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25 Jan 1976
“डबल लाइट स्वरूप बनो”
25 January 1976 · हिंदी
भक्तिमार्ग में लक्ष्मी को महादानी दिखाते हैं तो महादानी की निशानी कौन-सी दिखाते हैं? (लक्ष्मी का हाथ खुला, देने के रूप में दिखाया जाता है।) सम्पत्ति झलकती रहती है। यह शक्तियों का यादगार है। लक्ष्मी अर्थात् सम्पत्ति की देवी। वह स्थूल सम्पत्ति नहीं, नॉलेज की सम्पत्ति, शक्तियों रूपी सम्पत्ति की देवी अर्थात् देने वाली। तो जो यह चित्र बनाया है, ऐसी सम्पत्ति की देवी बनना है। चाहे नॉलेज देवे, चाहे शक्तियाँ देवे। ऐसा जो यादगार चित्र है, चेतन में अपने को ऐसा अनुभव करते हो? एक सेकेण्ड भी कोई आपके सामने आवे तो भी दृष्टि से ऐसा अनुभव करे कि मैंने कुछ पाया, तब कहेंगे देने वाली देवी। अब चाहिये यह सर्विस, तब विश्व का कल्याण होगा। इतनी सभी आत्माओं को देना तो जरूर है, तो देने का स्वरूप सूक्ष्म और अति शक्तिशाली। समय कम और प्राप्ति ऊंची। ऐसे देने वाली शक्तियाँ या देवियाँ कितनी तैयार हुई हैं? ऐसी कितनी देवियाँ होंगी? इसी प्रमाण यादगार में भी नम्बर हैं। कोई हर समय देने वाली, कोई कभी-कभी देने वाली, कोई किन्हीं-किन्हीं को देने वाली, कोई सभी को देने वाली, कोई कहती हैं चान्स मिले तो करें, फील्ड होगी या सहयोग मिलेगा तो करेंगे। तो उनका यादगार क्या है? उनकी यादगार में भी तिथि तारीख फिक्स होती है। जो सदा के करने वाले होते हैं, उनकी पूजा भी सदा होती है। जो समय व सहयोग के आधार से चान्स लेते हैं, उनके यादगार की डेट फिक्स होती है। कई देवियों के वस्त्र बदलने की, हर कर्म की पूजा होती है। इससे सिद्ध है कि उन्होंने हर कर्म करते, सारा समय दान किया है - जिसको महादानी कहेंगे। इसलिये उनकी महान पूजा महान यादगार है। एक होती हैं - जो सदा साथियों के साथ स्नेह निभाके चलती हैं, दूसरे साथ होते भी स्नेह का साथ नहीं निभाते। उनके यादगार में भी सारा समय पुजारियों का साथ नहीं मिलता। जो यहाँ स्वार्थ के लिए आयेंगे, यादगार में भी स्पष्ट होता है कि यह किसका यादगार है। यह भी राज़ है। अभी ऐसा बनना है। सदा साथियों के साथ स्नेह का साथ निभाना है, सिर्फ समय पर नहीं, सदा के लिये साथ निभाना है। स्वार्थ से नहीं, काम निकालने के लिये नहीं बल्कि स्नेह से और सदा के लिये साथ निभाना है। अच्छा!
ग्रुप्स से मुलाकात :-
अपने को सदा बापदादा के साथ अनुभव करते हो या अकेला अनुभव करते हो? जैसे बाप को हजारों भुजाओं वाला दिखाते हैं, सर्वशक्तिमान् होते हुए भी बच्चों के साथ यादगार भुजाओं के रूप में दिखाते हैं, ऐसे तुम बच्चे भी अपने को सदा सर्वशक्तिमान् बाप के साथ अनुभव करते हो या कभी-कभी अनुभव करते हो? जो सदा साथ का अनुभव करेंगे, वे कभी किसी देहधारी के साथ की आवश्यकता अनुभव नहीं करेंगे। कभी भी किसी सेवा में, देहधारी का आधार नहीं लेंगे। मर्यादा प्रमाण, संगठन प्रमाण सहयोग लेना अलग बात है। बाकी किसी परिस्थिति में देहधारी की याद आये कि यह मुझे परिस्थिति से पार करेंगे, राय देंगे, या सहारा देंगे - इससे सिद्ध है कि सर्वशक्तिमान् का सहारा सदा साथ नहीं रहता। सदा साथ रहने वाले का बाप से समीप सम्बन्ध होने के कारण संकल्प में, रुह-रुहान में भी बाबा याद आयेगा कि यह बाबा से पूछें। कोई निमित्त टीचर याद आये, कोई साथी याद आये या हमशरीक याद आये - यह भी होता है, वह भी कार्य के प्रति। लेकिन मन में, बुद्धि में सदा बाबा-बाबा याद आये। जब डायरेक्ट साथ निभाने का वायदा है तो वायदे का फायदा उठाओ। इस समय तो बाप के साथ व्यक्तिगत अनुभव हो सकता है, फिर सारे कल्प में नहीं होगा। जो सिर्फ अभी की ही प्राप्ति है, फिर होगी ही नहीं तो उसका पूरा-पूरा लाभ उठाओ। कोई भी बात हो, सदा बाबा ही याद रहे - इसको कहा जाता है निरन्तर योगी। हर कदम बाप की याद रहे तो यह भी योग हुआ। ऐसे निरन्तर योगी हो अथवा बनना है? जब बाप स्वयं साथ देने का आफर कर रहे हैं, उस आफर को स्वीकार करना चाहिए ना? जब आधा कल्प भक्तिमार्ग में बाप को मनाया, साथ देने के लिए - अभी तो बाप खुद ऑफर कर रहे हैं तो ऑफर को स्वीकार करना चाहिये। जैसे स्थूल में कोई किसी को कोई चीज़ ऑफर करे, वह स्वीकार न करे तो इसको सभ्यता नहीं समझेंगे। यह इज्जत कहेंगे? यह तो गॉड की ऑफर है। सदा बाप के साथ अर्थात् निरन्तर योगी। वह तो सदा लाइट रूप है, तो ऐसे संग से लाइट रूप भी और हल्के भी हो जायेंगे तो डबल लाइट हुए ना। जब बाप बोझ उठाने के लिए ऑफर कर रहे हैं तो फिर तुम बोझ क्यों उठा रहे हो? बोझ वाला फुल स्पीड में चल नहीं सकता। तो अब इन अनेक प्रकार के बोझों से हल्के हो जाओ, अपना कोना-कोना साफ करो, किचड़े को अन्दर ही अन्दर सम्भाल के नहीं रखो। ऐसे नहीं कि चान्स मिलेगा तो देंगे। है तो किचड़ा ही ना, किचड़े से तो कीड़े पैदा होते हैं, उनको रखने का अर्थ है उनकी वृद्धि करना। तो जब किचड़े से खाली रहेंगे तब बाप द्वारा मिला हुआ खज़ाना अपने में भर सकेंगे। अच्छा! ओम् शान्ति।