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14 Jan 1982
“कर्मेन्द्रिय जीत ही विश्व राज्य अधिकारी”
14 January 1982 · हिंदी
आवाज़ में आने के लिए वा आवाज़ को सुनने के लिए कितने साधन अपनाते हो? बापदादा को भी आवाज़ में आने के लिए शरीर के साधन को अपनाना पड़ता है। लेकिन आवाज़ से परे जाने के लिए इस साधनों की दुनिया से पार जाना पड़े। साधन इस साकार दुनिया में हैं। सेवा के अर्थ आवाज़ में आने के लिए कितने साधनों को अपनाते हो? लेकिन आवाज़ से परे स्थिति में स्थित होने के अभ्यासी सेकेण्ड में इन सबसे पार हो जाते हैं। ऐसे अभ्यासी बने हो? अभी-अभी आवाज़ में आये, अभी-अभी आवाज़ से परे। ऐसी कन्ट्रोलिंग पावर, रुलिंग पावर अपने में अनुभव करते हो? संकल्प शक्ति को भी, जब चाहो तब संकल्प में आओ, विस्तार में आओ, जब चाहो तब विस्तार को फुलस्टाप में समा दो। स्टार्ट करने की और स्टॉप करने की दोनों ही शक्तियां समान रुप में हैं?
हे कर्मेन्द्रियों के राज्यधारी, अपनी राज्य सत्ता अनुभव करते हो? राज्य सत्ता श्रेष्ठ है वा कर्मेन्द्रियों अर्थात् प्रजा की सत्ता श्रेष्ठ है? प्रजापति बने हो? क्या अनुभव करते हो? स्टॉप कहा और स्टॉप हो गया। ऐसे नहीं कि आप कहो स्टॉप और वह स्टार्ट हो जाए। सिर्फ हर कर्मेन्द्रिय की शक्ति को आंख से इशारा करो तो इशारे से ही जैसे चाहो वैसे चला सको। ऐसे कर्मेन्द्रिय जीत बनें तब फिर प्रकृतिजीत बन कर्मातीत स्थिति के आसनधारी सो विश्व राज्य अधिकारी बनो। तो अपने से पूछो - पहली पौढ़ी कर्मेन्द्रिय जीत बने हैं? हर कर्मेन्द्रिय “जी हजूर'' “जी हाज़िर'' करती हुई चलती है? आप राज्य अधिकारियों का सदा स्वागत अर्थात् सलाम करती रहती है? राजा के आगे सारी प्रजा सिर झुकाकर सलाम करती है?
हे राज्य अधिकारी, आप सबकी राज्य कारोबार कैसी है? मंत्री, उपमंत्री कहाँ धोखा तो नहीं देते हैं? चेक करते हो अपनी राज्य कारोबार को? राज्य दरबार रोज़ लगाते हो या कभी-कभी? क्या करते हो? राज्य अधिकारी के यहाँ के संस्कार भविष्य में कार्य करेंगे। चेक करते हो कि वर्तमान समय मुझ आत्मा के राज्य अधिकारी के संस्कार हैं अर्थात् हद के राज्य अधिकारी के संस्कार हैं वा बेहद विश्व महाराजन् के संस्कार हैं वा उनसे भी लास्ट पद दास-दासी के संस्कार हैं? साकार में भी सुनाया था कि दास-दासी बनने की निशानी क्या है? जो किसी भी समस्या वा संस्कार के अधीन बन उदास रहता है, तो उदास वा उदासी ही निशानी है - दास दासी बनना। तो मैं कौन? यह स्वयं ही स्वयं को चेक करो। कहाँ किसी भी प्रकार की उदासी की लहर तो नहीं आती? उदास अर्थात् अभी भी दास हैं, तो ऐसे को राज्य अधिकारी कैसे कहेंगे?
इसी तरह से साहूकार प्रजा भी होगी। तो यहाँ भी कई राजे नहीं बने हैं लेकिन साहूकार बने हैं क्योंकि ज्ञान रत्नों का खजाना बहुत है, सेवा कर पुण्य का खाता भी जमा बहुत है। लेकिन समय आने पर स्वयं को अधिकारी बनाकर सफलतामूर्त बन जाएं, वह कन्ट्रोलिंग पावर और रुलिंग पावर नहीं है अर्थात् नॉलेजफुल हैं लेकिन पावरफुल नहीं हैं। शस्त्रधारी हैं लेकिन समय पर कार्य में नहीं ला सकते हैं। स्टॉक है लेकिन समय पर न स्वयं यूज़ कर सकते और न औरों को यूज़ करा सकते हैं। विधान आता है लेकिन विधि नहीं आती। ऐसे भी संस्कार वाली आत्मायें हैं अर्थात् साहूकार संस्कार वाली हैं। जो राज्य अधिकारी आत्माओं के सदा समीप के साथी ज़रुर होते हैं लेकिन स्व अधिकारी नहीं होते। समझा? अभी आप ही सोचो कि वर्तमान समय अब तक मैं कौन बना हूँ? अभी भी बदल सकते हो। अभी भी फाइनल सीट के सेटिंग की सीटी नहीं बजी है। फुल चांस है। लेकिन औरों को भी क्या कहते हो? अब नहीं तो कब नहीं क्योंकि कुछ समय के पहले के संस्कार चाहिए। लास्ट समय के नहीं। इसलिए डबल विदेशी ग्रुप गोल्डन चांस लेने वाले चांसलर ग्रुप बनो। तो सब कौन से ग्रुप के हो? अच्छा।
आज अमेरिका और आस्ट्रेलिया का टर्न है तो दोनों ही कौन-सा ग्रुप हो? कौन-सा ग्रुप लाई हो? आस्ट्रेलिया वाले क्या समझते हैं? चांसलर्स ग्रुप है? आस्ट्रेलिया की शक्तियां क्या समझती हैं? शक्ति दल भी कम नहीं है। पाण्डव हैं तो शक्तियाँ, शक्तियाँ है। दोनों ही अपनी रफ्तार से चल रहे हैं। आस्ट्रेलिया में शक्तियाँ ज्यादा हैं या पाण्डव? (दोनों समान हैं) शक्तियाँ थोड़ी रेस्ट कर रही हैं फिर ज्यादा उड़ेगी ना इसलिए रेस्ट कर रही हैं। बाकी जाना तो नम्बरवन है। ऐसे कई करते हैं बीच में थोड़ी रेस्ट ले करके फिर फास्ट जाते हैं और मंजिल पर पहुंच जाते हैं। अच्छा।
सदा कर्मेन्द्रिय जीत, प्रकृति जीत, सूक्ष्म संस्कार जीत अर्थात् मायाजीत, स्वराज्य अधिकारी, सो विश्व राज्य अधिकारी ऐसे राज्यवंशी, राजऋषि आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
आस्ट्रेलिया पार्टी से:- बापदादा को आप लोगों से ज्यादा बच्चों की याद आती रहती है? बापदादा भी रोज़ बच्चों की मोला सिमरण करते हैं। आप कभी मिस भी करो, बापदादा मिस नहीं करेंगे। हरेक मणके का अपना-अपना नम्बर है। हैं तो माला में। कितने बार बापदादा ने आप सबकी माला सिमरण की होगी? आस्ट्रेलिया वालों के ऊपर तो बापदादा को सदा ही नाज़ है क्यों? क्योंकि आस्ट्रेलिया निवासियों ने बाप को पहचान अपना बनाने में नम्बरवन रिकार्ड दिखाया है। संख्या में देखो, वृद्धि में देखो, क्वालिटी में देखो, सबमें आगे है। और अच्छी तरह से सम्भाल रहे हैं। इसलिए आस्ट्रेलिया कम नहीं है, लण्डन में फिर भी भारतवासी आत्मायें ज्यादा हैं लेकिन आस्ट्रेलिया में सब पर्दे के अन्दर छिपे हुए बाप को पहचानने में नम्बरवन हैं। इसलिए बापदादा को प्रिय हैं। समझा।
आस्ट्रेलिया निवासी सब अपने को डबल लाइट स्वरुप अनुभव करते हो? डबल लाइट अर्थात् सदा हर समस्या को सहज पार करने वाले। ऐसे अनुभव करते हो? शक्तियां क्या सोच रही हैं। शक्तियां सोचती हैं कि कोई ऐसा मधुबन से वरदान लेकर के जाएं जो जाते ही विजय का झण्डा लहरायें। आस्ट्रेलिया निवासियों के प्रति बापदादा सदा महिमा के पुष्प चढ़ाते हैं क्योंकि पहले-पहले सर्विस की वृद्धि का सबूत आस्ट्रेलिया निवासियों का है। लण्डन में भी सेवा की वृद्धि तो हुई है लेकिन कई वृक्ष में जैसे शाखा ही तना बन जाता है। ऐसे आस्ट्रेलिया भी निकला लण्डन से ही है लेकिन अभी तना बन गया है। यह भी विशेषता है ना। सदा सबमें राजी रहने वाले हो। राजी रहना अर्थात् सब राज़ को जान लेना। इसलिए मैजारिटी सन्तुष्ट आत्मायें हो। सन्तुष्ट मणियां हो। कैसा भी वायुमण्डल में हलचल हो लेकिन आप सदा अचल रहने वाले हो ना? क्योंकि बाप के साथ रहने वाले हो। जैसे बाप सदा अचल है वैसे साथ रहने वाले भी अचल ही होंगे ना।
सानफ्रांसिसको:- सभी ब्रह्माकुमार और कुमारियों का विशेष कर्तव्य क्या है? ब्रह्मा बाप का विशेष कर्तव्य क्या है? ब्रह्मा का कर्तव्य ही है नई दुनिया की स्थापना। तो ब्रह्माकुमार और कुमारियों का विशेष कर्तव्य क्या हुआ? स्थापना के कार्य में सहयोगी। तो जैसे अमेरिका में विनाशकारियों के विनाश की स्पीड बढ़ती जा रही है। ऐसे स्थापना के निमित्त बच्चों की स्पीड भी तीव्र है? वे तो बहुत फास्ट गति से विनाश के लिए तैयार हैं। ऐसे आप सभी भी स्थापना के कार्य में इतने एवररेडी तीव्रगति से जा रहे हो? उन्हों की स्पीड तेज है या आपकी तेज है? वो 15 सेकेण्ड में विनाश के लिए तैयार हैं और आप - एक सेकेण्ड में? क्या गति है? सेकेण्ड में स्थापना का कार्य अर्थात् सेकेण्ड में दृष्टि दी और सृष्टि बन गई - ऐसी स्पीड है? तो सदा स्थापना के निमित्त आत्माओं को यह स्मृति रखनी चाहिए कि हमारी गति विनाशकारियों से तेज हो क्योंकि पुरानी दुनिया के विनाश का कनेक्शन नई दुनिया की स्थापना के साथ-साथ है। पहले स्थापना होनी है या विनाश? स्थापना की गति पहले तेज चाहिए ना! स्थापना की गति तेज करने का विशेष आधार है - सदा अपने को पावरफुल स्टेज पर रखो। नॉलेजफुल के साथ-साथ पावरफुल स्टेज पर रखो। नॉलेजफुल के साथ पावरफुल दोनों कम्बाइण्ड हो तब स्थापना का कार्य तीव्रगति से होगा। तो कहाँ से तीव्रगति का फाउन्डेशन पड़ेगा? अमेरिका से। अमेरिका में भी कई सेवाकेन्द्र हैं। तो सभी यह लक्ष्य रखना कि नम्बरवन हम ही जायेंगे! तो आपके सेन्टर द्वारा पहले-पहले आत्मिक बॉम्ब चलेगा ना? उससे क्या होगा? सभी बाप के परिचय को जान लेंगे। जैसे उस बाम्ब से विनाश होता है ना! तो इस आत्मिक बॉम्ब से अधंकार का विनाश हो जायेगा। तो यह बॉम्ब छोड़ने की कौन-सी तारीख है? वह गवर्मेन्ट भी डेट बतलाती है ना कि इस तारीख को रिहर्सल होगी, तो आपके रिहर्सल की डेट कब होगी? अच्छा।
विदेश की टीचर्स बहनों ने अव्यक्त बापदादा के साथ पिकनिक की:-
पिकनिक हो गई? सुनते तो रहते ही हो? कभी खायेंगे, कभी सुनेंगे... यही तो ईश्वरीय परिवार की विशेषता है। जो अभी-अभी शिक्षक के सामने, अभी-अभी बाप के सामने, अभी-अभी सखा के सामने। यह बहुरुप का अनुभव सारे कल्प में न कोई कर सकता है और न करा सकता है। यह एक ही बाप का पार्ट संगम पर है। सतयुग में अगर चाहो बापदादा से पिकनिक मनायें तो मना सकेंगे? अभी जो चाहो, जिस रुप में चाहो उसी रुप में मिलन मना सकते हो। इसलिए यह भी आप विशेष सेवाधारियों का भाग्य है।
बापदादा तो अमृतवेले से हर बच्चे का भाग्य देखते रहते हैं कि कितने प्रकार के भाग्य हर आत्मा के नूंधे हुए हैं। अमृतवेला ही भाग्य ले आता है। रुहानी मिलन का भाग्य अमृतवेला ही ले आता है ना। हर कर्म में आपका भाग्य है। देखते हो तो बाप को। यह आंखें मिली ही हैं बाप को देखने के लिए। कान मिले हैं बाप का सुनने के लिए। तो भाग्य हो गया ना! हर कर्मेन्द्रिय का भाग्य है। पांव मिले हैं हर कदम पर कदम रखने के लिए। ऐसे हर कमेंन्द्रिय का अपना-अपना भाग्य है। तो लिस्ट निकालो कि कितने भाग्य सारे दिन में प्राप्त होते हैं! बाप को देखा, बाप का सुना, बाप के साथ सोया, बाप के साथ खाया, सब कुछ बाप के साथ करते हो। सेवा की तो भी बाप का परिचय दिया, बाप से मिलाया... तो कितना भाग्य हो गया? तो बापदादा सदा हर बच्चे के भाग्य की लकीर कितनी स्पष्ट और लम्बी है, क्लीयर है - वह देखते हैं। भाग्य की लकीर बीच-बीच में कट तो नहीं जाती है! जुड़ती है और टूटती है या जबसे जुड़ी है तब से अखण्ड अटूट है। खण्डित होने से लकीर फिर बदल जाती है इसलिए अटूट और अखण्ड। तो ऐसा बच्चों का नजारा देखते रहते हैं, बाप को और क्या काम है? विश्व सेवा के लिए तो आपको निमित्त बना दिया। बाकी बाप का क्या काम रहा? (बाबा ही तो सब कर रहे हैं) सिर्फ बैकबोन बनने का काम बाप का है। बाकी बच्चों से मिलना, बच्चों को देखना, बच्चों से रुहरिहान करना, बच्चों को चलाना, यही काम रह गया है ना! आप लोगों का विश्व से काम है और बाप का आप बच्चों से काम है। विश्व के आगे बाप को दिखाते तो आप बच्चे हो ना! बच्चों द्वारा बाप दिखाई देता है। बैकबोन तो बाप है ही। अगर बाप बैकबोन न बने तो आप अकेले थक जाओ। मोह भी है ना। तो बच्चों की थकावट भी बाप नहीं देख सकते। इसलिए देखो हर साल यहाँ आते हो थकावट खत्म करने। यहाँ आकर सेवा की जिम्मेदारी का ताज उतार देते हो ना! वहाँ तो एक-एक बात में देखेंगी - कोई देख तो नहीं रहा है, कोई सुन तो नहीं रहा है। यहाँ अगर कुछ होगा भी तो समझेंगे दीदी, दादी बैठी हैं बाप-दादा बैठा है, आपेही ठीक कर देगा। यहाँ फिर भी फ्री हो। तो विदेश की सेवा में अनुभव भी अच्छे होते हैं ना? डबल नॉलेजफुल हो गई ना? अच्छा।
आबू कॉन्फ्रेंस के लिए कोई विशेष प्लेन :-
आबू कॉन्फ्रेंस में स्नेही बनाकर लाना सिर्फ वी.आई. पीज् नहीं। आप स्नेही बनाकर लाना, यहाँ सम्बन्ध जुड़ जायेगा। (स्नेही बनाने का साधन क्या है?) जितना-जितना बाप की जिगर से महिमा करेंगे तो आप महिमा करेंगे और वे मोहित होते जायेंगे। आप बाबा-बाबा कहते जायेंगे, महानता सुनाते जायेंगे और वो स्नेही बनते जायेंगे। जहाँ महानता अनुभव होती है वहाँ स्वयं ही सिर झुक जाता है। जैसे भक्त लोग जड़ में महानता की भावना रखते हैं तो सिर झुक जाता है। कहाँ वह जड़, कहाँ वह चैतन्य, फिर भी सिर झुक जाता है। यहाँ भी देखो कोई प्राइममिनिस्टर या प्रेजीडेन्ट है तो उनका भी महानता के आगे आटोमेटिक सिर झुक जाता है ना। तो आप भी बाप की महानता सुनाती जायेंगी और उनका सिर झुकता जायेगा। आप लोग तो होशियार हो गई हैं ना! साइंस का भी नॉलेज है, साइलेंस का भी है, देश का भी है तो विदेश का भी है। तो अनुभव भी एक शक्ति है, सबसे बड़ी शक्ति अनुभव है। अनुभव सुनाते हो तो सभी खुश होते हैं ना। अनुभव करने वाला स्वयं भी शक्तिशाली बन जाता है। यह भी एक बड़ा शस्त्र है। वैसे बोलने वाले तो अनेक हैं लेकिन अनुभव की शक्ति किसी के पास भी नहीं है। यहाँ विशेषता ही अनुभव की है। बोलने वाले के आगे अनुभव वाले का ही महत्व है। धीरे-धीरे साइन्स वाले, चाहे शास्त्र वाले दोनों ही यह समझेंगे कि हम ऊपर-ऊपर के हैं, फाउन्डेशन हम लोगों का नहीं है। और इन्हों का अनुभव फाउन्डेशन है। चाहे चन्द्रमा तक भी चले गये लेकिन अपने आप की अनुभूति नहीं है। चन्द्रमा पर गये तो क्या हुआ? तो यह महसूस करेंगे लेकिन अन्त में करेंगे क्योंकि वारिस तो बनना नहीं है। तो अन्त में साइंस अर्थात् शस्त्रधारी और शास्त्रधारी दोनों ही समझेंगे कि हम क्या हैं और यह क्या हैं! अच्छा।
सभी खुश तो हो ना! कोई मुश्किल तो नहीं है! सहजयोगी हो? सहज सेवाधारी हो?
(विदेश की बहनें-दीदी-दादी को विदेश सेवा के लिए विदेश में आने का निमन्त्रण दे रही हैं।) वर्तमान समय जबकि 83 आदि में ही यहाँ सभी को लाना है, और सबको यहाँ आना ही है, तो यहाँ की सेवा के ऊपर विशेष अटेन्शन देने की आवश्यकता है। और वहाँ से भी अगर ऐसा कोई निमन्त्रण मिला यू.एन.ओ. वगैरा का तो फिर जाना जरुरी है। बाकी जो अपनी कॉन्फ्रेंस आदि करते हो उसके लिए इतनी आवश्यकता नहीं है क्योंकि उन्हें ही यहाँ लाना है। इसलिए सब बातों को देखते हुए अभी इतना आवश्यक दिखाई नहीं देता है। बाकी अभी विदेश तो ऐसा है, अभी-अभी यहाँ, अभी-अभी वहाँ। ऐसा कोई कार्य हुआ तो पहुंच जायेंगे।
यू.एन.ओ. में जो सम्पर्क बढ़ा रहे हो, यह सम्पर्क बढ़ना ही सेवा है। और भी जितना हो सके उन्हों को होमली सम्पर्क में ले आओ। जैसे यह शैली (यू.एन.ओ.की) आई वह भी स्नेह सम्पर्क से आकर्षित हुई ना। प्रेम की पालना मिली क्योंकि बड़े-बड़े आफीसर जहाँ जाते हैं वहाँ वह उसी पोस्ट पर होने के कारण ऑफिशियल रहते हैं, प्रेम की पालना उन्हें नहीं मिलती है। यहाँ तो सम्बन्ध का रस मिलता है। यही यहाँ की विशेषता है। जो भी सम्पर्क सम्बन्ध में आते हैं उन्हों को परिवार की फीलिंग आये। अनुभव करें कि यह कोई बहुत समीप की आत्मा खोई हुई मिली है। सम्पर्क बढ़ाना यही सेवा ठीक है। जितना-जितना नजदीक आते रहेंगे वह अनुभव करेंगे कि इन्हों के पास जो चाहिए वही है।
शैली बच्ची द्वारा बहुतों की सेवा हो रही है और होगी भी। स्नेह का तीर लग गया है। लगन अच्छी है। जो चाहती थी उसकी विधि भी मिल गई है। समझती भी है कि विधि यहाँ से मिलती है। उसको यादप्यार देना और यही कहना कि बापदादा की आप में बहुत उम्मीदें हैं और सफलता के सितारे की नूंधी हुई है। ऐसा बापदादा तकदीर देख रहे हैं। कई प्रकार की अत्माओं का पार्ट है। चाहे पूरा कनवर्ट न भी हो लेकिन कनवर्ट कराने के तो निमित्त है। दिल से बाप को माना है और यह डबल तरफ पार्ट बजाना यह भी जरूरी है, इसी से सेवा होगी। इसका इतना रहना ही सेवा है। पूरा बदल जाए तो सेवा नहीं होगी। इसको इस सेवा का फल भी अच्छा मिलेगा।
स्टीव-नारायण (ग्याना के उपराष्ट्रपति) उनके परिवार को यादप्यार देते हुए :-
उन्हें जिगरी बहुत-बहुत याद देना। बहुत अच्छे तन-मन-धन तीनों से पूरे सहयोगी, निश्चयबुद्धि, नम्बरवन बच्चे हैं। उस बजेट के कारण नहीं आ सके लेकिन पांडव गवर्मेन्ट की बजेट में बुद्धि से यहाँ पहुंचे हुए हैं। बहुत ही नम्रचित बच्चा है। परिवार ही ड्रामा अनुसार सर्विसएबुल है। हिम्मत भी अच्छी है। परिवार का परिवार ही स्नेही है। अन्धश्रद्धा नहीं है, नॉलेज के आधार पर स्नेही है। इन्हों के ही सम्पर्क से अमेरिका में पहुंचे। यह बेहद सेवा के निमित्त विशेष आत्माओं की सेवा के निमित्त बने हुए हैं। इसको कहते हैं एक की नॉलेज से अनेकों पर प्रभाव। बड़ा माइक है। इनको देखकर वहाँ की गवर्मेन्ट पर भी अच्छा प्रभाव है। नालेज का, योग का अच्छा प्रभाव है। अच्छे सेवाधारी हैं।