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26 Dec 1978
“इष्ट देव की विशेषतायें”
26 December 1978 · हिंदी
आज बापदादा हर बच्चे के एक ही समय पर चार रुपों का वंश देख रहे हैं। पहला हरेक शिववंशी, दूसरा ब्रह्मावंशी, तीसरा देवता वंशी, चौथा इष्ट देव वंशी। हरेक के चार वंश का रूप बापदादा के आगे स्पष्ट है - भक्ति मार्ग में आप ही श्रेष्ठ आत्मायें भिन्न भिन्न रूप में भक्तों के इष्ट देव बनते हो। इस समय भी आप सबके भक्त आप इष्ट देवों को वा देवियों को पुकारते रहते हैं। जैसे प्रत्यक्षता का समय स्पष्ट और समीप आता जा रहा है वैसे आप सबके देव वंश अर्थात् राजवंश और इष्ट वंश की प्रत्यक्षता होती जायेगी। ऐसे अनुभव करते हो कि हम ही इष्ट देव बनकर अनेक भक्त आत्माओं की मनोकामनायें पूर्ण करने वाले हैं? जैसे राजवंश में नम्बरवार हैं, वैसे ही पूज्य रूप में भी नम्बरवार इष्ट देव बनते हो। याद है हम कौन से इष्ट हैं? कौन-सी देवी के रुप में आपका पूजन हो रहा है? अपनी भक्तमाला को जानते हो? जो अब सेवा में सहयोगी साथी बनते हैं, उनमें कोई राजवंश में आते हैं कोई प्रजा में आते हैं, तो इस समय के सेवा के सहयोगी वा नजदीक के साथी और भविष्य के रॉयल फैमिली वा प्रजा और भक्ति में इष्ट वंशी वा भक्त। इष्ट देवों की वंशावली भी दिखाते हैं। अपने आपसे पूछो कि हम राजवंशी सो इष्ट वंशी हैं? किस नम्बर के इष्ट हो? कोई इष्ट देव की रोज की पूजा होती है, कोई-कोई की कभी-कभी होती है, कोई की नियम प्रमाण युक्तियुक्त रूप से होती है, कोई की जब आया जैसे आया वैसे होती है। कोई का बड़े धूमधाम से वैरायटी वैभवों से पूजन होता है और कोई का पूजन कभी-कभी धूमधाम से होता है, कोई की भक्त माला बहुत बड़ी होती है, अनगिनत संख्या में भक्त होते हैं और कोई के बहुत थोड़े से भक्त होते हैं। लेकिन ब्राहमण वंशी सो राजवंशी छोटा वा बड़ा इष्ट देव जरूर बनते हैं तो आप सभी भक्तों के इष्ट हो।
बापदादा आज सभी को इष्ट देव वा इष्ट देवी के रुप में देख रहे हैं कि मेरे बच्चे कितने पूज्य हैं! अपना पूज्य स्वरुप भी सदा सामने रखो। श्रेष्ठ इष्ट देव बनने वाले की विशेष आठ बातें याद रखो। जैसे अष्ट शक्तियाँ याद हैं ना - इष्ट बनने की आठ विशेषतायें हैं। उसको तो अच्छी तरह से जानते हो ना - अपने यादगार चित्रों में देखने से भी वह विशेषतायें अनुभव होंगी।
पहली विशेषता - इष्ट देव सदा रहमदिल होगा। कौन-सा रहम? हर आत्मा को भटकने वा भिखारीपन से बचाने का। हरेक के ऊपर रहम करेगा। निष्काम रहमदिल होगा। किस पर रहम और किस पर नहीं - ऐसे नहीं अर्थात् बेहद रुप में रहमदिल होंगे। उनके रहम के संकल्प से अन्य आत्माओं को अपने रूहानी रुप वा रुह की मंज़िल सेकेण्ड में स्मृति में आ जायेगी। उनके रहम के संकल्प से भिखारी को सर्व खजानों की झलक दिखाई देगी। भटकती हुई आत्माओं को मुक्ति वा जीवन मुक्ति का किनारा वा मंज़िल सामने दिखाई देगी - ऐसा रहमदिल होगा।
दूसरी बात - इष्ट देव आत्मा सदैव सर्व के दु:ख हर्ता सुख कर्ता का पार्ट बजायेगी। दूसरे का दु:ख अपने दु:ख के समान समझ सहन नहीं कर सकेगी। दु:ख को भूलाने की वा दु:खी को सुखी करने की युक्ति वा साधन सदा उसके पास जादू की चाबी के मुआफिक होगा।
तीसरी बात - सदा संकल्प, बोल और कर्म से प्यूरिटी की परसनल्टी दिखाई देगी।
चौथी बात - सदा स्वभाव में, संस्कार में, चलन में सिम्पुल लेकिन श्रेष्ठ दिखाई देगा।
पाँचवीं बात - जैसे आपके जड़ चित्र सदा श्रृंगारे हुए दिखाये हैं वैसे सर्व गुणों के श्रृंगार से सदा सजे सजाये नज़र आयेंगे। कोई एक गुण रूपी श्रृंगार भी कम नहीं होगा।
छठी बात - ऐसी इष्ट आत्मा के फीचर्स सदा स्वयं भी कमल समान होंगे और दूसरे को भी कमल समान न्यारा और प्यारा बना देंगे।
सातवीं बात - ऐसी इष्ट आत्मा सदा स्थिति में अचल, अडोल होगी। जैसे मूर्ति को स्थापित करते हैं, वैसे वह चैतन्य मूर्ति सदा एकरस स्थिति में स्थित होगी।
आठवीं बात - वह सदा सर्व के प्रति संकल्प और बोल में वरदानी होंगे। ग्लानि वा शिकायत करने वाले के ऊपर भी वरदानी। ग्लानि करने वाले के प्रति भी वाह-वाह के पुष्पों की वर्षा करने वाले होंगे - इसके रिटर्न में इष्ट देव रुप में पुष्पों की वर्षा ज्यादा होती है। महिमा करने वाले की महिमा करना - यह कॉमन बात है लेकिन ग्लानि करने वाले के गले में भी गुणमाला पहनाना जन्म-जन्म के लिए भक्त निश्चित कर देना है वा साथ-साथ वर्तमान समय के सदा सहयोगी बनाना - निश्चित हो जाते हैं।
जैसे आजकल आप विशेष आत्माओं के स्वागत के समय गले में स्थूल माला ड़ालते हैं तो फिर आप क्या करते हो? डालने वाले के गले में रिटर्न कर देते हो ना - ऐसे ग्लानि करने वाले को भी आप गुणमाला पहनाओ तो वह स्वत: ही आपकी गुणमाला आपको रिटर्न करेंगे। जैसे बाप के हर कदम, हर कर्म के गुण गाते हैं वैसे आप इष्ट देव, महान आत्माओं के सदा गुण गाते रहेंगे अर्थात् यह देना, अनेक बार का लेना हो जाता है - अब समझा इष्ट देव की विशेषताएं। तो अब सभी अपने आपको चेक करो - इष्ट देव स्वरुप कहाँ तक तैयार हुए है, जब मूर्ति तैयार हो जाती है तब पर्दा खुलता है तो आप सब तैयार हो वा कोई तैयारी कर रहे हैं? आपके भक्त अधूरे साक्षात्कार में राज़ी नहीं होंगे इसलिए अपने इष्ट देव रुप को सदा सजा सजाया हुआ रखो। समझा, अब क्या करना है?
देहली निवासियों को तैयार होना चाहिए क्योंकि सम्पूर्णता सम्पन्नता का झण्ड़ा और राज्य का झण्ड़ा दोनों देहली में होना है तो देहली निवासी फ्लैग सेरीमनी की डेट फिक्स करें - अभी से तीव्र तैयारियाँ करने लग जाना है। विदेशी तो पहला कार्य करेंगे। विदेशी विदेश से पॉवरफुल आवाज़ द्वारा विजय के झण्डे की नींव डालेंगे। सब विदेश के भिन्न-भिन्न स्थानों से विशेष आत्माओं के सहयोग के आधार से विजय का फाउण्डेशन पड़ेगा। जैसे आजकल की दुनिया में भी हर स्थान की मिट्टी एक स्थान पर इकट्ठी करते हैं तो हर विदेश के स्थान के विशेष व्यक्तियों के आवाज़ द्वारा भारत में विजय के झण्डे का फाउण्डेशन मजबूत होगा। तो विदेशी इस कार्य के फाउण्डर हैं। झण्डा लहराने के पहले फाउण्डेशन चाहिए। हर स्थान के निकले हुए विशेष आत्माओं रूपी फूलों का गुलदस्ता बापदादा और सर्व परिवार के आगे पहले विदेश भेंट करेगा। गुलदस्ता बन रहा है ना। ऐसी विशेष खुशबू अर्थात् विशेषता हो जो फारेन से भारत तक पहुँचती रहे। ऐसे खुशबूदार रूहानी रुहे-गुलाब, सदा-गुलाब का गुलदस्ता तैयार हो रहा है। जैसे कोई बहुत अच्छी मन को मोहित करने वाली खुशबू होती है तो न चाहते हुए भी उस तरफ अटेन्शन जाता ही है कि यह कहाँ से खुशबू आ रही है? तो रूहानी रुहे गुलाब फूलों की खुशबू जब भारत तक पहुँचेगी तो सबके अटेन्शन को अपने तरफ आकर्षित करेंगे। सब ढ़ूंढेंगे कि यह खुशबू कहाँ से आई? इस खुशबू का केन्द्र कहाँ है। अच्छा।
ऐसे सदा सजे सजाये मूर्ति, राजवंशी सो इष्ट वंशी सर्व आत्माओं को, सदा श्रेष्ठ संकल्पों द्वारा वरदान देने वाली, सर्व आत्माओं को रहमदिल बन मंज़िल दिखाने वाली, ऐसे महादानी वरदानी इष्ट देव आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
दादियों जी से बातचीत :-
बापदादा का एक प्रश्न है - कोई-कोई महारथियों के संस्कार ब्रह्मा समान ज्यादा हैं और कोई-कोई के विष्णु समान संस्कार हैं। कोई की जन्मपत्री में आदि से अन्त तक स्थापना के निमित्त बनने के संस्कार हैं और कोई-कोई के पालना के संस्कार हैं - इसका रहस्य क्या है? इस पर रुहरिहान करना। दोनों ही विशेष आत्मायें भी हैं लेकिन अन्तर भी विशेष है। तो दोनों में नम्बरवन कौन हुए और इसका भविष्य के साथ क्या सम्बन्ध है? वर्तमान दोनों की विशेष प्राप्तियाँ क्या हैं और दोनों के पूजन में भी अन्तर क्या है? इस पर रुहरिहान करना, बड़ी टापिक है ना। इस टापिक से अपना पूज्य रुप भी समझ सकेंगे कि मेरा कौन-सा रुप होगा? वह भासना आयेगी। जैसे अभी आपको कोई आप के नाम से बुलाता है तो झट फील होता है ना कि मुझे बुला रहे हैं - ऐसे स्पष्ट भासना आयेगी। अच्छा।
आज तो देहली का टर्न है। देहली पर सबको चढ़ाई करनी है, देहली की धरनी को प्रणाम जरुर करना है। देहली का विशेष पार्ट स्थापना में है और बाम्बे का विशेष पार्ट विनाश में है। कलकत्ते का पार्ट भी आवाज़ फैलाने में अच्छा सहयोगी रहेगा। अच्छा, अब देहली वाले क्या करेंगे?
देहली को दिल कहते हैं तो दिल की धड़कन कैसी है? बापदादा की दिल अर्थात् स्थापना की दिल। तो स्थापना की दिल का क्या हाल है? तीव्रगति है वा धीमी गति है? देहली वाले जब विशेष वर्ग की वैरायटी सर्विस कर गुलदस्ता तैयार करें तब कहेंगे स्थापना की तीव्रगति है। अभी सम्पर्क का धागा नहीं बाँधा है।
देहली की तरफ सबकी नज़र है। बाप की भी नज़र है तो सर्व की भी नज़र है क्योंकि स्थापना की बिन्दी भी वहाँ ही और राज्य की बिन्दी भी वही है। तो सबकी नज़र बिन्दु तरफ जानी है, देहली की महावीर पाण्डव सेना तो बहुत है। पाण्डवों को मिलकर हर मास कोई सबूत देना चाहिए क्योंकि देहली के सपूत मशहूर हैं। सपूत अर्थात् सबूत देने वाले। देहली से सेवा की प्रेरणा मिलनी चाहिए। जैसे सेन्ट्रल गवर्मेन्ट है तो सेन्टर द्वारा सर्व स्टेशन को डायरेक्शन मिलते हैं वैसे सेवा के प्लैन्स वा सेवा को नवीनता में लाने के लिए पार्लियामेन्ट होनी चाहिए। यही पाण्डव भवन, पाण्डव गवर्मेन्ट की पार्लियामेन्ट है। तो पार्लियामेन्ट में सब तरफ के सर्व मेम्बर्स की राय से नये रुल तैयार होते हैं। देहली से हर मास विशेष प्लैन्स आउट होने चाहिए तब समाप्ति समीप आयेगी और इसी पार्लियामेन्ट हाउस में जय-जयकार होगी। पाण्डवों ने अच्छी तरह सुना! शक्तियों के बिना पाण्डव कुछ कर ही नहीं सकते। शक्तियाँ पाण्डवों को आगे रखें और पाण्डव शक्तियों को आगे रखें तब विष्णुपुरी स्थापन होगी। विष्णुपुरी की स्थापना में कम्बाइन्ड का पार्ट है। तो स्थापना के कार्य में भी कम्बाइन्ड का कार्य चलने से ही सफलता होती है।
देहली में प्लैनिंग बुद्धि हैं, लेकिन अभी गुप्त हैं। अभी सब अपनी विशेषता रुपी अंगुली दो। सर्व के विशेषता की अंगुली से ही स्थापना का कार्य सम्पन्न होगा। विशेषता को गुप्त नहीं रखो। कार्य में लगाओ लेकिन निष्काम। तो जैसे स्थापना में नम्बरवन देहली रही वैसे विशेषताओं के गुलदस्ते में भी नम्बरवन बनना है। देहली में सब महारथियों के सहयोग के हाथ हैं, सर्व महारथियों के सहयोग का पानी देहली की धरनी में पड़ा हुआ है। देहली के फाउण्डेशन में कोई महारथी रहा नहीं है, सबने पानी दिया है। अभी सिर्फ योग की धूप चाहिए फिर देखो कितनी विशेष आत्माओं का प्रत्यक्ष फल निकलता है। स्वत: ही आपके पास लेने के लिए आयेंगे। देहली की धरनी की विशेषताएं बहुत हैं। पहले तो प्लैनिंग बनाओ, जिसमें चारों ओर के महारथी और शक्तियों का संगठन होना ही चाहिए। धरनी पर महारथियों का इकट्ठा होना भी स्थापना के कार्य को वृत्ति और वातावरण से समीप लाने का कार्य करता है। जैसे मधुबन चरित्र भूमि है, मिलन भूमि है, बाप को साकार रुप में अनुभव कराने वाली भूमि है वैसे देहली की धरनी सेवा को प्रत्यक्ष रुप देने के निमित्त है तब देहली से आवाज निकलेगा। अभी सबकी बुद्धियों में यह संकल्प तक उत्पन्न हुआ है कि जो कुछ कर रहे हैं, जो चल रहा है उससे कुछ होना नहीं है, अभी सब सहारे टूटने लगे हैं इसलिए ऐसे समय पर यथार्थ सहारा अभी जल्दी ढूंढ़ेंगे। माँग करेंगे। ऐसी नई बात कोई सुनावे और आखरीन में चारों तरफ भटकने के बाद बाप के सहारे के आगे सब माथा झुकायेंगे। समझे - अब देहली वालों को क्या करना है। अच्छा।