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12 Jan 1982
“विश्व का उद्धार - आधारमूर्त आत्माओं पर निर्भर”
12 January 1982 · हिंदी
आज बापदादा विश्व की आधारमूर्त आत्माओं को देख रहे हैं। सर्वश्रेष्ठ आत्मा विश्व के आधारमूर्त हो। आप श्रेष्ठ आत्माओं की ही चढ़ती कला वा उड़ती कला होती है तो सारे विश्व का उद्धार करने के निमित्त बन जाते हो। सर्व आत्माओं की जन्म-जन्मान्तर की आशायें मुक्ति वा जीवनमुक्ति प्राप्त करने की, स्वत: ही प्राप्त हो जाती हैं। आप श्रेष्ठ आत्मायें मुक्ति अर्थात् अपने घर का गेट खोलने के निमित्त बनती हो तो सर्व आत्माओं को स्वीट होम का ठिकाना मिल जाता है। बहुत समय का दु:ख और अशान्ति समाप्त हो जाती है क्योंकि शान्तिधाम के निवासी बन जाते हैं। जीवनमुक्ति के वर्से से वंचित आत्माओं को वर्सा प्राप्त हो जाता है। इसके निमित्त अर्थात् आधारमूर्त श्रेष्ठ आत्मायें, बाप आप बच्चों को ही बनाते हैं। बापदादा सदा कहते - पहले बच्चे पीछे हम। आगे बच्चे पीछे बाप। ऐसे ही सदा चलाते आये हैं। ऐसे विश्व के आधारमूर्त अपने को समझकर चलते हो? बीज के साथ-साथ वृक्ष की जड़ में आप आधारमूर्त श्रेष्ठ आत्माये हो। तो बापदादा ऐसी श्रेष्ठ आत्माओं से मिलन मनाने के लिए आते हैं। ऐसी श्रेष्ठ आत्मायें हो जो निराकार और आकार को भी आप समान साकार रुप में लाते हो। तो कितने श्रेष्ठ हो गये! ऐसे अपने को समझते हुए हर कर्म करते हो? इस समय स्मृति स्वरुप से सदा समर्थ स्वरुप हो ही जायेंगे। यह एक अटेन्शन स्वत: ही हद के टेन्शन को समाप्त कर देता है। इस अटेन्शन के आगे किसी भी प्रकार का टेन्शन, अटेन्शन में परिवर्तित हो जायेगा और इसी स्व-परिवर्तन से विश्व परिवर्तन सहज हो जायेगा। यह अटेन्शन ऐसा जादू का कार्य करेगा जो अनेक आत्माओं के अनेक प्रकार के टेन्शन को समाप्त कर बाप तरफ अटेन्शन खिंचवायेगा। जैसे आजकल सांइस के अनेक साधन ऐसे हैं - स्विच ऑन करने से चारों ओर का किचड़ा, गंदगी अपने तरफ खींच लेते हैं। चारों ओर जाना नहीं पड़ता लेकिन पॉवर द्वारा स्वत: ही खिंच जाता है। ऐसे साइलेंस की शक्ति द्वारा, इस अटेन्शन के समर्थ स्वरुप द्वारा, अनेक आत्माओं के टेन्शन समाप्त कर देंगे अर्थात् वे आत्मायें अनुभव करेंगी कि हमारा टेन्शन जो अनेक प्रयत्न से बहुत समय से परेशान कर रहा था वह कैसे समाप्त हो गया। किसने समाप्त किया! इसी अनुभूति द्वारा अटेन्शन जायेगा - शिव शक्ति कम्बाइण्ड रुप की तरफ।
तो टेन्शन अटेन्शन में बदल जायेगा ना! अभी तो बार-बार अटेन्शन दिलाते हो “याद करो - याद करो'' लेकिन जब आधारमूर्त शक्तिशाली स्वरुप में स्थित हो जायेंगे तो दूर बैठे भी अनेकों के टेन्शन को खींचने वाले, सहज अटेन्शन खिंचवाने वाले सत्य तीर्थ बन जायेंगे। अभी तो आप ढूंढने जाते हो। ढूंढने के लिए कितने साधन बनाते हो और फिर वे लोग आपको ढ़ूंढने आयेंगे, वा सदा आप ही ढूंढते रहेंगे?
साइंस भी श्रेष्ठ आत्माओं के श्रेष्ठ कार्य में सहयोगी है। थोड़ी-सी हलचल होने दो और स्वयं को अचल बना दो फिर देखो आप रुहानी चुम्बक बन अनेक आत्माओं को कैसे सहज खींच लेंगे क्योंकि दिन प्रतिदिन आत्मायें ऐसी निर्बल होती जायेंगी जो अपने पुरुषार्थ के पाँव से चलने योग्य भी नहीं होंगी। ऐसी निर्बल आत्माओं को आप शक्ति स्वरुप आत्माओं की शक्ति अपने शक्ति के पाँव दे करके चलायेगी अर्थात् बाप के तरफ खींच लेगी।
ऐसी सदा उड़ती कला के अनुभवी बनो तो अनेक आत्माओं को दु:ख, अशान्ति की स्मृति से उड़ाकर ठिकाने पर पहुंचा दो। अपने पंखो से उड़ना पड़ेगा। पहले स्वयं ऐसे समर्थ स्वरुप होंगे तब सत्य तीर्थ बन इन अनेकों को पावन बनाए मुक्ति अर्थात् स्वीट होम की प्राप्ति करा सकेंगे। ऐसे आधारमूर्त हो।
तो आज बापदादा ऐसे आधारमूर्त बच्चों को देख रहे हैं। अगर आधार ही हिलता रहेगा तो औरों का आधार कैसे बन सकेंगे। इसलिए आप अचल बनो तो दुनिया में हलचल शुरु हो जाए। और जरा-सी हलचल अनेकों को बाप तरफ सहज आकर्षित करेगी। एक तरफ कुम्भकरण जगेंगे, दूसरे तरफ कई आत्मायें जो सम्बन्ध वा सम्पर्क में भी आई हैं लेकिन अभी अलबेलेपन की नींद में सोई हुई हैं, तो ऐसे अलबेलेपन की नींद में सोई हुई आत्मायें भी जगेंगी। लेकिन जगाने वाले कौन? आप अचल मूर्त आत्मायें। समझा! सेवा का रुप ऐसे बदलने वाला है। इसके लिए सदा शिव शक्ति स्वरुप। अच्छा।
ऐसे सदा शान्ति और शक्ति स्वरुप, अपने समर्थ स्थिति द्वारा अनेकों को स्मृति दिलाने वाले, टेन्शन समाप्त कर अटेन्शन खिंचवाने वाले, ऐसे आधारमूर्त विश्व परिवर्तक बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
18 जनवरी स्मृति दिवस की सर्व बच्चों को यादप्यार देते हुए अव्यक्त बापदादा बोले:-
18 जनवरी की यादप्यार तो है ही 18 अध्याय का समर्थी स्वरुप। 18 जनवरी क्या याद दिलाती है? सम्पन्न फरिश्ता स्वरुप। फालो फादर का पाठ हर सेकेण्ड, हर संकल्प में स्मृति दिलाता है। ऐसे ही अनुभवी हो ना? 18 जनवरी के दिवस सब कहाँ होते हैं? साकार वतन में वा आकारी फरिश्तों के वतन में? तो 18 जनवरी सदा फरिश्ता स्वरुप, सदा फरिश्तों के दुनिया की स्मृति दिलाती है अर्थात् समर्थ स्वरुप बनाती है। है ही याद दिवस तो याद स्वरुप बनने का यह दिन है। तो समझा 18 जनवरी क्या है? ऐसे सदा बनना। यही स्मृति बार-बार दिलाती है। तो 18 जवनरी का यादप्यार हुआ - “बाप समान बनना'', सम्पन्न स्वरुप बनना। अच्छा, सभी को पहले से ही स्मृति की यादप्यार पहुंच ही जायेगी। अच्छा।