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11 Oct 1975
“अन्त:वाहक अर्थात् अव्यक्त फरिश्ते रूप द्वारा सैर”
11 October 1975 · हिंदी
आजकल इस पुरानी सृष्टि में विशेष क्या चल रहा है? आजकल विशेष आप लोगों का आह्वान चल रहा है। फिर आह्वान का रेसपान्स करते हो? भक्त क्या चाहते हैं? भक्तों की इच्छा यही है कि देवियाँ चैतन्य-रूप में प्रगट हो जायें। जड़ चित्रों में भी चैतन्य शक्तियों का आह्वान करते हैं कि चैतन्य रूप में वरदानी बन वरदान दे दें। तो यह इच्छा भक्तों की कब पूरी होगी? भक्ति का भी अभी फुल-फोर्स (पूरा जोर) चारों ओर दिखाई दे रहा है। उसमें भी जैसे प्रैक्टिकल में बाप गुप्त है और शक्तियाँ प्रत्यक्ष रूप में हैं, ऐसे ही भक्ति में भी पहले बाप की पुकार ज्यादा करते थे - ‘हे भगवान्' कह पुकारते थे। लेकिन अभी मैजॉरिटी भगवती की पूजा होती है। भक्तों की भावना पूरी करने के लिए शक्तियाँ ही निमित्त बनती हैं इसलिए आह्वान भी शक्तियों का ज्यादा हो रहा है। तो अब शक्तियों में रहम के संस्कार इमर्ज होने चाहिए। अभी सबके अन्दर रहम के संस्कार इमर्ज नहीं हैं, मर्ज हैं।
जैसे बाप चारों ओर चक्कर लगाते हैं, वैसे आप भी भक्तों के चारों ओर चक्कर लगाती हो? कभी सैर करने जाती हो? आवाज सुनने में आती है, तो कशिश नहीं होती है? बाप के साथ-साथ शक्तियों को भी पार्ट बजाना है, जैसे शक्तियों का गायन है कि अन्त:वाहक शरीर द्वारा चक्कर लगाती थीं, वैसे बाप भी अव्यक्त रूप में चक्कर लगाते हैं। अन्त:वाहक अर्थात् अव्यक्त फरिश्ते रूप में सैर करना। यह भी प्रैक्टिस चाहिए और यह अनुभव होंगे। जैसे साइन्स के यन्त्र दूरबीन द्वारा दूर की सीन को नजदीक में देखते हैं ऐसे ही याद के नेत्र द्वारा अपने फरिश्तेपन की स्टेज द्वारा दूर का दृश्य भी ऐसे ही अनुभव करेंगे जैसे साकार नेत्रों द्वारा कोई दृश्य देख आये। बिल्कुल स्पष्ट दिखाई देंगे अर्थात् अनुभव होगा।
साइन्स का मूल आधार है, लाइट। लाइट के आधार से साइन्स का जलवा है, लाइट की ही शक्ति है। ऐसे ही साइलेन्स की शक्ति का आधार है डिवाइन इनसाइट। इसके द्वारा साइलेन्स की शक्ति के बहुत वन्डरफुल अनुभव कर सकते हो। यह भी अनुभव होंगे। जैसे स्थूल साधन द्वारा सैर कर सकते हैं, वैसे ही जब चाहो, जहाँ चाहो, वहाँ का अनुभव कर सकते हो। न सिर्फ इतना, जो सिर्फ आपको अनुभव हो लेकिन जहाँ आप पहुँचो उन्हों को भी अनुभव होगा कि आज जैसे प्रैक्टिकल मिलन हुआ। यह है सफलतामूर्त की सिद्धि। वह तो रिवाजी आत्माओं को भी सिद्धि प्राप्त होती है। एक ही समय अनेक स्थानों पर अपना रूप प्रकट कर सकते और अनुभव करा सकते हैं। वह तो अल्पकाल की सिद्धि है लेकिन यह है ज्ञान-युक्त सिद्धि। ऐसे अनुभव भी बहुत होंगे। आगे चलकर कई नई बातें भी तो होगी ना। जैसे शुरू में घर बैठे ब्रह्मा रूप का साक्षात्कार होता था, जैसे कि प्रैक्टिकल कोई बोल रहा है, इशारा कर रहा है, ऐसे ही अन्त में भी निमित्त बनी हुई शक्ति सेना का अनुभव होगा। सभी महारथियों का संकल्प है कि अब कुछ नया होना चाहिए तो ऐसी-ऐसी नई रंगत अब होती जायेगी। लेकिन इसमें एक तो बहुत हल्कापन चाहिये, किसी भी प्रकार का बुद्धि पर बोझ न हो और दूसरा सारी दिनचर्या बाप समान हो, तब ब्रह्मा बाप समान आदि सो अन्त के दृश्य का अनुभव कर सकते हो। समझा? अब महारथियों को क्या करना है? सिर्फ योग नहीं, सेवा का रूप परिवर्तन करना है। महारथियों का योग वा याद अब स्वयं प्रति नहीं लेकिन सेवा प्रति हो, तब तो महादानी और महाज्ञानी कहे जायेंगे। अच्छा!
समय की समाप्ति की निशानी क्या होगी? जब सारे संगठन की एक आवाज, एक ही ललकार हो कि हम विजयी हैं, विजय हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है वा विजय हमारे गले का हार है। ऐसा प्रैक्टिकल में अनुभव हो। सिर्फ कहने मात्र नहीं, लेकिन यह नशा रहे, सदा सामने दिखाई दे। ऐसे विजय का निशाना दिखाई देता है? अच्छा। ओम् शान्ति।
(अव्यक्त महावाक्य - प्रश्न-उत्तर)
प्रश्न :- विजयी बनने के लिये किस मुख्य धारणा की आवश्यकता है?
उत्तर :- विजयी बनने के लिये अलर्ट रहने की आवश्यकता है। एक होते हैं अलर्ट रहने वाले, दूसरे होते हैं अलबेले रहने वाले। जो सदा अलर्ट होते हैं, वे कभी माया से धोखा नहीं खायेंगे, बल्कि वे सदा विजयी ही होंगे।
प्रश्न :- 108 की माला में और 16000 की माला में आने के चिन्ह व निशानी क्या है?
उत्तर :- जो यहाँ सदा विजयी रहते हैं, वही विजय माला में आयेंगे। इसलिए वैजयन्ती माला नाम पड़ा है। जो कभी-कभी के विजयी हैं वे 16000 की माला में आयेंगे।
प्रश्न :- कौनसा लक्ष्य रखने से सदा विजयी बन सकते हैं?
उत्तर :- हम अभी के विजयी नहीं, कल्प-कल्प अनेक बार के विजयी हैं। जो बात अनेक बार की जाती है तो वह स्वभाव-संस्कार में स्वत: ही आ जाती है। जैसे आज की दुनिया में जो बात नहीं करनी चाहिये परन्तु वह कर लेते हैं, तो कह देते हैं कि यह तो मेरा संस्कार बन गया है। तो यहाँ भी अनेक बार के विजयी होने की स्मृति विजय का संस्कार बना देगी।
प्रश्न :- व्यर्थ को समर्थ बनाने की तेज मशीनरी कौन-सी होनी चाहिए?
उत्तर :- जैसे कोई भी चीज की मशीनरी पॉवरफुल होती है, तो काम तेजी से होता है, तो यहाँ भी व्यर्थ संकल्प को समर्थ करने के लिए बुद्धि रूपी मशीनरी पॉवरफुल हो। बुद्धि भी पॉवरफुल तब होगी जब बुद्धि का पॉवर हाउस से कनेक्शन होगा। यहाँ कनेक्शन टूटता तो नहीं लेकिन लूज़ जरुर हो जाता है, अब वो भी लूज़ नहीं होना चाहिए तभी व्यर्थ को समर्थ बना सकेंगे।
प्रश्न :- ब्राह्मण जीवन का मुख्य कर्तव्य क्या है?
उत्तर :- बाप के याद की सदा स्मृति स्वरूप होकर रहना। जैसे मिश्री मिठास का रूप होती है वैसे ही याद स्वरूप ऐसे हो जाओ कि याद अलग ही न हो सके। अगर बाप की याद छोड़ी तो बाकी रहा ही क्या? जैसे शरीर से आत्मा निकल जाय तो उसे मुर्दा ही कहेंगे? वैसे ही यदि ब्राह्मण जीवन से याद निकल जाय तो ब्राह्मण जीवन क्या हुआ? तो ऐसा याद स्वरूप बनना है, तो ब्राह्मण जीवन का कर्तव्य है - याद-स्वरूप बनना।
प्रश्न :- देहली यमुना के किनारे पर है, यमुना किनारे का गायन क्यों?
उत्तर :- जैसे अब साकार रूप में जैसे यमुना किनारे निवास करते हो, वैसे बुद्धियोग द्वारा स्वयं को इस देह और देह को पुरानी दुनिया की स्मृति से किनारा किया हुआ अनुभव करो। संगमयुगी अर्थात् कलियुगी दुनिया से किनारा कर देना। किनारा अर्थात् न्यारा हो जाना। ‘पुरानी दुनिया' से न्यारे हो गये हो कि अब भी उसके प्यारे हो?
प्रश्न :- दशहरे पर सभी रावण का दाह-संस्कार करते हैं लेकिन अब आपको क्या करना है?
उत्तर :- आपके अपने में जो रावण-पन के संस्कार हैं, उन रावण-पन के संस्कारों का संस्कार करो अर्थात् रावण-पन के संस्कारों को सदा के लिए छुट्टी देकर लाभ उठाओ। हड्डियाँ व राख बांध कर साथ नहीं ले जाना। राख अर्थात् संकल्प रूप में भी रावण-पन के संस्कार नहीं ले जाना।
पर्सनल मुलाकात - टीचर्स के साथ :-
हर समय अपने को निमित्त बनी हुई समझती हो? जो अपने को निमित्त बनी हुई समझती हैं उन्हों में मुख्य यह विशेषता होगी - जितनी महानता, उतनी नम्रता। दोनों का बैलेन्स होगा। तब ही निमित्त बने हुए कार्य में सफलतामूर्त बनेंगे। जहाँ नम्रता के बजाय महानता ज्यादा है या महानता की बजाय नम्रता ज्यादा है तो भी सफलतामूर्त नहीं बनेंगे। सफलतामूर्त बनने के लिए दोनों बातों का बैलेन्स चाहिए। टीचर्स वह होती हैं जो सदा अपने को बाप समान वर्ल्ड सर्वेन्ट समझ कर चलती हैं। वर्ल्ड सर्वेन्ट ही विश्व-कल्याण का कार्य कर सकते हैं। टीचर्स को सदैव यह स्मृति रहनी चाहिए कि टीचर को स्वयं को स्वयं ही टीचर नहीं समझना चाहिए। यदि टीचरपन का नशा रखा तो रूहानी नशा नहीं रहेगा। यह नशा भी बॉडी-कॉन्सेस (देह-अभिमान) है। इसलिए सदा रूहानी नशा कि मैं विश्व-कल्याणकारी बाप की सहयोगी विश्व कल्याणकारी आत्मा हूँ।
कल्याण तब कर सकेंगे जब स्वयं सम्पन्न होंगे। जब तक स्वयं सम्पन्न नहीं होंगे तो विश्व-कल्याण नहीं कर सकेंगे। सदैव बेहद की दृष्टि रखनी चाहिए। बेहद की सेवा-अर्थ जब बेहद का नशा होगा तब बेहद का राज्य प्राप्त कर सकेंगी। सफल टीचर अर्थात् सदा हर्षित रहना और सर्व को हर्षितमुख बनाना। समझा - सफलतामूर्त की निशानी? टीचर को सफलतामूर्त बनना ही है। बाप और सेवा के सिवाय और कोई बात उसकी स्मृति में न हो। ऐसी स्मृति में रहने वाली टीचर सदा समर्थ रहेंगी। कमजोर नहीं रहेंगी। ऐसी टीचर हो? ऐसा समर्थ अपने को समझती हो? समर्थ टीचर ही सफलतामूर्त होती हैं। ऐसी ही हो ना? टीचर को कमजोरी के बोल बोलना भी शोभता नहीं है। संस्कारों के वशीभूत तो नहीं हो ना? क्या संस्कारों को अपने वश में करने वाली हो? कम्पलेन्ट करने वाली टीचर तो नहीं हो ना? टीचर्स तो अनेकों की कम्पलेंट को खत्म करने वाली होती हैं फिर अपनी कम्पलेन्ट तो नहीं होनी चाहिए। टीचर्स को चांस तो बहुत मिलते हैं। कम्पलेन्ट समाप्त हो गई फिर तो कम्पलीट हो गये, बाकी और क्या चाहिए? अच्छा!