Search for a command to run...
25 January 1974 · हिंदी
जैसे अपना साकार स्वरूप सदा और सहज स्मृति में रहता है, क्या वैसे ही अपना निराकारी स्वरूप सदा और सहज स्मृति में रहता है? जैसे साकार स्वरूप अपना होने के कारण स्वत: ही स्मृति में रहता है, क्या वैसे निराकारी स्वरूप भी अपना है तो अपनापन सहज याद रहता है? अपनापन भूलना मुश्किल होता है। स्थूल वस्तु में भी जब अपनापन आ जाता है, तो वह स्वत: ही याद रहती है, उसे याद किया नहीं जाता है। यह भी अपना निजी और अविनाशी स्वरूप है, तो इसको याद करना मुश्किल क्यों? जानने के बाद तो, सहज स्मृति में ही रहना चाहिए। जान तो लिया है न? अब इसी स्मृति-स्वरूप के अभ्यास की गुह्यता में जाना चाहिए।
जैसे साइंस वाले हर वस्तु की गुह्यता में जाते हैं और नई-नई इन्वेन्शन (खोज) करते रहते हैं ऐसे ही अपने निजी स्वरूप और उसके अनादि गुण व संस्कार इन एक-एक गुण की डीपनेस (गहराई) में जाना चाहिए। जैसे आनन्द स्वरूप कहते हैं, तो वह आनन्द स्वरूप की स्टेज क्या है? उसकी अनुभूति क्या है, आनन्द स्वरूप होने से उसकी विशेष प्राप्ति क्या है और आनन्द कहा किसको जाता है? उस समय की स्थिति का प्रत्यक्ष प्रभाव स्वयं पर और अन्य आत्माओं पर क्या होता है? ऐसे हर गुण की गुह्यता में जाओ। जैसे वे लोग सागर के तले में जाते हैं और जितना अन्दर जाते हैं, उतना ही उन्हें नये-नये पदार्थ प्राप्त होते हैं। ऐसे ही आप जितना अन्तर्मुख होकर स्वयं में खोये हुए रहोगे तो आपको बहुत नये-नये अनुभव होंगे। ऐसे महसूस करोगे जैसे कि आप इसमें खोये हुए हैं।
जैसे मछली पानी के अन्दर रहती हुई अपना जीय दान महसूस करती है, उसका लगाव पानी से होता है। शरीर निर्वाह-अर्थ यदि बाहर निकलेगी भी, तो एक सेकेण्ड बाहर आयी और फिर अन्दर चली जायेगी, क्योंकि बिना पानी के वह रह नहीं सकती। ऐसे आप सबकी लगन अपने निजी स्वरूप के भिन्न-भिन्न अनुभव के सागर से होनी चाहिए। कार्य-अर्थ बाह्यमुखता में आये, इन्द्रियों का आधार लिया अर्थात् साकार स्वरूपधारी स्थिति में आये लेकिन लगाव और आकर्षण उस अनुभव के सागर ही की तरफ होना चाहिए।
जैसे स्थूल वस्तु अपनी भिन्न-भिन्न रसनाओं का अनुभव कराती है न? जैसे मिश्री अपनी मिठास का अनुभव कराती है और हर गुण वाली वस्तु अपने गुण का अनुभव कराती हुई अपनी तरफ आकर्षित कराती है। ऐसे ही आप अपने निजी स्वरूप के हर गुण की रसना का अनुभव अन्य आत्माओं को कराओ। तब ही आत्मायें आकर्षित होंगी। तो अब यह अनुभव करना और कराना, यही अपना विशेष कर्तव्य समझो। वर्णन के साथ-साथ हर गुण की अनुभूति कराओ। वह तब करा सकोगे जब स्वयं इस सागर में समाये होंगे तो क्या ऐसा समाये हुए रहते हो? इससे सहज स्मृति स्वरूप हो जायेंगे।
याद कैसे करें? इसकी बजाय यह क्वेश्चन (प्रश्न) उठे कि याद भूल कैसे सकती है? इतना परिवर्तन आ जाये। अभी तो सिर्फ थोड़ा सा अनुभव किया है। सिर्फ चख कर देखा है। जब उसमें खो जायेंगे तब कहेंगे खाया भी और स्वरूप में भी लाया। अभी बहुत अनुभव करने की आवश्यकता है। जब इस अनुभव में चले जायेंगे तो फिर यह छोटी-छोटी बातें स्वत: ही किनारा कर लेंगी, अर्थात् विदाई ले लेंगी! अच्छा!