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1 Sept 1975
“समीप और समान, महीन और महान”
1 September 1975 · हिंदी
सभी स्वयं को कर्मातीत अवस्था के नज़दीक अनुभव करते जा रहे हो? कर्मातीत अवस्था के समीप पहुँचने की निशानी जानते हो? समीपता की निशानी समानता है। किस बात में? आवाज़ में आना व आवाज़ से परे हो जाना, साकार स्वरूप में कर्मयोगी बनना और साकार स्मृति से परे न्यारे निराकारी स्थिति में स्थित होना, सुनना और स्वरूप होना, मनन करना और मगन रहना, रुह-रुहान में आना और रुहानियत में स्थित हो जाना, सोचना और करना, कर्मेन्द्रियों में आना अर्थात् कर्मेन्द्रियों का आधार लेना और कर्मेन्द्रियों से परे होना, प्रकृति द्वारा प्राप्त हुए साधनों को स्वयं प्रति कार्य में लगाना और प्रकृति के साधनों से समय प्रमाण निराधार होना, देखना, सम्पर्क में आना और देखते हुए न देखना, सम्पर्क में आते कमल-पुष्प के समान रहना, इन सभी बातों में समानता। इसको कहा जाता है - कर्मातीत अवस्था की समीपता।
ऐसी महीनता और महानता की स्टेज अपनाई है? फाईनल पेपर में चारों ओर की हलचल होगी। एक तरफ वायुमण्डल व वातावरण की हलचल, दूसरे तरफ व्यक्तियों की हलचल, तीसरी तरफ सर्व सम्बन्धों में हलचल और चौथी तरफ आवश्यक साधनों की अप्राप्ति की हलचल। ऐसे चारों तरफ की हलचल के बीच अचल रहना, यही फाइनल पेपर होना है। किसी भी आधार द्वारा अधिकारीपन की स्टेज पर स्थित रहना - ऐसा पुरुषार्थ फाइनल पेपर के समय सफलता-मूर्त बनने नहीं देगा। वातावरण हो तब याद की यात्रा हो, परिस्थिति न हो तब स्थिति हो अर्थात् परिस्थिति के आधार पर स्थिति व किसी भी प्रकार का साधन हो तब सफलता हो, ऐसा पुरुषार्थ फाइनल पेपर में फेल कर देगा। इसलिए स्वयं को बाप समान बनाने की तीव्रगति करो।
अपने आपको समझते हो कि फाइनल पेपर जल्दी हो जाए तो सूर्यवंशी प्रालब्ध प्राप्त कर लेंगे। इम्तहान के लिये एवररेडी हो? या होना ही पड़ेगा वा हो ही जायेंगे? अथवा समय करा लेगा ऐसे अलबेलेपन के संकल्प समर्थ बना नहीं सकेंगे। समर्थ संकल्प के आगे यह भिन्न-भिन्न प्रकार के व्यर्थ व अलबेलेपन के संकल्प खत्म हो जाते हैं। अलबेलापन तो नहीं है न? खबरदार, होशियार हो? एवररेडी अर्थात् अभी-अभी किसी भी परिस्थिति व वातावरण में ऑर्डर मिले व श्रीमत मिले कि एक सेकेण्ड में सर्व-कर्मेन्द्रियों की अधीनता से न्यारे हो कर्मेन्द्रिय-जीत बन एक समर्थ संकल्प में स्थित हो जाओ तो श्रीमत मिलते हुए मिलना और स्थित होना साथ-साथ हो जाये। बाप ने बोला और बच्चों की स्थिति ऐसी ही उस घड़ी बन जाये उसको कहते हैं एवररेडी। जो पहले बातें सुनाई समानता की, जिससे ही समीपता की स्टेज बनती है - ऐसे सब बातों में कहाँ तक समान बने हैं? यह चेकिंग करो। ऐसे तो नहीं डायरेक्शन को प्रैक्टिकल में लाने में एक सेकेण्ड के बजाय एक मिनट लग जाये। एक सेकेण्ड के बजाय एक मिनट भी हुआ तो फर्स्ट डिवीजन में पास नहीं होंगे, चढ़ते, उतरते व स्वयं को सेट करते फर्स्ट डिवीजन की सीट को गंवा देंगे। इसलिये सदा एवररेडी, सिर्फ एवररेडी भी नहीं, सदा एवररेडी।
वर्तमान समय तक रिजल्ट क्या देखने में आती है, उसको जानते हो? पाण्डव तीव्र पुरुषार्थ की लाईन में हैं या शक्तियाँ? मैजॉरिटी तीव्र पुरुषार्थ की लाइन में कौन हैं? सभी पाण्डव मैजॉरिटी शक्तियों को वोट देते हैं। लेकिन पुरुषार्थ के हिसाब से पाण्डव भी शक्तिरूप हैं। सर्वशक्तिमान् की सब शक्ति हैं। बापदादा तो पाण्डवों का तरफ लेते हैं। अगर पाण्डवों को आगे नहीं करेंगे तो शक्तियों के आगे शिकार कैसे लायेंगे? इसलिये पाण्डवों को विशेष ब्रह्मा बाप की हमजिन्स के नाते पुरुषार्थ में फालो फादर करना चाहिए। पाण्डव लौकिक ज़िम्मेवारी उठाने में भी आगे रहते हैं। सिर्फ लौकिक ज़िम्मेवारी के बजाय बेहद विश्व-कल्याण की ज़िम्मेवारी उठानी है। कमाई करने की लगन जैसे हद की जानते हो वैसे बेहद की कमाई की लगन में मगन हो जाओ। कमाई के पीछे स्वयं के सुख के साधनों का त्याग करने के भी अनुभवी हो तो बेहद की कमाई के पीछे देह की सुध-बुध त्याग करना व देह की स्मृति का त्याग करना क्या बड़ी बात है? इसलिये पाण्डवों को तीव्र पुरुषार्थ की लाइन में नम्बर वन लेना चाहिए, समझा? पीछे नहीं रहना! अगर शक्तियों से पीछे रह गये तो ब्रह्मा बाप के हमजिन्स और बाप की लाज नहीं रखी - तो क्या यह शोभता है? इसलिये इसी वर्ष में, दूसरे वर्ष का इन्तज़ार नहीं करना, इसी वर्ष में नम्बर वन लेना है।
शक्तियाँ सोचती होंगी कि हम नम्बर दो हो जायेंगी क्या? शक्तियों के बिना तो शिव बाप की भी कोई चाल नहीं चल सकती। चल सकती है? शक्तियों को इसमें भी त्याग करना चाहिए, शक्तियों का त्याग पूजा जाता है। जो त्याग करता है उसका भाग्य स्वत: बनता है। इसलिये दोनों ही भाई-भाई के रूप में तीव्र पुरुषार्थ करो। समाचार के आधार पर पुरुषार्थ नहीं करना। आपके पुरुषार्थ से ही विनाश के समाचार चारों ओर फैलेंगे। पहले पुरुषार्थ, पीछे समाचार, न कि पहले समाचार और पीछे पुरुषार्थ। अच्छा!