
07 - रिश्तों में प्रेम और आसक्ति का फर्क
BK Shivani, BK Dr Girish Patel

07 - रिश्तों में प्रेम और आसक्ति का फर्क
BK Shivani, BK Dr Girish Patel
Essence
कल के ऑडियो में हमने समझा कि गुस्सा हमारी मूल प्रकृति नहीं, बल्कि बना हुआ संस्कार है, जिसे शांति, आत्मबल और सही अभ्यास से बदला जा सकता है। आज हम रिश्तों में प्रेम और आसक्ति का अंतर समझेंगे। कई बार कोई रिश्ता बहुत प्यारा होता है, लेकिन धीरे-धीरे वही हमारी मजबूरी बन जाता है। जब मन बार-बार उसी व्यक्ति में उलझा रहे, बेचैनी हो या उसे स्वतंत्रता देना कठिन लगे, तो समझना चाहिए कि प्रेम कहीं आसक्ति का रूप ले रहा है। सच्चा प्रेम व्यक्ति की उन्नति देखकर खुश होता है और उसे स्वतंत्रता देता है। लेकिन जहाँ पकड़, नियंत्रण, डर, अपेक्षा या लगातार दर्द हो, वहाँ प्रेम की ऊर्जा शुद्ध नहीं रह जाती। आसक्ति तब बढ़ती है, जब हम अपनी पहचान किसी रिश्ते से जोड़ देते हैं। फिर उस व्यक्ति के दूर जाने पर अपनी पहचान भी हिलती हुई महसूस होती है। इस ऑडियो में बताया गया है कि अपने विचारों और भावनाओं को साक्षी होकर देखें, जहाँ मन फँस रहा है उसे पहचानें, और स्वयं को याद दिलाएँ — “मैं प्रेम स्वरूप आत्मा हूँ, मैं पूर्ण हूँ।” जब आत्मा परमात्म प्रेम से भरती है, तो रिश्तों में मांग कम और देने की शक्ति बढ़ती है। आइए, आज संकल्प लें कि रिश्तों को बंधन नहीं, सुंदर सहयोग बनाएंगे। प्रेम में स्वतंत्रता, शुभ भावना और सम्मान रखेंगे — पकड़ और दर्द नहीं।



