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11 Apr 1973
“परिवर्तन”
11 April 1973 · हिंदी
वर्तमान समय को परिवर्तन का समय कहते हैं। इस समय के अनुसार जो निमित्त बने हुए हैं उनमें भी अवश्य हर समय परिवर्तन होता जा रहा है तभी तो उनके आधार से समय परिवर्तन होता है। समय एक परिवर्तन का आधार है। परिवर्तन करने वालों के ऊपर अर्थात् जो परिवर्तन करने के लिए निमित्त बने हुए हैं, वह अपने में ऐसे अनुभव करते हैं कि हर समय मन्सा, वाचा और कर्मणा सभी रूप से परिवर्तन होता जा रहा है? इसको कहेंगे - ‘चढ़ती कला का परिवर्तन'। परिवर्तन तो द्वापर में भी होता है, परन्तु वह है गिरती कला का परिवर्तन। अभी संगम पर है चढ़ती कला का परिवर्तन। तो जब समय अनुसार भी चढ़ती कला का परिवर्तन है, जो तो निमित्त आधार मूत्र्तियाँ हैं उनमें भी अवश्य ऐसे ही परिवर्तन है। ऐसे अनुभव करते हो कि परिवर्तन होता जा रहा है? परिवर्तन की स्पीड कभी चेक की है? परिवर्तन तो एक सप्ताह में होता है, एक दिन में और एक घण्टे में भी होता है, हाँ, टोटल कहेंगे परिवर्तन हो रहा है। लेकिन अभी के समय प्रमाण परिवर्तन की स्टेज क्या होनी चाहिए, वह अनुभव करते हो? जो मुख्य निमित्त बने हुए महावीर हैं यदि उनको किसी भी बात में परिवर्तन लाने में समय लगता है, तो फाईनल परिवर्तन में भी अवश्य समय लगेगा।
निमित्त बने हुए महावीर जो हैं वह हैं मानों समय की घड़ी। जैसे घड़ी समय स्पष्ट दिखाती है, इसी प्रकार महावीर जो बनते हैं, निमित्त बने हुए हैं, वह भी घड़ी हैं, तो घड़ी में समय नज़दीक दिखाई पड़ता है या दूर? स्वयं घड़ी हो और स्वयं ही साक्षी हो समय को चेक करने वाले हो, तो परिवर्तन की प्रगति फास्ट है? फाइनल परिवर्तन जिससे सृष्टि का भी फाइनल परिवर्तन हो। अभी आप में थोड़ा-थोड़ा परिवर्तन होता है, तो सृष्टि की हालतों में भी थोड़ा-थोड़ा परिवर्तन है। लेकिन फाइनल सम्पूर्ण परिवर्तन की निशानी क्या है, जिससे समझें कि यह परिवर्तन की सम्पूर्ण स्टेज है?
अभी के परिवर्तन की स्टेज, सम्पूर्ण परिवर्तन की निशानी, वर्ष गिनती करते-करते अब बाकी समय क्या रहा है? परिवर्तन ऐसा हो जो सभी के मुख से निकले कि इनमें तो पूरा ही परिवर्तन आ गया है। अपने परिवर्तन की बात पूछते हैं, सदा काल के लिए नेचुरल रूप में दिखाई दे, वह कैसे होगा? अभी नेचुरल रूप में नहीं है। अब पुरुषार्थ से थोड़े समय के लिए वह झलक दिखाई देती है लेकिन नेचुरल रूप सदा काल रहता है तो सम्पूर्ण परिवर्तन की निशानी यह है। हरेक में जो कमजोरी का मूल संस्कार है यह तो हरेक अपना-अपना जानते हैं। कभी भी कोई स्टेज में सम्पूर्ण पास नहीं होते, परसेन्टेज में पास हो जाते हैं, इसका कारण यह है। तो हर बात में हरेक में विशेष रूप से जो मूल संस्कार है, जिसको आप नेचर कहती हो तो वह दिखाई देवे कि उनका पहले यह संस्कार था, अभी यह नहीं है। आपस में एक-दूसरे के मूल संस्कार वर्णन भी करते हैं। यह पुरुषार्थ में बहुत अच्छे हैं लेकिन यह संस्कार इनको समय-प्रति-समय आगे बढ़ने में रुकावट डालता है। उन मूल संस्कारों में जब तक पूरा परिवर्तन नहीं हुआ है तब तक सम्पूर्ण विश्व का परिवर्तन हो नहीं सकता। सभी में सम्पूर्ण परिवर्तन हो वह तो दूसरी बात है। वह तो नम्बरवार रिजल्ट में भी होता है। लेकिन जो परिवर्तन के मूल आधार मूर्तियाँ हैं जिनको महावीर और महारथी कहते हैं उनके लिए यह परिवर्तन आवश्यक है। जो कोई भी ऐसे वर्णन न करे कि इनके यह संस्कार तो शुरू से ही हैं। इसलिए अब परसेन्टेज में भी दिखाई देते हैं। यह वर्णन करने में नहीं आयें, दिखाई न दें, इसको कहा जाता है सम्पूर्ण परिवर्तन। अगर जरा अंश मात्र भी हैं तो उसको सम्पूर्ण परिवर्तन नहीं कहेंगे। साधारण परिवर्तन महारथियों से थोड़ेही पूछेंगे। जो विश्व-परिवर्तन के निमित्त बने हुए हैं उनके परिवर्तन की स्टेज भी औरों से ऊंची होगी तो यह चेकिंग होनी चाहिए? रात-दिन का अन्तर दिखाई दे, इस पर ही लकी स्टार्स का गायन है। ज्ञान सूर्य, ज्ञान चन्द्रमा तो अपने स्टेज पर हैं, लेकिन सम्पूर्ण परिवर्तन में लकी स्टार्स का नाम बाला है। वर्तमान समय साकार रूप में फॉलो तो सभी आप लोगों को करते हैं ना? बुद्धि योग से शक्ति लेना, बुद्धियोग से श्रेष्ठ कर्म को फॉलो करना - वह तो मात-पिता निमित्त हैं। लेकिन साकार रूप में अब किसको फॉलो करेंगे? जो निमित्त हैं। तो परिवर्तन का ऐसा उदाहरण बनो। वर्ष में एक-दो बारी भी ऐसा संगठन हो जाये। हर समय के संगठन में अपनी चढ़ती कला का परिवर्तन है। जैसे जो वर्ष बीत चुका है, उसमें स्नेह, सम्पर्क, सहयोग, इसमें चढ़ती कला और परिवर्तन है। अभी सम्पूर्ण स्टेज प्रत्यक्ष रूप में दिखाई दे। इस वर्ष में यह परिवर्तन विशेष रूप में होना आवश्यक है।
अब धीरे-धीरे प्रत्यक्षता के लिये जानबूझ कर बम लगाने शुरू किए हैं ना? जब धर्म-युद्ध की स्टेज पर आना है। आप लोग एक बात में ही हार खिला सकते हो कि धर्म और धारणा, उन लोगों का प्रैक्टिकल नहीं है और परमात्म-ज्ञान का प्रूफ आपका प्रैक्टिकल लाइफ है। एक तरफ धर्म-युद्ध की स्टेज, दूसरी तरफ प्रैक्टिकल धारणामूर्त की स्टेज। अगर इन दोनों का साथ नहीं होगा तो आप लोग की चैलेंज है प्रैक्टिकल लाइफ की, वह प्रत्यक्ष रूप में दिखाई नहीं देगी। जैसे-जैसे आगे आते जाते हो, वैसे इस बात पर भी अटेन्शन देना है। प्रैक्टिकल में ज्ञान अर्थात् धारणामूर्त, ज्ञान मूर्त वा गुण-मूर्त। मूर्त से भी वह ज्ञान और गुण दिखाई देवें। आजकल डिसकस करने से अपनी मूर्त को सिद्ध नहीं कर सकते लेकिन मूर्त से उनको एक सेकण्ड में शान्त करा सकते हो। एक तरफ भाषण हो, लेकिन दूसरी तरफ फिर प्रैक्टिकल मूर्त भी हो, तब धर्म-युद्ध में सक्सेसफुल होंगे; इसलिए जैसे सर्विस का प्रोग्राम बनाते हो, साथ-साथ अपने प्रोग्राम में भी प्रोग्रेस करो। यह भी होना आवश्यक है। अपने पुरुषार्थ की प्रोग्रेस का, अपने-अपने पुरुषार्थ के भिन्न-भिन्न अनुभव का लेन-देन करने का भी प्रोग्राम साथ-साथ होना चाहिए। दोनों का बैलेन्स साथ-साथ हो। अच्छा!