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27 Nov 1978
“अल्पकाल के नाम और मान से न्यारे ही सर्व के प्यारे बन सकते हैं”
27 November 1978 · हिंदी
आज बापदादा विशेष बच्चों से मिलन मनाने आये हैं, जैसे बच्चे निरन्तर योगी हैं अर्थात् बाप के स्नेह के सागर में सदा लवलीन हैं, ऐसे ही बाप भी बच्चों के स्नेह में निरन्तर बच्चों के गुण गाते हैं। हर बच्चे की गुण माला और हर बच्चे के श्रेष्ठ चरित्र के चित्र बापदादा के पास हैं। बापदादा के पास बहुत बड़ा, बहुत सुन्दर चैतन्य मूर्तियों का मन्दिर कहो वा चित्रशाला कहो, सदा सामने है। हरेक का चित्र और माला सदा बाप देखते रहते हैं। किन्हों की माला बड़ी है, किन्हों की छोटी है। तुम सबको तो एक बाप को याद करना पड़ता - बापदादा को सर्व बच्चों को याद करना पड़ता - एक को भी भूल नहीं सकते। अगर भूलें तो उल्हनों की माला पहननी पड़े। तो बच्चे उल्हनों की माला पहनाते, बाप विजयी माला पहनाते। बहुत होशियार हैं बच्चे! मदद लेने में होशियार हैं, हिम्मत रखने में नम्बरवार हैं। सुना तो बहुत है, अब बाकी क्या करना है? अब तो सिर्फ मिलन मनाते रहना है। जैसे अभी का मिलन सम्पन्न स्टेज का अनुभव कराता है, ऐसे निरन्तर मिलन मनाओ। सुनने का रिटर्न सदा बाप समान सम्पन्न स्वरुप में दिखाओ। अनेक तड़पती हुई आत्माओं के इन्तज़ार को समाप्त करो। सम्पन्न दर्शनीय मूर्त बन अनेकों को दर्शन कराओ। अब दु:ख अशान्ति की अनुभूति अति में जा रही है - उसे अपनी अन्तिम स्टेज द्वारा समाप्त करने का कार्य अति तीव्रता से करो। मास्टर रचता की स्टेज पर स्थित हो अपनी रचना के बेहद दु:ख और अशान्ति की समस्या को समाप्त करो। दु:ख हर्ता सुख कर्ता का पार्ट बजाओ। सुख-शान्ति के खज़ाने से अपनी रचना को महादान और वरदान दो, रचना की पुकार सुनने में आती है! वा अपनी ही जीवन की कहानी देखने और सुनने में बिज़ी हो? अपने जीवन के कर्मों की कहानी जानने वाले त्रिकालदर्शी बने हो ना। तो अभी हर कर्म अन्य आत्माओं के कल्याण प्रति कार्य में लगाओ। अपनी कहानी ज्यादा वर्णन न करो - मेरा भी कुछ करो वा मेरा भी कुछ सुनो, मेरे फैंसले करने में समय दो। अब अनेकों के फैंसले करने वाले बनो। हरेक के कर्म गति को जान गति सद्गति देने के फैंसले करो। फैसल्टीज़ न लो, अब तो दाता बनकर दो। कोई भी सेवा प्रति वा स्वयं प्रति सैलवेशन के आधार पर स्वयं की उन्नति वा सेवा की अल्पकाल की स़फलता प्राप्त हो जायेगी लेकिन आज महान होंगे कल महानता की प्यासी आत्मा बन जायेंगे। सदा प्राप्ति की इच्छा में रहेंगे। नाम हो जाए काम हो जाए इसके इच्छा मात्रम् अविद्या स्वरूप नहीं बन सकेंगे। जैसे बाप नाम रूप से न्यारे हैं तो सबसे अधिक नाम का गायन बाप का है, वैसे ही अल्पकाल के नाम और मान से न्यारे बनो तो सदाकाल के लिए सर्व के प्यारे स्वत: बन जायेंगे। नाम और मान के भिखारीपन का अंशमात्र भी त्याग करो - ऐसे त्यागी विश्व के भाग्य विधाता बन सकते। कर्म का फल खाने के अभ्यासी ज्यादा हैं, इसलिए कच्चा फल खा लेते हैं, जमा होने अर्थात् पकने नहीं देते। कच्चा फल खाने से क्या होता है? कोई न कोई हलचल हो जायेगी। ऐसे ही स्थिति में हलचल हो जाती है। कर्म का फल तो स्वत: ही आपके सामने सम्पन्न स्वरुप में आयेगा। एक श्रेष्ठ कर्म करने का सौगुणा सम्पन्न फल के स्वरुप में आयेगा लेकिन अल्पकाल की इच्छा मात्रम् अविद्या हो। त्याग करो तो भाग्य आपे ही आपके पीछे आयेगा। इच्छा अच्छा कर्म समाप्त कर देती है इसलिए इच्छा मात्रम् अविद्या। इस विद्या की अविद्या। महान ज्ञानी स्वरुप तो हो लेकिन इसमें ज्यादा समझदार नहीं बनना। यह होना ही चाहिए, मैंने किया, मुझे मिलना ही चाहिए - इसको इन्साफ नहीं समझना। मेरा कुछ इन्साफ (न्याय) होना चाहिए। भगवान के घर में भी इन्साफ नहीं हो तो कहाँ इन्साफ मिलेगा! कभी भी ऐसे इन्साफ माँगने वाले नहीं बनना। किसी भी प्रकार के माँगने वाला स्वयं को तृप्त आत्मा अनुभव नहीं करेगा। तो सदा सर्व प्राप्तियों से तृप्त आत्मा बनो। ब्राह्मण जीवन का स्लोगन है अप्राप्त नहीं कोई वस्तु मास्टर सर्वशक्तिमान् के खज़ाने में। यह स्लोगन सदा स्मृति में रखो। अब गुह्य ज्ञान के साथ-साथ परिवर्तन भी गुह्य करो। मुश्किल लगता है क्या? अनेकों की मुश्किल को सहज करने वाले सैलवेशन आर्मी हो। अच्छा।
ऐसे सदा महादानी वरदानी, अल्पकाल की इच्छा मात्रम् अविद्या वाले, स्वयं के त्यागी सर्व के भाग्य बनाने वाले विधाता, सदा सम्पन्न और सन्तुष्ट रहने वाले, सर्व की समस्याओं का समाधान करने वाले - ऐसे बाप समान महान आत्माओं को बापदादा का याद प्यार और नमस्ते।
दादियों से पर्सनल मुलाकात :- खिलाड़ी बनकर हर समय का खेल देखने में मज़ा आता है ना। खिलाड़ी की स्टेज सदा हर्षित मुख रहने का अनुभव कराती है। किसी भी प्रकार की कोई भी बात, जिसको दुनिया वाले आपदा समझते हैं लेकिन खिलाड़ी बन खेल करने वाले और खेल देखने वाले ऐसी आपदा के रुप को खेल समझ मनोरंजन अनुभव करेंगे। बड़े में बड़ी आपदा भी मनोरंजन का दृश्य अनुभव हो - यह है मास्टर रचता की स्टेज। जैसे महाविनाश को भी स्वर्ग के गेट खुलने का साधन बताते हो - कहाँ महाविनाश और कहाँ स्वर्ग का गेट! तो महाविनाश की आपदा को भी मनोरंजन का रुप दे दिया ना। तो ऐसे किसी भी प्रकार की छोटी-बड़ी समस्या वा आपदा मनोरंजन का रुप दिखाई दे। हाय-हाय के बजाए ‘ओहो!' शब्द निकले। इसको कहा जाता है अंगद के समान स्टेज। जो योगियों की स्टेज लोग वर्णन करते हैं - दु:ख भी सुख के रुप में अनुभव हो। दु:ख-सुख समान, निन्दा-स्तुति समान। यह दु:ख है, यह सुख है - इसकी नॉलेज होते हुए भी दु:ख के प्रभाव में नहीं आओ। दु:ख की भी बलिहारी सुख के दिन आने की समझो। इसको कहा जाता है सम्पूर्ण योगी। परिवर्तन की शक्ति इसको कहा जाता है। दुश्मन को भी दोस्ती में परिवर्तन कर दें, दुश्मन की दुश्मनी चल न सके। दुश्मन बन आवे और बलिहार बनकर जावे। यह है शक्तियों का महिमा। ऐसे शक्ति सेना तैयार है! जब विश्व को परिवर्तन करने की चैलेन्ज करते हो तो यह क्या बड़ी बात है, इसका सहज साधन है - लेने वाला नहीं लेकिन देने वाले दाता बनो। दाता के आगे सब स्वयं ही झुकते हैं। वैसे भी कोई चीज़ दो तो वह अपना सिर और आंखें नीचे कर लेते हैं - निर्मानता दिखाने लिए ऐसे करते हैं। वह स्थूल युक्ति है और यहाँ संस्कार स्वभाव से झुकेंगे। तब तो दुश्मन भी बलिहार जायेंगे। तो ऐसी शक्ति सेना तैयार है?
(बॉम्बे वाले सिल्वर जुबली मना रहे हैं) सिल्वर जुबली भले मनाओ लेकिन स्वयं के संस्कार मिलन की जुबली भी मनाओ। ऐसी जुबली में तो बापदादा भी आ सकते। भाषण वाली जुबली में नहीं आयेंगे, संस्कार मिलन की जुबली में आयेंगे। हाँ, पहले दिखाओ - बॉम्बे एक एक्जैम्पुल बने - सदा विजयी, सदा निर्विघ्न, ऐसी जुबली मनाओ। वह जुबली हो लोगों को जगाने के लिए, लोगों को भी आजकल अनुभव कराने वाले अनुभवी मूर्तियों की दरकार है। जैसे विदेश में अनुभव कराने का आरम्भ हुआ है, वह अनुभव करते हैं कि कोई रूहानी शक्ति बोल रही है। ऐसी लहर भारत में अनुभव कराओ। ऐसी सिल्वर जुबली मनाओ, टॉपिक द्वारा टॉप की स्टेज का अनुभव कराओ, ऐसा प्लेन बनाओ। जैसे मन्दिर जाने से ही वृत्ति परिवर्तन हो जाती है, वैसे प्रोग्राम में आते ही कुछ नई अनुभूति अनुभव करें। अल्पकाल के लिए करें तो भी अल्पकाल की छाप स्मृति में रह जायेगी। समझा, अब क्या करना है। अच्छा।