Search for a command to run...
28 Apr 1974
“स्थूल के साथ-साथ सूक्ष्म साधनों से ईश्वरीय सेवा में सफलता”
28 April 1974 · हिंदी
आज के इस संगठन को कौन सा संगठन कहेंगे? इस संगठन की जिम्मेवारी की विशेषता क्या है? क्या आपने इन सब बातों को अपने संगठन में स्पष्ट किया है? क्या जिम्मेवारी मिली है या ली है? क्या अपनी स्थिति को उच्च और परिपक्व बनाने की जिम्मेवारी मिली है या ली नहीं है? क्या ऐसा मानते हो कि मेमोरेण्डम बनाने की जिम्मेवारी ली है और अपनी स्थिति बनाने की जिम्मेवारी मिली है।
आजकल के समय के अनुसार मुख्य जिम्मेवारी कौन-सी है? ईश्वरीय सेवा के तो भिन्न-भिन्न साधन और स्वरूप होते जा रहे हैं और आगे चलकर और भी होंगे। लेकिन लास्ट इज़ फास्ट का साधन और स्वरूप कौन सा है? विचार तो बहुत अच्छे निकाले हैं - बोर्ड भी लगायेंगे, फिल्म भी बनायेंगे, मेमोरेण्डम भी बनायेंगे, श्मशान और गाँवों में भी जायेंगे - यह सब (ज्ञापन) तो करेंगे ही, लेकिन अपने मस्तक पर कौन सा बोर्ड लगायेंगे? अपने इस मुख द्वारा व स्वरूप द्वारा विश्व की हर आत्मा को कौन सा और कैसे मेमोरेण्डम (ज्ञापन) देंगे? अपने दिव्य अलौकिक चरित्र और शुभ चिन्तन द्वारा और हर्षितमुख के चित्र द्वारा कौन-सी अलौकिक फिल्म दिखायेंगे? क्या आप एक ही फिल्म तैयार करेंगे या ये इतने सब (संगठन में आये हुए ब्रह्माकुमार) मधुबन वरदान भूमि से चेतन एवं अलौकिक फिल्म बन निकलेंगे? अगर इतनी सब फिल्म हर स्थान पर लोगों को दिखा सको तो क्या यही लास्ट सो फास्ट सर्विस नहीं? गाँव-गाँव में अथवा हर स्थान में सदा काल की शान्ति व आनन्द का अनुभव एक सेकेण्ड में अपनी अनुभवी-मूर्त द्वारा दिखाओ व कराओ तो क्या यह कम खर्च बाला नशीन (ऊंची परन्तु कम खर्च वाली) सर्विस नहीं? सपूत बच्चों का, सहयोगी बच्चों का और सर्विसएबुल बच्चों का हर संकल्प, हर बोल और हर कर्म में यही फर्ज और यही एक सबसे बड़ी जिम्मेवारी है। आप पाण्डवों का संगठन अथवा निमित्त बनी हुई आत्माओं का संगठन सिर्फ स्थूल सर्विस के साधन इकट्ठे करने या उन्हें प्रैक्टिकल में लाने तक ही नहीं है। स्थूल साधनों के साथ-साथ सूक्ष्म साधन और प्लैन (योजना) के साथ-साथ प्लेन (साफ-स्वच्छ) स्थिति और स्मृति रहे - इन बातों को अपनी जिम्मेवारी समझ कर चलना अर्थात् कर्म करना है। जो भी यहाँ बैठे हैं, वह सब इन बातों की जिम्मेवारी अपने को निमित्त समझ उठायेंगे तो क्या विहंग मार्ग की सर्विस का रूप नहीं दिखाई देगा।
जैसे ईश्वरीय सेवाकेन्द्रों पर टीचर्स और मुख्य आत्मायें हर कार्य की जिम्मेवारी के लिये निमित्त हैं, वैसे ही क्या आप अपने को इतना जिम्मेवार या निमित्त समझते हो? जैसे हर ईश्वरीय मर्यादा को पालन करना और कराना टीचर्स की एक जिम्मेवारी है, क्या आप अपने को हर ईश्वरीय मर्यादा के अन्दर चलने के निमित्त समझते हो या ऐसा मानते हो कि यह टीचर्स और दीदी-दादी ही का काम है? टीचर्स से भी पहले यह जिम्मेवारी आप निमित्त बने हुए पाण्डवों की है क्योंकि विश्व के आगे चैलेन्ज की हुई है घर-गृहस्थ में रहते कमल-पुष्प के समान न्यारे और प्यारे रहने की। कीचड़ में रहते कमल अथवा कलियुगी सम्पर्क में रहते ब्राह्मण इस चैलेन्ज को प्रैक्टिकल रूप में लाने के निमित्त है; न कि टीचर्स। यह पार्ट पाण्डवों का है अथवा प्रवृति में रहने वालों का है। टीचर्स के पास पहुंचने से पहले सैम्पल के रूप में आप हो। सैम्पल को देखकर ही व्यापार करने की हिम्मत व उल्लास आता है। ऐसे ही हर बात में निमित्त बन चलने का क्या अपना पार्ट समझ कर चलते हो? कई टीचर्स के पास आते हैं, सुनने के बाद पूछते हैं कि ऐसा कोई प्रत्यक्ष रूप दिखाओ, यह सम्भव है अथवा नहीं, इसकी मिसाल माँगते है। तो टीचर्स से ज्यादा रेस्पोन्सिबल कौन हुए? टीचर्स की मर्यादायें अपनी हैं, लेकिन आप लोगों की मर्यादायें टीचर्स से कोई कम नहीं हैं। अमृतवेले से लेकर जो सर्व मर्यादायें स्मृति, वृति, दृष्टि और कृति सबके प्रति बनी हुई हैं तो क्या वे सबकी बुद्धि में सदा स्पष्ट रहती हैं? क्या हर संकल्प को मर्यादा प्रमाण प्रैक्टिकल में लाते हो? यह है प्रैक्टिकल स्वरूप में लास्ट और फास्ट सर्विस का साधन।
पहली-पहली चैलेन्ज जो आज तक न कोई कर सकते हैं और न करेंगे, वह फर्स्ट चैलेन्ज कौन-सी है? फर्स्ट चैलेन्ज है प्यूरिटी की। सम्पर्क और सम्बन्ध में रहते संकल्प में भी इस फर्स्ट चैलेन्ज की कमजोरी न हो। फर्स्ट वायदा कौन सा है? वह यही है ना कि “और संग तोड़ एक संग जोड़ेंगे अथवा तुम्हीं से खाऊं, तुम्हीं से... अथवा मेरा तो एक, दूसरा न कोई।” बात तो एक ही है। जो फर्स्ट वायदा और फर्स्ट चैलेन्ज है वे दोनों एक-दूसरे से सम्बन्ध रखते हैं। इन दोनों के ऊपर कितना अटेन्शन रहता है? इस पहली बात का ही टेन्शन रहता है। इसी युद्ध में तो महारथी नहीं हो ना? महारथी का अर्थ टेन्शन में रहना नहीं है, बल्कि सदा अटेन्शन रहे। सबसे पहला प्रभाव इस विशेष बात पर है, क्योंकि यही असम्भव को सम्भव करने वाली एक बात है। तो क्या पहला प्रभाव करने की प्वॉइन्ट्स मजबूत है? या अब तक भी संस्कारों से मजबूर हैं? जो स्वयं के भी संस्कारों से मजबूर हैं वे अन्य को उनकी मजबूरियों से स्वतन्त्र कर सकें, यह सदा काल के लिए नहीं हो सकता। टेप्रेरी प्रभाव तो पड़ सकता है। लेकिन चलते-चलते फिर उन आत्माओं में भी मजबूरियों की लहर उत्पन्न होगी। इसलिए इस संगठन की जिम्मेवारी सबसे पहली यह है कि किसी भी मजबूरियों को हटाना है - पहले स्वयं की और फिर संसार की, फर्स्ट चैलेन्ज में इन्चार्ज बनो। यह है जिम्मेवारी। बापदादा भी और संसार की सर्व आत्मायें भी यह नवीनता व विशेषता देखना चाहती हैं।
आगे चल कर जितने सर्विस के साधनों द्वारा सर्विस को बढ़ायेंगे व मैदान में प्रसिद्ध होते जायेंगे, वैसे हर प्रकार के लोग आपकी हर बात को मत्रों द्वारा व अपनी सिद्धियों द्वारा चेक करने की चैलेन्ज करेंगे। संकल्पों को व कर्मों को भी करने के लिए आपके पीछे सी.आई.डी. (गुप्तचर) होंगे। ऐसे सहज थोड़े ही मानेंगे? बिना प्रूफ और प्रमाण के बुद्धिमान लोग मानने के लिये तैयार नहीं होते। चैलेन्ज करने के साथ-साथ व सर्विस के स्थूल साधनों के साथ-साथ क्या ऐसी तैयारी कर रहे हो? माइन्ड-कन्ट्रोल का एग्जैमिनेशन लेंगे। ऐसे नहीं योग में बैठते समय चेक करेंगे, विशेष परिस्थिति के समय माइन्ड-कन्ट्रोल व स्थिति की चेकिंग करेंगे। माया के सी.आई.डी. ऑफिसर कम नहीं होते। तो ऐसी तैयारी करने की जिम्मेवारी व स्वरूप बन सैम्पल रूप में आगे आने की जिम्मेवारी इस ग्रुप की है। तब तो पाण्डवों की यादगार ऊंची दिखाई है। ऊंची स्थिति का प्रमाण यादगार है। दूसरी बार जब आओ तो इस बात में पास विद ऑनर बनकर आओ, तब कहेंगे - पाण्डव सेना। अभी तो एक ही टॉपिक और एक ही सब्जेक्ट दे रहे हैं। इसको ही एक-रस स्टेज तक लाओ तो ऑफरीन देंगे। सहज है ना?
कितने समय से मेहनत कर रहे हो? जन्म से? जो जन्म से ही प्रयत्न में लाने वाली बात है क्या वह मुश्किल लगती है? औरों को कहते हो अपना जन्म-सिद्ध अधिकार प्राप्त करना क्या मुश्किल है? ऐसे ही ब्राह्मणों का पहला धर्म और कर्म जो है वह करना क्या ब्राह्मणों के लिये मुश्किल है? मरजीवा बन गए हो ना, या कि मर कर जिन्दा हो जाते हो? मरना शूद्रपन से है, जीना ब्राह्मणपन में है। यह ब्राह्मणों का अलौकिक जीवन है। ब्राह्मणों को कुछ मुश्किल होता है क्या? ब्राह्मण जीवन के जीय-दान का आधार कौन सा है? मुरली। पढ़ाई का भी आधार है मुरली। तो जीय-दान का आधार अच्छी तरह से स्नेह से प्रयत्न में लाते हो। नियम प्रमाण नहीं, लेकिन जीय-दान का आधार समझ स्नेह रूप में स्वीकार करते हो। जितना स्नेह जीय-दान से होगा उतना ही स्नेह, जीवनदाता से होगा। ऐसा स्नेही, अन्य आत्माओं को भी सदा स्नेही व निर्विघ्न बना सकेंगे। अब ऐसे आधार रूप समझ सबके आगे उदाहरण रूप बनो। यह भी जिम्मेवारी है। पाण्डवों के मुख से चलते-फिरते मुरली की रुह-रुहान व चर्चा कम सुनाई पड़ती है। गोपियों के मुख से मुरली की चर्चा अधिक सुनने में आती है। क्यों? आपस में ज्ञान की चर्चा करना, यह तो ब्राह्मणों का कर्तव्य है। जिस बात में जिसकी जो लगन होती है, उसके लिए समय की कमी कभी नहीं हो सकती।
तो इन दो बातों पर ध्यान रखो एक तो है प्योरिटी, दूसरा जीय-दान का महत्व। सूक्ष्म साधन के लिए अलग समय की आवश्यकता नहीं है। जैसे दुनिया के लोगों ने गृहस्थ और आश्रम को अलग कर दिया है और आप लोग दोनों को मिलाकर एक करते हो, वैसे स्थूल और सूक्ष्म साधनों को अलग करते हो, इसलिये प्रत्यक्ष फल नहीं मिलता। दोनों ही साथ-साथ होने से प्रत्यक्ष फल देखेंगे। वाणी के साथ-साथ मन्सा चाहिए और कर्म के साथ-साथ भी मन्सा चाहिए क्योंकि अभी लास्ट टाइम है ना? लास्ट टाइम में जो भी श्रेष्ठ अस्त्र-शस्त्र होते हैं, वे सब यूज़ किये जाते हैं। अगर यह सब पीछे करेंगे तो टाइम बीत जायेगा। जब अष्ट शक्तियों को साथ-साथ सर्विस में लाओगे तब ही अष्ट-देवता प्रसिद्ध हो जायेंगे अर्थात् स्थापना का स्वरूप स्पष्ट दिखाई देगा। ऐसे नहीं कि पहले स्थूल करके फिर पीछे सूक्ष्म करेंगे। नहीं, साथ-साथ के सिवाय सफलता नहीं। अच्छा।