ब्रह्माकुमारी दादी कमलसुन्दरी जी मेरठ में रहकर अपनी सेवायें दे रही थीं।
आपका जीवन एक गहरे आध्यात्मिक यात्रा की तरह था। सामान्य पारिवारिक जीवन से आगे बढ़कर आपने परमात्मा की याद, सेवा, सादगी और आत्मिक मूल्यों को अपने जीवन का आधार बनाया। आपकी योगस्थिति बड़ी पावरफुल थी। रग-रग में यज्ञ के प्रति प्रेम भरा था। इकॉनामी का पक्का संस्कार था। अंत तक भी कर्मरत रही। आप पूर्ण नष्टोमोहा, समय की पाबंद, मर्यादाओं और धारणाओं में बड़ी दृढ़ थी। अंतिम स्थिति एकदम उपराम थी।
आपने 8 मई, 2007 को अपना पुराना शरीर छोड़ बापदादा की गोद ली।
ईश्वरीय ज्ञान के बाद जीवन में परिवर्तन
ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त करने के बाद दादी कमलसुन्दरी जी के जीवन में एक नया परिवर्तन आया। परमात्मा को अपना सच्चा सहारा मानते हुए उन्होंने जीवन को पवित्र, सरल और सेवाभावी बनाने का संकल्प लिया। उनके लिए आध्यात्मिकता का अर्थ रिश्तों से दूर होना नहीं, बल्कि हर संबंध में आत्मिक दृष्टि, प्रेम और शुभभावना रखना था।
विद्यार्थी जीवन और सेवा
ज्ञान प्राप्त करने के बाद उनका जीवन एक विद्यार्थी की तरह बन गया। वे ईश्वरीय विद्या के अध्ययन में व्यस्त रहती थीं। ब्रह्मा बाबा और मम्मा (जगदंबा सरस्वती) से उन्हें आत्मिक स्नेह और पालना मिली। इस जीवन में ज्ञान सुनना, सेवा करना और ईश्वरीय परिवार में रहना उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण था।
नोएडा सेवाकेन्द्र की मंजू बहन जिन्होंने 17 साल दादी जी के अंग-संग रहकर उनकी पालना ली, अपना अनुभव सुनाती हैं -
यज्ञ से विशेष प्यार
दादी 24 साल की उम्र में यज्ञ में आई। यज्ञ के प्रति बहुत उच्च भावना थी। दादी को लौकिक परिवार से जो कुछ भी मिलता, दादी अपने लिए कुछ न रख सीधे यज्ञ में देती। वह समझती थी, क्योंकि हम यज्ञ के हैं तो हमें प्राप्त हर चीज, बाबा के यज्ञ की अमानत है। हमने उन्हें बीमारी में भी कभी दो रुपये का फल खरीदकर खाते हुए नहीं देखा। डॉक्टर के कहने पर अगर हम युक्ति से फल मँगवाते भी तो वे तुरंत पहचान लेती थी।
योग की पावरफुल स्थिति
अमृतवेला बहुत नियमित था। अपने आप दो बजे उठकर योग करती, बीच में थोड़ा आराम लेती फिर हम लोगों के साथ योग करती। मैंने जब सेन्टर पर रहना शुरू किया तब मैं नौकरी करती थी। उन्हें इतनी जल्दी उठकर योग करते देख मुझे भी होता कि मैं भी योग करूँ। एक-दो बार मैं दो बजे योग के लिए उठी तो उन्होंने मना किया। कहती थी, मैं तो फिर भी दिन में आराम कर लूँगी, तुम नौकरी पर जाओगी तो दिन में आराम का समय नहीं मिलेगा, रात तक थक जाओगी, बीमार पड़ जाओगी। इसलिए मुझे जल्दी उठने से मना करती। कई बार मैं देखती कि योग के लिए बैठे हैं तो मैं भी बैठ जाती तो मुझे देख खुद लेट जाते, आँखें बंद कर लेते ताकि मैं भी सो जाऊँ। मैने उन्हें बीमारी में भी कभी अमृतवेला मिस करते हुए नहीं देखा। योग कराते समय दादी जी लगातार एक घंटा बिल्कुल स्थिर, एक ही पोज में बैठे रहते।
त्यागमूर्त
दादी जी में त्याग भावना बहुत थी। कभी नया कपड़ा आता तो बाबा के घर मधुबन भेजती, खुद पुराना पहनती रहती। जब दादी जी बीमार भी थी तो मैं दादी के साथ डेढ़ साल रही। बीमार होते भी दादी रसोई में अपनी सब्जी खुद बनाती। भोग के समय आ जाती और मदद करवाती। उन्होंने अपने शरीर को अंत तक यज्ञ सेवा में लगाया।
पालना के संस्कार
जिज्ञासुओं के प्रति उनकी बहुत अच्छी भावना थी। अच्छी से अच्छी चीज भी अपने प्रति इस्तेमाल न कर उन्हें सौगात में दे देती। उनकी पालना में पले सभी विद्यार्थी ईश्वरीय मर्यादाओं का स्वरूप हैं। दादी माताओं को विशेष नियम-धारणाओं में पक्का करती। क्लास में मातायें पूरी ड्रेस में आयें, रोजाना क्लास-योग करें, इस पर पूरा ध्यान देती। वे समय की बड़ी पाबंद थी। क्लास में हमेशा पाँच मिनट पहले पहुँचती। जैसे वे खुद करती, हमसे भी यही अपेक्षा रखती।
बाबा से विशेष प्यार
उनके मन में ब्रह्मा बाबा के प्रति बहुत सम्मान था। कभी लेटते समय और कभी खाना खाते समय कुछ न कुछ बाबा की बातें सुनाती रहती थी। कभी खाने में सिन्धी कढ़ी बनती तो कहती, बाबा को कढ़ी के साथ बूंदी बहुत पसंद थी। जो चीजें बाबा को पसंद थी, वहीं चीजें 18 जनवरी को भोग के समय बनवाती। बड़ी दादी (दादी प्रकाशमणि जी) से भी इतना ही प्यार था जितना बाबा से। जब कभी दादी का फोन आता और दादी उन्हें मधुबन बुलाती तो वे बहुत खुश हो जाती थीं। तबीयत खराब होने पर भी कहती थीं, मुझे दादी ने नहीं, बाबा ने बुलाया है, जाना जरूरी है। अगर कभी किसी भाई को कोई सेवा दी और वह पूरी किये बिना ही चला गया तो हम कहते, दादी, उसे बुला लें तो सिन्धी में कहती, "मिंजो तो बाबा बैठो, वो पानो कंदो (मेरा तो बाबा बैठा है, वो अपने आप करेगा)। बाबा का कार्य है, पूरा हो ही जायेगा, इससे नहीं तो बाबा किसी और से करा लेगा।"
मेरठ सेवाकेन्द्र की संचालिका विनोद बहन जो सन् 1965 से 1980 तक दादी जी के साथ रहीं, अपना अनुभव सुनाती हैं -
सेवा में दृढ़ता
दादी जी सन् 1958 में मेरठ आई। इससे पहले उन्होंने दिल्ली जमुना के कंठे पर व कमला नगर सेवाकेन्द्र पर सेवायें की थी। उन्होंने अपने लिए कभी कुछ नहीं चाहा। हड्डी-हड्डी सेवा में लगाई। अन्य आत्माओं का सब कुछ सफल कराने की विधि भी दादी को बहुत अच्छी आती थी। जो भी धारणायें हमारे जीवन में आई, सब दादी जी की कमाल है।
नष्टोमोहा
दादी में, 96 वर्ष की आयु में भी आलस्य नाम की कोई चीज़ नहीं थी। वे सदा उमंग-उत्साह में रहती थी। यज्ञ का हर कार्य स्वयं करती। दूसरों से उन्होंने कभी सेवा नहीं ली। दादी जी नष्टोमोहा थीं।
बचपन से दादी की पालना लेने वाली मवाना की अमिता बहन सुनाती हैं -
रग-रग में यज्ञ प्रति प्रेम
एक बार मधुबन में दादियों का 70वां वर्ष मनाया गया। उस समय वार्षिक मीटिंग भी थी। मीटिंग में भारत तथा नेपाल से हजारों बहनें-भाई आये हुए थे। कइयों ने उस उपलक्ष्य में दादियों को सौगातें भी दी। कमलसुन्दरी दादी को भी बहुत सौगातें मिली। उन सभी सौगात की चीज़ों को गठरी में पैक करके उनके कमरे में पहुँचा दिया गया। दादी ने कहा, इस गठरी को अलग रख दो। कई बहनों ने कहा, दादी, यह चीज़ हमें दे दो, वो चीज़ हमें दे दो। दादी ने इशारा से समझाया, यह सब यज्ञ का है और यज्ञ में ही जायेगा। दादी ने, सब यज्ञ में पहुँचा दिया। दादी की रग-रग में यज्ञ के प्रति प्रेम समाया था। हर बात में पहले यज्ञ ही याद आता था।
ब्र.कु. भावना बहन, हस्तसाल, दादी जी के साथ बिताए गए उन अविस्मरणीय पलों को याद करते हुए कहती हैं
दादी जी सचमुच देवदूत, फरिश्ता और साथ-साथ शक्तिस्वरूपा भी थीं। ब्रह्माकुमारी जीवन के शुरू के 5 वर्षों में दादी से मिली पालना ने मुझे अचल, अडोल और धारणामूर्त बना दिया।
समय की पाबंद
अमृतवेले रिकॉर्ड बजाने वाला भाई थकावट या अन्य किसी कारण से यदि 3.30 बजे का रिकॉर्ड नहीं बजाता तो खुद आवाज लगाकर अलर्ट करती कि समय हो गया है। सुबह ठीक 5.30 बजे क्लास रूम में पहुँच जाती थी और पहले साकार मम्मा-बाबा की कैसेट चलवाती थी फिर योग और मुरली चलती थी। दादी की खड़ाऊँ की आवाज सुनकर हमें पता लग जाता था कि समय हो गया है, दादी पहुँच गये हैं। खड़ाऊँ की आवाज, अलार्म की घंटी की तरह हमें अलर्ट कर देती थी। दिन में बाबा को भोग ठीक 12 बजे लग जाता था। योग में वे साक्षात् देवी की मूर्ति लगती थी, बिल्कुल हिलती नहीं थी, यहाँ तक कि उनकी पलकें भी नहीं झपकती थी। ऐसे लगता था मानो मूर्ति को ही बिठा रखा है।
बड़ों का सम्मान
कोर्स कराना, भाषण करना, योग शिविर कराना आदि की ट्रेनिंग मुझे दादी जी द्वारा ही मिली। मुझे दादी के पास रहते छह मास ही हुए थे कि गुलजार दादी जी वहाँ मेले की ओपनिंग करने आई। दादी ने, गुलजार दादी से कहा, मेले में शिविर कराने के लिए बहनों को भेजना। गुलजार दादी ने कहा, गुजराती बहनें बहुत अच्छा शिविर कराती हैं, यह (भावना) करा लेगी। गुलजार दादी ने कहा और कमलसुन्दरी दादी जी ने मान लिया।
माँ जैसा ध्यान
दादी माँ जैसा प्यार देती थीं और भोजन बनाना भी सिखाती थीं। कभी कोई बीमार पड़ता, तो वे तबीयत का ध्यान रखती थीं और दवाई आदि लाकर देती थीं।
उन्होंने हमेशा देने का ही ख्याल किया, लेने का नहीं। वे सबको समान रूप से चलाती थीं, चाहे कोई बड़ा हो या छोटा। धन या पद का उन पर प्रभाव नहीं पड़ता था।
ब्र.कु. सपना वहन, वर्तमान समय ओ. आर. सी. में सेवारत हैं। देवता दादी के साथ के सात वर्षों का अनुभव इस प्रकार बताती हैं -
अनासक्ति सिखाती थीं
दादी कहती थी, भोजन बाबा की याद में खाओ, आसक्ति से नहीं। पसंद-नापसंद से ऊपर उठने की भी शिक्षा देती थीं। वे भोजन और संसाधनों को व्यर्थ नहीं जाने देती थीं। छोटी-छोटी बातों से वे बचत सिखाती थीं।
कभी खाली नहीं रही
अमृतवेले योग के बाद सब्जी काटने तथा झाडू-पोछा करने में पौने पाँच बज जाते थे। फिर छह बजे क्लास होती थी। दादी हफ्ते में दो बार क्लास कराते थे। दादी ने लास्ट तक अपने हाथों से सब्जी बनाई, अमृतवेले के बाद कभी नहीं सोई। कहती थी, अमृतवेले के बाद सोना माना बाबा से शक्ति ली, वो खत्म। मधुबन में होती थी तब भी, कोई हो या ना हो, ठीक 6.30 बजे क्लास में आ जाती थीं। हमने उनको कभी खाली नहीं देखा, या तो मुरली पढ़ती थीं या योग करती थीं।
नवसारी सेवाकेन्द्र की निमित्त बहन गीता, जिन्होंने लौकिक पढ़ाई पढ़ते हुए दादी से पालना ली, उनके साथ का अनुभव इस प्रकार सुनाती हैं -
साथ खिलाने-पिलाने का संस्कार
दादी जी में साथ खिलाने-पिलाने का संस्कार था। वे कोई भी चीज़ अकेले नहीं खा-पी सकती थीं। एक बार दूध कम था और दादी के लिए चाय बनाई गई। साथ की दो बहनों ने पानी को ऐसे पिया जैसे वे भी चाय पी रही हों, क्योंकि यदि दादी को लगता कि वे अकेली चाय पी रही हैं, तो वे चाय नहीं पीतीं।
सावधानी देने का संस्कार
दादी किसी भी बहन या भाई को धारणा के प्रति सावधान कर देती थीं। लेकिन उनके मन में कल्याण की भावना होती थी, इसलिए लोगों को बुरा नहीं लगता था। वे उन्हें माँ की तरह समझती थीं। दादी माताओं को भी नियमों में पक्का करती थीं। वे चाहती थीं कि सभी क्लास और योग में नियमित रहें।




