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06 - गुस्से रूपी व्यसन की रिश्तों एवं स्वास्थ्य पर असर

06 - गुस्से रूपी व्यसन की रिश्तों एवं स्वास्थ्य पर असर

BK Shivani, BK Dr Girish Patel

28:29
06 - गुस्से रूपी व्यसन की रिश्तों एवं स्वास्थ्य पर असर

06 - गुस्से रूपी व्यसन की रिश्तों एवं स्वास्थ्य पर असर

BK Shivani, BK Dr Girish Patel

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Essence

इस ऑडियो में गुस्से को एक आंतरिक व्यसन के रूप में समझाया गया है। कई बार हम कहते हैं, “गुस्सा तो मेरा स्वभाव है” या “मेरी आदत है,” लेकिन यही वाक्य हमें सावधान करता है कि कोई संस्कार हम पर हावी हो रहा है। जो बात पहले कभी-कभी होती थी, वह बार-बार दोहराने से आदत बन जाती है। “यह मेरी आदत है” कहना कई बार अपने आपको बदलने से बचाने जैसा हो जाता है। हम मान लेते हैं कि अब यह बदल नहीं सकता, जबकि हर संस्कार परिवर्तन किया जा सकता है। गुस्सा हमारी मूल प्रकृति नहीं है; आत्मा की मूल प्रकृति शांति है। क्रोध केवल बनाया हुआ संस्कार है, जिसे आत्मबल से बदला जा सकता है। गुस्सा क्यों आदत बनता है, इसका कारण भी समझाया गया है। बचपन से कई बार यह अनुभव होता है कि रोने, चिल्लाने या गुस्सा करने से काम जल्दी हो जाता है। धीरे-धीरे मन मान लेता है कि गुस्सा एक हथियार है। लेकिन यह हथियार दूसरों से अधिक हमें ही नुकसान पहुँचाता है। गुस्से से लोग डरकर काम तो कर सकते हैं, लेकिन सम्मान और प्रेम से नहीं। डर थोड़े समय तक चलता है, पर संबंधों में दूरी, मन में विरोध और भीतर चोट छोड़ जाता है। गुस्से में बोले गए शब्द बाद में “सॉरी” कहने पर भी अपना प्रभाव छोड़ देते हैं। गुस्से के शारीरिक प्रभावों पर भी बात हुई है। इससे दिल, रक्तचाप, मस्तिष्क और रोग-प्रतिरोधक शक्ति पर बुरा प्रभाव पड़ता है। क्रोध को क्षणिक पागलपन कहा गया, क्योंकि उस समय व्यक्ति अपने नियंत्रण में नहीं रहता और बाद में पछताता है। आध्यात्मिक दृष्टि से समाधान यह है कि पहले यह विश्वास बदलना होगा कि गुस्से से काम होता है। अपने आप से प्रतिज्ञा करनी होगी — चाहे कुछ भी हो जाए, मैं क्रोध को साधन नहीं बनाऊँगा। हर घंटे स्वयं को चेक करना, शांत स्वरूप आत्मा की स्मृति रखना और मेडिटेशन का अभ्यास इस संस्कार को कमजोर करता है। यदि बच्चा गुस्से से अपनी बात मनवाता है, तो माता-पिता को प्रेम से लेकिन दृढ़ता के साथ उसे यह अनुभव कराना होगा कि गुस्सा काम नहीं करता। साथ ही घर के वातावरण में भी क्रोध का प्रयोग न हो, क्योंकि बच्चा देखकर सीखता है। सार / Essence: गुस्सा हमारा मूल स्वभाव नहीं, बार-बार बनाया हुआ संस्कार है। जब हम यह निश्चय करते हैं कि क्रोध कोई शक्ति नहीं बल्कि कमजोरी है, तब शांति, आत्मबल और सही अभ्यास से यह आदत बदली जा सकती है।

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