Brahma Kumaris
दादी बृजशान्ता जी

दादी बृजशान्ता जी

सारांश — Summary

ब्रिजशान्ता दादी का जीवन गहन आध्यात्मिक जागृति और परमात्म प्रेम से भरपूर था। उन्होंने आत्मा के सच्चे ज्ञान, परमात्मा से निकट संबंध और जीवन में आए सकारात्मक परिवर्तन का अनुभव किया। उनकी जीवन-यात्रा यह सुंदर रूप से दर्शाती है कि बाबा के प्रेम, सम्मान और दिव्य मार्गदर्शन से उनके भीतर आत्मविश्वास, स्थिरता और आध्यात्मिक शक्ति सहज रूप से निखरती गई।

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ब्रिजशान्ता दादी के श्रीमुख-कमल से सुनाए गए ये अनमोल अनुभव हैं, जिनमें दादी ने बाबा के स्नेह तथा अपने जीवन की मधुर स्मृतियों को साझा किया है।आपका लौकिक नाम ‘लक्ष्मी देवी’ था। ध्यान में जाने के कारण आपका नाम ध्यानी पड़ाकल्पवृक्ष की जड़ में विराजमान आठ रत्नों में आप भी शामिल हैं।

सन 1937 का समय था। हैदराबाद (सिंध) में बाबा ने पहली बार ज्ञान सुनाना शुरू किया। उस समय बाबा का घर, "जोता निवास" कहलाता था। बाबा पहले से ही माताओं का बहुत सम्मान करते थे। उनका घर साधारण था, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने उसे एक बड़े घर का रूप दे दिया। उस घर का नाम किसी बेटे या बेटी के नाम पर नहीं रखा गया, बल्कि अपनी धर्मपत्नी जोता के नाम पर "जोता निवास" रखा। बाबा का नाम सिंध में बहुत प्रसिद्ध था। लोग उन्हें दादा लेखराज के नाम से जानते थे।

उस समय मेरी आयु लगभग 13 वर्ष थी और मैं हैदराबाद सिंध के तोलाराम गर्ल्स स्कूल में पढ़ती थी। मेरी बड़ी बहन और कुछ अन्य बहनें बाबा की क्लास में जाती थीं। वे लौटकर हमें बताती थीं कि बाबा क्या कहते हैं। मेरी बड़ी बहन मनमोहिनी दीदी, जो बाद में यज्ञ की प्रमुख निमित्त बनीं, भी उन दिनों ज्ञान में थीं।

जब मैं पहली बार बाबा के पास गई तो उन्होंने सबसे पहले आत्मा का ज्ञान दिया। बाबा ने कहा,

"तुम आत्मा हो।"

यह सुनकर हमारे भीतर जो देह-अभिमान था, वह धीरे-धीरे समाप्त होने लगा। बाबा ने हमें सिखाया कि हम शरीर नहीं, आत्मा हैं; परमात्मा की संतान हैं। यह ज्ञान हमारे लिए बिल्कुल नया था। शुरुआत में केवल 12-15 ही क्लास में जाते थे। वे जो सुनते, वही आकर हमें सुनाते थे। एक बार स्कूल की छुट्टियाँ थीं। मैंने पाँचवीं अंग्रेज़ी पास की थी और छठी में गई थी। उन्हीं छुट्टियों में मैं पहली बार बाबा के पास गई। उस समय बाबा ने संस्था का नाम "ओम मंडली" रखा था। "ओम" का अर्थ है "मैं आत्मा" और "मंडली" अर्थात् सारी दुनिया मेरा परिवार है।

बाबा जब भी हमें देखते, बड़े प्यार से कहते, "आओ बच्चे, आओ बच्चे।" इतना स्नेह, इतना अपनापन मैंने जीवन में पहले कभी अनुभव नहीं किया था।

धीरे-धीरे मैं नियमित रूप से ओम मंडली जाने लगी। बाबा ने संस्था की नींव ही माताओं और कन्याओं के सम्मान पर रखी थी। उस समय समाज में स्त्रियों की स्थिति बहुत कठिन थी, विशेषकर विधवाओं की। यदि किसी स्त्री का पति शरीर छोड़ देता, तो उसे अनेक सामाजिक बंधनों में बाँध दिया जाता। लाल कपड़े पहनने पड़ते, घूँघट में रहना पड़ता और समाज से लगभग अलग कर दिया जाता। लेकिन बाबा ने इस व्यवस्था को चुनौती दी। उन्होंने कहा कि उनके सत्संग में कोई भी स्त्री लाल शोक-वस्त्र पहनकर नहीं आएगी। विधवाओं को सम्मान दिया जाएगा, उन्हें आत्म-सम्मान के साथ जीना सिखाया जाएगा

जब मेरे परिवार ने देखा कि मैं ज्ञान में गहराई से जुड़ रही हूँ, तो उन्हें चिंता होने लगी। उन्होंने मुझे रोकने के लिए घर में 18 ताले तक लगा दिए। एक चौकीदार भी बैठा दिया गया ताकि मैं बाहर न जा सकूँ। मैं कोई अपराधी नहीं थी, लेकिन ऐसा व्यवहार किया जाता था जैसे मैंने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो। वास्तव में मैंने तो केवल भगवान को अपने दिल में बसा लिया था। कई बार मैंने बाहर निकलने का प्रयास किया। कभी चौकीदार दिख जाता, कभी कोई पहचान वाला मिल जाता और मैं वापस लौट आती। लेकिन बाबा के प्रति प्रेम इतना गहरा था कि रुकना कठिन था। अंततः समय आया जब मैं कराची पहुँची, जहाँ यज्ञ स्थानांतरित हो गया था।

कराची में भी मेरे लौकिक पिता ने मुझे वापस लाने का प्रयास किया। वे अदालत का वारंट लेकर आए क्योंकि उस समय मैं बालिग नहीं थी। अदालत ने मुझे उनके साथ भेज दिया। मैं वापस हैदराबाद लाई गई। मेरी माता लीलावती भी ज्ञान में थीं। उन्हें इस बात का बहुत दुःख हुआ कि मेरे पिता ने उन्हें वास्तविक बात बताए बिना यह सब किया।। आज तक उनके प्रति किसी के मुख से कभी कोई गिला-शिकवा, शिकायत नहीं सुनी। सभी उनको आज तक आदर की दृष्टि से याद करते हैं। उनका स्वभाव बहुत ही सरल था। किसी प्रकार का कोई छल-कपट नहीं। वे खुली पुस्तक की तरह अपने जीवन को सबके सामने रख देती थीं। मन के सभी दरवाजे-खिड़कियाँ खोलकर अंतःकरण के दर्शन करवा देती थीं। एक बार मैंने उनसे पूछा, दादी, हम तो अपने घर-बाहर की सभी छोटी-बड़ी बातें आपको बता देते हैं। आपने निजी जीवन के बारे में कभी कुछ नहीं बताया। उन्होंने बड़े भोले अंदाज से कहा, आपने कभी पूछा नहीं, पूछो, क्या पूछते हो। मैंने उनसे उनके जीवन के वे निजी प्रश्न पूछे जिनके लिए मैं आज महसूस करता हूँ कि बड़ों से ऐसी बातें पूछना अभद्रता है। मेरे प्रश्नों के उत्तर में उन्होंने जो दिग्दर्शन करवाया, वह इस प्रकार था-

फिर समय बदला। देश का विभाजन हुआ। सिंध पाकिस्तान में चला गया। यज्ञ को भी कराची छोड़कर भारत आना पड़ा। उस समय मेरे लौकिक पिता दादा मूलचंद ने एक बहुत बड़ा कार्य किया। उन्होंने पूरे यज्ञ परिवार को कराची से भारत लाने के लिए आर्थिक सहायता दी। यह भी ईश्वर की योजना का ही एक भाग था। इसके बाद हम भारत आए और आगे चलकर माउंट आबू पहुँचे। शुरुआत में हम ब्रिजकोठी में रहे। वहाँ अनेक कठिनाइयाँ थीं, लेकिन बाबा का साथ था। धीरे-धीरे यज्ञ आगे बढ़ता गया और वही छोटा-सा बीज आज विशाल वृक्ष बन गया।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो महसूस करती हूँ कि बाबा ने केवल ज्ञान ही नहीं दिया, बल्कि माताओं और कन्याओं को सम्मान, आत्मविश्वास और नई पहचान भी दी। उन्होंने हमें आत्मा का बोध कराया, परमात्मा से संबंध जोड़ा और जीवन का सच्चा उद्देश्य समझाया।

यह केवल मेरी कहानी नहीं, बल्कि उन सभी आत्माओं की कहानी है जिन्हें परमात्मा के प्रेम ने नया जीवन दिया।

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