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7 Oct 1975
“सर्व अधिकार और बेहद के वैराग्य वाला ही राजऋषि”
7 October 1975 · हिंदी
आज बापदादा कौन-सी सभा देख रहे हैं? यह है राजऋषियों की सभा। अपने को सदा राजऋषि समझते हुए चलते हो? एक तरफ राज्य, दूसरी तरफ ऋषि। दोनों के लक्षण अलग-अलग हैं। वह है भाग्य, वह है त्याग। वह है सर्व अधिकारी और वह फिर ऋषि अर्थात् बेहद के वैरागी। सर्व अधिकारी और बेहद के वैरागी। वह सर्व का प्यारा और वह सबसे न्यारा। दोनों ही लक्षण, बोल और कर्म में सदा साथ-साथ दिखाई देते हैं। वर्तमान स्वराज्य अर्थात् स्व का इन सर्व-कर्मेन्द्रियों पर राज्य - इसको कहते हैं स्वराज्य और वह है भविष्य का डबल राज्य अर्थात् स्व पर राज्य और विश्व का राज्य। ऐसे डबल राज्य अधिकारी हो? डबल राज्य का नशा सदा रहता है? जितना राज्य का नशा उतना ही बेहद का वैराग्य अर्थात् ऋषि रूप सदा स्मृति में रहता है? दोनों का बैलेन्स (सन्तुलन) है वा एक स्वरूप याद रहता है, दूसरा भूल जाता है? इस पुरानी देह और देह की दुनिया से बेहद के वैरागी बन गये हो? वा अभी भी यह पुरानी देह और दुनिया अपनी तरफ आकर्षित करती है? यह कब्रिस्तान अनुभव होता है? सभी मूर्छित हुई आत्मायें नजर आती हैं या सिर्फ कहने मात्र हैं? ये सब मरे पड़े हैं अर्थात् कब्रिस्तान है, जब तक वह अनुभव नहीं होगा तो बेहद के वैरागी नहीं बन सकेंगे। आज की दुनिया में भी हद के वैरागी जंगल में या शमशान में जाते हैं। इसलिए ही गायन है शमशानी वैराग्य। तो जब तक यह दुनिया शमशान है, ऐसा अनुभव नहीं होगा तो सदा काल का बेहद का वैराग्य - यह अनुभव कैसे होगा?
अपने आपसे पूछो कि ऋषि बना हूँ? ऐसे निश्चय बुद्धि, वैराग्य के साथ-साथ अधिकार की खुशी में भी रहेंगे तो राज-ऋषि बनने के लिए जितना ही राज्य का नशा उतना ही बेहद के वैराग्य के नज़ारे, दोनों ही साथ-साथ अनुभव होंगे। जितना कब्रिस्तान अनुभव होगा, उतना ही परिस्तान सामने दिखाई देगा। त्याग के साथ-साथ भाग्य भी स्पष्ट सामने दिखाई देगा। सम्पूर्ण राजऋषि की स्थिति अर्थात् नशा और निशाना दोनों ही स्पष्ट होंगे। निशाना अर्थात् सम्पूर्ण स्टेज। ऐसे नशे में रहने वाले के सामने निशाना इतना समीप होगा जैसे स्थूल नेत्रों के सामने स्थूल वस्तु स्पष्ट दिखाई देती है। जब सामने दिखाई देती है तो फिर कोई संकल्प नहीं उठेगा कि यह वस्तु है कि नहीं है, क्या है वा कैसी है? ऐसे ही सम्पूर्ण स्टेज का निशाना सामने दिखाई देने के कारण, मैं बनूँगा या नहीं बनूँगा वा सम्पूर्ण स्टेज किसको कहा जाता है, यह क्वेश्चन समाप्त हो जायेगा। अपने सम्पूर्ण स्टेज की निशानियाँ स्वयं में स्पष्ट नजर आयेंगी। वह निशानियाँ क्या होंगी वह जानते हो वा अनुभव करते हो?
पहली निशानी - पुरानी दुनिया के किसी भी व्यक्ति वा वैभव से संकल्प-मात्र वा स्वप्न-मात्र भी लगाव नहीं होगा। सदा स्वयं को कलियुगी दुनिया से किनारा करने वाले संगमयुगी समझेंगे। सारी सृष्टि की आसुरी आत्माओं को कल्याण और रहम की दृष्टि से देखेंगे। सदा स्वयं को बाप समान विश्व सेवाधारी अनुभव करेंगे। हर परिस्थिति वा परीक्षा में सदा स्वयं को विजयी अनुभव करेंगे। विजय मेरा जन्म-सिद्ध अधिकार है, ऐसा अधिकारी स्वरूप समझ कर हर कर्म करेंगे। सदा त्रिमूर्ति तख्त-नशीन अनुभव करेंगे। त्रिकालदर्शी-पन के स्मृति स्वरूप होने कारण, हर कर्म के तीनों कालों को जानने वाले, हर कर्म को श्रेष्ठ कर्म वा सुकर्म बनायेंगे। विकर्म का खाता समाप्त हुआ अनुभव होगा। हर कार्य, हर संकल्प सिद्ध हुआ ही पड़ा है - ऐसा सदा अनुभव करेंगे, पुराने संस्कार और स्वभाव से उपराम अनुभव करेंगे, सदा साक्षीपन की सीट (कुर्सी) पर स्वयं को सेट (बैठा) हुआ अनुभव करेंगे। यह हैं निशानियाँ और निशाना भी। ऐसे को कहा जाता है राजऋषि। ऐसे राज-ऋषि बने हो? टाईटल (पदवी) तो राज-ऋषि का मिला है ना? जो टाईटल है वही प्रैक्टिकल भी है ना?
ब्राह्मण अर्थात् कहना और करना, सोचना और बोलना, सुनना और स्वरूप में लाना एक समान हो। सब ब्राह्मण हो ना? एक सेकण्ड में जहाँ अपने को चाहो उस स्थिति में स्थित कर सकते हो? ऐसे एवररेडी बने हो? अशरीरी बनने का अभ्यास इतना ही सरल अनुभव होता है जैसे शरीर में आना अति सहज और स्वत: लगता है। रूहानी मिलिट्री हो ना? मिलिट्री अर्थात हर समय सेकेण्ड में ऑर्डर को प्रैक्टिकल में लाने वाले। अभी-अभी ऑर्डर हो अशरीरी भव, तो एवररेडी हो या रेडी होना पड़ेगा? अगर मिलिट्री रेडी होने में समय लगाये तो विजय होगी? ऐसा सदा एवररेडी रहने का अभ्यास करो। अच्छा।
ऐसे सदा सर्व अधिकारों के नशे में रहने वाले संगमयुगी श्रेष्ठ ब्राह्मणों, स्वराज्य और विश्व के राज्य के नशे में रहने वाले, ऐसे श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
(कुछ मुख्य भाई बहिनों से बापदादा की रूहरिहान)
महारथी और सब बच्चे अमृतवेले जब रूहरिहान करते हैं तो महारथी की रूहरिहान और मिलन-मुलाकात और अनेक आत्माओं के मिलन और रूहरिहान में क्या अन्तर होता है?
यह जो गायन है कि आत्मा, परमात्मा में लीन हो जाती है, यह कहावत किस रूप में राँग है? क्योंकि एक शब्द बीच से निकाल दिया है। सिर्फ लीन शब्द नहीं है लेकिन लवलीन। एक शब्द है लीन। एक लव में लीन। जो कोई अति स्नेह से मिलते हैं तो उस समय स्नेह के मिलन के शब्द क्या निकलते हैं? यह तो जैसेकि एक-दूसरे में समा गए हैं या दोनों मिलकर एक हो गए हैं। ऐसे-ऐसे स्नेह के शब्दों को उन्होंने इस रूप से ले लिया है। यह जो गायन है कि वे एक-दूसरे में समाकर एक हो गये, यह है जैसेकि महारथियों का मिलन। बाप में समा गये अर्थात् बाप का स्वरूप हो गये। ऐसा पॉवरफुल अनुभव महारथियों को ज्यादा होगा। बाकी और जो हैं वह स्नेह, शक्ति खींचने की कोशिश करते हैं - युद्ध करते-करते समय समाप्त कर देंगे, लेकिन महारथी बैठे और समाये। उनका लव इतना पॉवरफुल है, जो बाप को स्वयं में समा देते हैं। बाप और बच्चा समान स्वरूप की स्टेज पर होंगे। जैसे बाप निराकार वैसे बच्चा। जैसे बाप के गुण, वैसे महारथी बच्चों के भी समान गुण होंगे। मास्टर हो गये ना? तो महारथी बच्चों का मिलन अर्थात् लवलीन होना। बाप में समा जाना। समा जाना अर्थात् समान स्वरूप का अनुभव करना। उस समय बाप और महारथी बच्चों के स्वरूप और गुणों में अन्तर नहीं अनुभव करेंगे। साकार होते हुए भी निराकार स्वरूप के लव में खोये हुए होते हैं तो स्वरूप भी बाप समान हो गया अर्थात् अपना निराकारी स्वरूप प्रैक्टिकल स्मृति में रहता है। जब स्वरूप बाप समान है तो गुण भी बाप समान। इसलिए महारथियों का मिलना अर्थात् बाप में समा जाना। जैसे नदी सागर में समाकर सागर स्वरूप हो जाती है अर्थात् सर्व बाप के गुण स्वयं में अनुभव होते हैं, जो ब्रह्मा का अनुभव साकार में था, वह महारथियों का भी होगा। ऐसा अनुभव होता है? यह है सागर में समा जाना अर्थात् स्वयं की सम्पूर्ण स्टेज का अनुभव करना। यह अनुभव अब ज्यादा होना चाहिए।
हर संकल्प से वरदानी, नजर से वरदानी, नजर से निहाल करने वाले बापदादा हर बच्चे की समीपता को देखते हैं। समीप अर्थात् समा जाना। अमृतवेले का टाइम विशेष ऐसे पॉवरफुल अनुभव करने का है। ऐसे अनुभव का प्रभाव सारा दिन चलेगा। जो अति प्यारी वस्तु होती है वह सदा समाई हुई रहती है। यह है महारथियों का मिलन - अमृतवेले का। बापदादा भी चेक करते हैं कि कौन-कौन कितना समीप हैं! जैसे मन्दिर का पर्दा खुलता है, दर्शन करने के लिए। वैसे अमृतवेले की सीन भी होती है। हर बच्चा अमृतवेले मिलन मनाने के लिए, फर्स्ट नम्बर मिलन मनाने की दौड़ लगाने में तत्पर होते हैं। बाप चकमक (चुम्बक) है ना। तो ऑटोमेटिकली जो स्वयं स्वच्छ होते हैं वह समीप आते हैं। बाहर की रीति से, चाहे कोई कितना भी प्रयत्न करे लेकिन चकमक की तरफ समाने वाली स्वच्छ आत्मायें ही होती हैं। वह दृश्य बड़ा मजे का होता है। साक्षी होकर दृश्य देखने में बड़ा मजा आता है।
बच्चों को संकल्प उठता है कि बाप वतन में क्या करते रहते हैं! ब्रह्मा बाप साकार रूप से भी अव्यक्त रूप में अभी दिन-रात सेवा में ज्यादा सहयोगी बनने का पार्ट बजा रहे हैं क्योंकि अब बाप समान जन्म-मरण से न्यारे, कर्मबन्धन से मुक्त, कर्मातीत हैं। सिद्धि स्वरूप हैं। इस स्टेज में हर संकल्प से सिद्धि प्राप्त होती है। जो संकल्प किया वह सत्। इसलिए चारों ओर संकल्प की सिद्धि रूप से सहयोगी हैं। वाणी से संकल्प की गति तीव्र होती है। साकार से आकार की गति तीव्र है। तो संकल्प से सेवा का पार्ट है - वह भी सत-संकल्प, शुद्ध संकल्प। आपकी है ज्यादा वाणी द्वारा सेवा, मन्सा से भी है लेकिन ज्यादा वाणी से है और ब्रह्मा बाप की अब सत-संकल्प की सेवा है। तो तीव्र गति होगी ना? तो अभी सेवा का पार्ट ही चल रहा है। सेवा के बन्धन से मुक्त नहीं हैं, कर्म-बन्धन से मुक्त हैं। अच्छा।