
“जब भीतर पवित्रता की शक्ति कम लगे — तो याद करो, पवित्रता ही मेरा स्वधर्म है; मेरा हर संस्कार ईश्वरीय विरासत से पावन है”
यह ध्यान आत्मा को उसकी सच्ची पवित्रता की गहराई से जोड़ता है, जिससे भीतर से स्वच्छ, शांत और शक्तिशाली अनुभूति होती है। यह अनुभव आत्मा को विकारों से ऊपर उठाकर दिव्यता की ओर ले जाता है, जिससे उसकी दृष्टि, वृत्ति और कृति स्वतः ही पावन हो जाती है। इस अभ्यास से आत्मा में परमात्मा की पवित्रता समा जाती है और शरीर व मन दोनों निर्मल हो जाते हैं।आपकी हर कर्मेन्द्रिय शांत, पवित्र हो जाएगी |
आप इस ध्यान के बाद स्वयं को एक दिव्य, श्रेष्ठ, और प्रकाशमय पवित्र आत्मा अनुभव करेंगे..
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मैं एक आत्मा हूँ। देह से न्यारी, एक शुद्ध पवित्र शक्ति हूँ। मैं आत्मा ज्योति बिंदु स्वरूप हूँ — एक चमकता हुआ दिव्य सितारा। मैं आत्मा पवित्र स्वरूप हूँ। पवित्रता मुझ आत्मा का निजी गुण है। मेरे संस्कार भी अति पवित्र हैं। प...
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