स्वदर्शन चक्रधारी - Swadarshan chakradhari

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18/09/1975“माया के चक्करों से परे, स्वदर्शन चक्रधारी ही भविष्य में छत्रधारी”01/02/1976“रूहानी शमा और तीन प्रकार के रूहानी परवाने”12/12/1979“रूहानी अलंकार और उनसे सजी हुई मूर्तियाँ”07/01/1980“संगमयुगी बादशाही और सतयुगी बादशाही”07/03/1981“शान्ति स्वरूप के चुम्बक बन चारों ओर शान्ति की किरणें फैलाओ”08/11/1981“अन्तर सम्पन्न करने का साधन ‘तुरन्त दान महापुण्य’”17/03/1982“संगमयुग का विशेष वरदान - ‘अमर भव’”13/01/1983“स्वदर्शन चक्रधारी ही चक्रवर्ती राज्य भाग्य के अधिकारी”14/12/1983“प्रभु परिवार - सर्वश्रेष्ठ परिवार”27/12/1983“भिखारी नहीं सदा के अधिकारी बनो”29/12/1983“संगमयुग - सहज प्राप्ति का युग”02/04/1984“बिन्दु का महत्व”21/11/1984“स्व-दर्शन धारी ही दिव्य दर्शनीय मूर्त”16/01/1985“भाग्यवान युग में भगवान द्वारा वर्से और वरदानों की प्राप्ति”21/03/1985“स्वदर्शन चक्र से विजय चक्र की प्राप्ति”05/10/1987“ब्राह्मण जीवन का सुख - सन्तुष्टता व प्रसन्नता”10/11/1987“शुभचिन्तक-मणि बन विश्व को चिन्ताओं से मुक्त करो”27/11/1987“बेहद के वैरागी ही सच्चे राजऋषि”27/12/1987“निश्चय बुद्धि विजयी रत्नों की निशानियाँ”10/01/1988“मनन करने की विधि तथा मनन शक्ति को बढ़ाने की युक्तियां”02/02/2007“परमात्म प्राप्तियों से सम्पन्न आत्मा की निशानी - होलीएस्ट, हाइएस्ट और रिचेस्ट”31/12/2007“नये वर्ष में अखण्ड महादानी, अखण्ड निर्विघ्न, अखण्ड योगी और सदा सफलतामूर्त बनना”

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