

Up next
Being Bliss 25
BK Shivani · 13:41
Essence
कभी-कभी हमारे सबसे कठोर शब्द… किसी और के लिए नहीं, खुद के लिए होते हैं।
‘मुझसे नहीं होगा…’ ‘मैं कभी नहीं बदल सकता…’ ‘मेरी जिंदगी बेकार है…’
क्या पता, जिन्हें हम सिर्फ निराशा के शब्द समझते हैं… वही धीरे-धीरे हमारी सोच और पहचान बन रहे हों।
दूसरों की कही बातें हमसे दूर हो सकती हैं… लेकिन खुद से कही गई हर बात का सामना हमें स्वयं करना पड़ता है।
और जब कोई गलती हो जाए… तो क्या पछतावे में डूबना वास्तव में बदलाव लाता है? या खुद को बार-बार दोष देकर हम उसी पुराने संस्कार को और मजबूत कर रहे होते हैं?
शायद बदलाव की शुरुआत खुद को कोसने से नहीं… बल्कि उस क्षण को एक नई प्रतिक्रिया के साथ मन में दोबारा जीने से होती है।
Being Bliss हमें याद दिलाता है… हर गलती के बाद एक नया चुनाव संभव है।
तो अगली बार… क्या हम पुरानी प्रतिक्रिया दोहराएँगे, या अपने भीतर एक नया संस्कार रचेंगे?



