“परहेज द्वारा संगमयुग के सर्व सुखों की अनुभूति”
अपने को मास्टर ऑलमाइटी अथॉरिटी समझते हो? बाप द्वारा जो सर्व-शक्तियों की, सर्व नॉलेज की, स्व पर राज्य करने की और विश्व पर राज्य करने की अथॉरिटी मिली है, उस अथॉरिटी को कहाँ तक स्वरूप में लाया है? यह रूहानी नशा निरन्तर बुद्धि में रहता है? सारे दिन के अन्दर स्व पर राज्य करने की अथॉरिटी कहाँ तक प्रैक्टिकल में रहती है, यह चेकिंग करते हो? नॉलेज की अथॉरिटी से पॉवरफुल स्वरूप कहाँ तक रहता है? सर्व प्राप्त हुई शक्तियों की अथॉरिटी मायाजीत व प्रकृतिजीत बनने में कहाँ तक प्रैक्टिकल में अनुभव होती है? जब जिस शक्ति द्वारा जो कार्य कराना चाहो वही कार्य सफलता रूप में दिखाई दे - ऐसी अथॉरिटी अनुभव करते हो? बेहद का बाप सभी बच्चों को आप समान ऑलमाइटी अथॉरिटी बनाते हैं तो बाप समान बने हो? कहाँ तक बने हैं, यह चेकिंग करना आता है?
कई बच्चे बापदादा से रुह-रुहान करते हुए यह एक बात बार-बार कहते हैं कि चेक तो करते हैं, लेकिन अपने को चेन्ज नहीं कर पाते। जानते हैं, मानते हैं और सोचते हैं लेकिन कर नहीं पाते हैं। युक्ति चलाते हैं लेकिन मुक्ति नहीं पाते हैं, उसके लिए क्या करें? इसका कारण एक छोटी-सी गलती व भूल है जो कि इस भूल-भुलैया के चक्कर में लाती है, वह क्या है? जैसे दवाई चाहे कितनी भी बढ़िया हो और अपना डोज़ भी ले रहे हों लेकिन एक बार भी परहेज़ में से कोई एक वस्तु स्वीकार कर ली व जो स्वीकार करनी थी वह नहीं की तो दवाई द्वारा व्याधि से मुक्ति नहीं पा सकते हैं। इसी प्रकार यहाँ भी नॉलेज रूपी दवाई लेते हैं अर्थात् नॉलेज को बुद्धि में दौड़ाते हैं - यह यथार्थ है या यह अयथार्थ है, यह करना चाहिए या नहीं करना चाहिये, यह राँग है या यह राइट है और यह हार है या जीत है - यह समझ बुद्धि में है अर्थात् समय प्रमाण दवाई का डोज़ ले रहे हैं, रूह-रूहान कर रहे हैं, क्लास कर रहे हैं, सेवा कर रहे हैं और यह सब डोज़ ले रहे हैं लेकिन जो पहली-पहली परहेज़ व मर्यादा है - एक बाप दूसरा न कोई, इसी स्मृति में और समर्थी में रहना, यह मूल परहेज़ निरन्तर नहीं करते हैं और ही कहीं न कहीं अपने को यह कहकर धोखे में रखते हैं कि मैं तो हूँ ही शिवबाबा का, और मेरा है ही कौन? लेकिन प्रैक्टिकल में ऐसा स्मृति-स्वरूप हो जो संकल्प में भी एक बाप के सिवाय दूसरा कोई व्यक्ति व वैभव, सम्बन्ध व सम्पर्क व कोई साधन स्मृति में न आये। यह है कड़ी अर्थात् मुख्य परहेज। इस परहेज़ में अलबेले होने के कारण, मनमत के कारण, वातावरण के प्रभाव के कारण या संगदोष के कारण निरन्तर स्मृति स्वरूप नहीं रह सकते। जितना अटेन्शन देना चाहिए उतना नहीं देते हैं। अल्पकाल के लिए फुल अटेन्शन रखते हैं फिर धीरे-धीरे फुल खत्म हो, अटेन्शन हो जाता है। उसके बाद अटेन्शन अनेक प्रकार के टेन्शन में चला जाता है। परिस्थितियों व परीक्षाओं वश अटेन्शन बदल टेन्शन का रूप हो जाता है। इसी कारण जैसे स्मृति बदलती जाती है तो समर्थी भी बदलती जाती है। ऑलमाइटी अथॉरिटी के बदले माया के वशीभूत होने के कारण वशीकरण मन्त्र काम नहीं करता अर्थात् युक्ति, मुक्ति नहीं दिलाती है। और फिर चिल्लाते हैं कि चाहते भी हैं फिर क्यों नहीं होता? तो मूल परहेज़ चाहिये - इस एक बात पर निरन्तर अटेन्शन रखो।
दूसरी परहेज़ - बाप ने तो अधिकार दिया है अपने आप का मालिक बनने का व रचयिता-पन का लेकिन रचयिता बनने के बजाय स्वयं को रचना अर्थात् देह समझ लेते हैं। जब रचयिता-पन भूलते हो तब माया अर्थात् देह-अभिमान तुम रचयिता के ऊपर रचयिता बनती है अर्थात् अपना अधिकार रखती है। रचयिता पर कोई अधिकार नहीं कर सकता, विश्व के मालिक के ऊपर कोई मालिक नहीं बन सकता। माया के आगे रचना बन जाते हो और अधीन बन जाते हो। इसका कारण है कि मालिकपन के व अधिकारीपन की स्मृति स्वरूप रहने की परहेज़ निरन्तर नहीं करते हो।
तीसरी परहेज़ - बाप द्वारा सबके ट्रस्टी बनकर रहना है। इस तन के भी ट्रस्टी हो, मन अर्थात् संकल्प के भी ट्रस्टी, लौकिक व अलौकिक जो प्रवृत्ति मिली है उसमें भी ट्रस्टी हो, लेकिन ट्रस्टी के बजाय गृहस्थी बन जाते हो। गृहस्थी की दुर्दशा का मॉडल आप बनाते हो, कौनसा मॉडल बनाते हो? जो सभी तरफ से खिंचा रहता है, दूसरा गृहस्थी को गधे के रूप में दिखाया है। अनेक प्रकार के बोझ दिखाये गए हैं - ऐसा मॉडल बनाते हो ना? जब गृहस्थी बन जाते हो तो मेरे-पन के अनेक प्रकार के बोझ हो जाते हैं। सबसे रॉयल रूप का बोझ है कि यह मेरी जिम्मेवारी है, इसको तो निभाना ही पड़ेगा, और कोई गृहस्थी नहीं तो अपनी कर्मेन्द्रियों के वश हो अनेक रस में समय गँवाने के गृहस्थी तो बहुत हैं। आज कनरस वश समय गँवाया, कल जीभ-रस वश समय गँवाया। ऐसे गृहस्थी में फंसने के कारण ट्रस्टीपन भूल जाते हो। यह तन भी मेरा नहीं, तन का भी ट्रस्टी हूँ। तो ट्रस्टी, मालिक के बिगर किसी भी वस्तु को अपने प्रति यूज़ नहीं कर सकते हैं। तो कर्मेन्द्रियों के रस में मस्त हो जाना, उसको भी गृहस्थी कहेंगे, न कि ट्रस्टी क्योंकि श्रेष्ठ से श्रेष्ठ मालिक जिसके आप ट्रस्टी हो उनकी श्रीमत एक के रस में सदा एकरस स्थिति में रहने की है। इन कर्मेन्द्रियों द्वारा एक का ही रस लेना है। तो फिर अनेक कर्मेन्द्रियों द्वारा भिन्न-भिन्न रस क्यों लेते हो? तो लौकिक व अलौकिक प्रवृति में गृहस्थी बन जाते हो। इसलिये अनेक प्रकार के बोझ, जिसके लिये बाप डायरेक्शन देते हैं कि सब मेरे को दे दो - वह बोझ व्यर्थ ही अपने ऊपर उठाये, बोझ धारण करते हुए उड़ना चाहते हो लेकिन उड़ कैसे सकेंगे? इसलिए कहते हो कि जानते हैं, मानते हैं और सोचते हैं लेकिन कर नहीं पाते हैं। तो इस परहेज़ की कमी के कारण युक्ति चलाते हो लेकिन मुक्ति नहीं पाते हो।
बापदादा को भी ऐसे बच्चों पर तरस पड़ता है। मास्टर सागर और एक अंचली के प्यासे हैं अर्थात् योग और ज्ञान द्वारा जो अनुभव की प्राप्ति होती है उस अनुभव की अंचली के प्यासे हैं। इसलिये अब परहेज़ को अपनाओ तो सर्व-प्राप्तियाँ सदा अनुभव हों। सर्व-प्राप्तियों की प्रॉपर्टी के मालिक! ऐसे, बालक सो मालिक, प्राप्ति से वंचित हों! यह तो बाप से भी नहीं देखा जाता। तो अब 63 जन्मों के गृहस्थी-पन के संस्कार छोड़ो। तन के और मन के ट्रस्टी बनो। सब बाप की जिम्मेवारी है, मेरी जिम्मेवारी नहीं, इस स्मृति से हल्के बन जाओ तो फिर जो सोचेंगे वही होगा अर्थात् हाई जम्प लगायेंगे। तो यह रोना, चिल्लाना रूहरिहान में परिवर्तन हो जायेगा। रूहरिहान द्वारा रूहों में राहत भर सकेंगे। नहीं तो कभी अपनी शिकायतें और कभी परिस्थितियों की शिकायतें, इसमें ही रूहरिहान का समय समाप्त कर देते हैं। तो अब शिकायतों को रुहानियत में बदली करो, तब संगमयुग के सुखों को अनुभव कर सकेंगे। समझा?
ऐसे सदा रुहानियत में रहने वाले, कदम-कदम पर श्रीमत पर चलने वाले, ऐसे आज्ञाकारी, फरमानबरदार, और हर फरमान को स्वरूप में लाने वाले, ऐसे बाप के प्रिय ज्ञानी तू आत्मायें और योगी तू आत्मायें बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
टीचर्स के साथ - अव्यक्त बापदादा की पर्सनल मुलाकात
टीचर्स अर्थात् सेवाधारी। सेवाधारी अर्थात् त्याग और तपस्वी-मूर्त। टीचर्स को अपने अन्दर महीन रूप से चेकिंग करनी चाहिए। मोटे रूप से नहीं बल्कि महीन रूप से। वह यही है कि सारे दिन में सर्व प्रकार के त्याग-मूर्त रहे अथवा कहीं त्याग-मूर्त के बजाय कोई भी साधन व कोई भी वस्तु को स्वीकार करने वाले बनें? जो त्याग-मूर्त होगा वह कभी भी कोई वस्तु स्वीकार नहीं करेगा। जहाँ स्वीकार करने का संकल्प आया तो वहाँ तपस्या भी समाप्त हो जायेगी। त्याग, तपस्या-मूर्त जरुर बनायेगा। जहाँ त्याग और तपस्या खत्म वहाँ सेवा भी खत्म। बाहर से कोई कितने भी रूप से सेवा करे, परन्तु त्याग और तपस्या नहीं तो सेवा की भी सफलता नहीं।
कई टीचर्स सोचती हैं कि सर्विस में सफलता क्यों नहीं? सर्विस में वृद्धि न होना वह तो और बात है, परन्तु विधि-पूर्वक चलना यह है सर्विस की सफलता। तो वह तब होगी जब त्याग और तपस्या होगी। मैं टीचर हूँ, मैं इन्चार्ज हूँ, मैं ज्ञानी हूँ या योगी हूँ यह स्वीकार करना, इसको भी त्याग नहीं कहेंगे। दूसरा भले ही कहे, परन्तु स्वयं को स्वयं न कहे। अगर स्वयं को स्वयं कहते हैं तो इसको भी स्व-अभिमान ही कहेंगे। तो त्याग की परिभाषा साधारण नहीं, यह मोटे रूप का त्याग तो प्रजा बनने वाली आत्मायें भी करती हैं, परन्तु जो निमित्त बनते हैं उनका त्याग महीन रूप में है। कोई भी पोज़ीशन को या कोई भी वस्तु को किसी व्यक्ति द्वारा भी स्वीकार न करना - यह है त्याग। नहीं तो कहावत है कि जो सिद्धि को स्वीकार करते तो वह करामत खैर खुदाई। तो यहाँ भी कोई सिद्धि को स्वीकार किया जो ज्ञान-योग से प्राप्त हुआ मान व शान तो यह भी विधि का सिद्धि-स्वरूप प्रालब्ध ही है। तो इनमें से किसी को भी स्वीकार करना अर्थात् सिद्धि को स्वीकार करना हुआ। जो सिद्धि को स्वीकार करता है, उसकी प्रारब्ध यहाँ ही खत्म फिर उसका भविष्य नहीं बनता। तो टीचर्स की चेकिंग बड़ी महीन रूप से हो। सेवाधारी के नाते से त्याग और तपस्या निरन्तर हो। तपस्या अर्थात् एक बाप की लगन में रहना। कोई भी अल्पकाल के प्राप्त हुए भाग्य में यदि बुद्धि का झुकाव है तो वह सेवा में सफलतामूर्त नहीं बन सकता। सफलतामूर्त बनने के लिये त्याग और तपस्या चाहिए। त्याग का मतलब यह नहीं कि सम्बन्ध छोड़ यहाँ आकर बैठे। नहीं! महिमा का भी त्याग, मान का भी त्याग और प्रकृति दासी का भी त्याग - यह है त्याग। फिर देखो मेहनत कम सफलता ज्यादा निकलेगी। अभी मेहनत ज्यादा, सफलता कम क्यों? क्योंकि अभी इन दोनों बातों में अर्थात् त्याग और तपस्या की कमी है। जिसमें त्याग-तपस्या दोनों हैं वह है यथार्थ टीचर अर्थात् काम करने वाला टीचर। नहीं तो नाम-मात्र का टीचर ही कहेंगे।
टीचर्स को कोई भी सब्जेक्ट में कमजोर नहीं होना चाहिए। अगर टीचर कमज़ोर है तो वह जिनके लिये निमित्त बनी है वह भी कमज़ोर होंगे। इसलिए टीचर्स को सभी सब्जेक्ट्स में परफेक्ट होना चाहिए। टीचर्स का यह काम नहीं कि वह कहे कि क्या करूँ, कैसे करूँ या कहे कि आता नहीं।यह टीचर के बोल नहीं, यह तो प्रजा के बोल हैं। ऐसे अपने को सफलतामूर्त समझती हो? चेक करो, कहीं न कहीं रुकावट है - इसलिए सफलतामूर्त नहीं। जहाँ त्याग-तपस्या की आकर्षण होगी वहाँ सर्विस भी आकर्षित हो पीछे आयेगी। समझा? ऐसे सफलतामूर्त टीचर बनो। ऐसे टीचर के पीछे सर्विस की वृद्धि का आधार है। ऐसे को कहते है लकी (भाग्यवान)। इसके लिए ही कहावत है - धूल भी सोना हो जाता है। धूल भी सोना हो जायेगा अर्थात् सफलतामूर्त बन जायेंगे। टीचर्स ऐसे सफलतामूर्त हैं? नम्बरवार तो होंगे। टीचर्स के नम्बर तो आगे हैं। अच्छा अगर ऐसी सफलतामूर्त न बनी हो तो अभी से बन जाना।
बाप से प्रीति निभाने वाले का मुख्य लक्षण
बाप को जीवन का साथी बनाया है? साथी के साथ सदा साथ निभाना होता है। साथ निभाना अर्थात् हर कदम उसकी मत पर चलना पड़े। तो कदम-कदम पर उसकी मत पर चलना अर्थात् साथ निभाना। ऐसे निभाने वाले हो या सिर्फ प्रीति लगाने वाली हो? कोई तो अब तक प्रीति लगाने में लगे हुए हैं। इसलिये कहते है कि योग नहीं लगता। जिसका थोड़ा समय योग लगता है फिर टूटता है ऐसे को कहेंगे प्रीति लगाने वाले। जो प्रीति निभाने वाले होते हैं वह प्रीति में खोये हुए होते हैं। उनको देह की और देह के सम्बन्धियों की सुध-बुध भूली हुई होती है तो आप भी बाप के साथ ऐसी प्रीति निभाओ तो फिर देह और देह के सम्बन्धी याद कैसे आ सकेंगे?
प्रश्न :- बाप द्वारा प्राप्त हुई शक्तियों का प्रैक्टिकल जीवन में शक्तिपन की निशानी क्या दिखाई देगी?
उत्तर :- शक्तिपन की निशानी है कहीं भी किसमें आसक्ति न हो। दूसरा, शक्ति-स्वरूप सदा सेवा में तत्पर रहेगा। सेवा में रहने वाले की कहीं भी आसक्ति नहीं होती। सेवा करने वाले त्याग और तपस्या-मूर्त होते हैं इसलिए उनकी कहीं भी आसक्ति नहीं होती अर्थात् उनको बॉडी-कॉन्सेस नहीं होता। तीसरे, उन्हें शक्तियाँ देने वाला बाप और उनके द्वारा मिली हुई शक्तियाँ ही याद रहती हैं। ऐसे शक्ति अवतार ही मायाजीत बनते हैं।
