् हर फरमान पर चलने वाले बन साथ निभाना है। ऐसे सदा के साथी बनना है। अच्छा!
ऐसे सदा सच्चे साथी, हर फरमान पर स्वयं को कुर्बान करने वाले, वफादार, बाप के फरमानबरदार बाप, समान श्रेष्ठ बनाने वाले, ऐसी श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।