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220 टन सीमेंट और ओम शांति भवन के निर्माण की अनकही कहानी

220 टन सीमेंट और ओम शांति भवन के निर्माण की अनकही कहानी
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Key Takeaway

परमात्मा जब अपने बच्चों को निमित्त बनाता है, तो वह 'अमृतसर' की पुरानी यादों और 'कुकुर सोढ़ी' जैसे पुराने टीचरों के जरिए भी सरकारी दफ्तरों के कड़े नियम और सीमेंट के कोटे खुलवा देता है। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि यज्ञ सेवा के लिए किया गया त्याग कभी घाटा नहीं होता, बल्कि वह एक ऐसा 'सीमेंटेड' भाग्य लिखता है जिसकी रूहानी कीमत किसी भी सांसारिक वेतन से कहीं ऊँची है।

मधुबन की वादियों में खड़ा 'ओम शांति भवन' केवल ईंट-पत्थरों की इमारत नहीं है, बल्कि यह अटूट विश्वास और "बाप-दादा" की प्रत्यक्ष मदद की एक जीती-जागती मिसाल है। संस्था के एडिशनल सेक्रेटरी जनरल, आदरणीय ब्रजमोहन भाई साहब ने हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान उन सूक्ष्म और रोमांचक विवरणों को साझा किया, जो बताते हैं कि कैसे एक 'असंभव' कार्य 'संभव' में बदल गया।

कहानी की शुरुआत: एक जिम्मेदारी और एक अचानक बदलाव

यह बात उस समय की है जब माउंट आबू में संस्था के मुख्यालय का विस्तार हो रहा था। पांडव भवन के सामने की जमीन पर एक विशाल हॉल (ओम शांति भवन) और एक बड़े किचन कॉम्प्लेक्स की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। इस बड़े निर्माण के लिए 220 टन सीमेंट की जरूरत थी।

शुरुआत में यह कार्य दिल्ली के विनोद जैन भाई को सौंपा गया था। लेकिन ड्रामा की योजना कुछ और थी। अचानक विनोद भाई को अमेरिका (USA) में नौकरी मिल गई। जाते-जाते उन्होंने यह काम ब्रजमोहन भाईजी को सौंप दिया और दिल्ली के 'राजेंद्र प्लेस' स्थित 'सीमेंट कंट्रोलर ऑफ इंडिया' के ऑफिस का पता थमा दिया।

वो जादुई मुलाकात: जब अमृतसर की गलियाँ दिल्ली में मिल गईं

ब्रजमोहन भाईजी जब सीमेंट कंट्रोलर के दफ्तर पहुंचे, तो वहां एक अधिकारी (श्याम सुंदर मिगलानी जी) किसी और से बात कर रहे थे। भाईजी शांति से बगल की कुर्सी पर बैठ गए। जब अधिकारी खाली हुए, तो उन्होंने पूछा, "क्या काम है?"

यहीं से बाबा (परमात्मा) की मदद का खेल शुरू हुआ। भाईजी ने सामान्य कामकाज की बात करने के बजाय अचानक एक ऐसा सवाल पूछा जो आमतौर पर सरकारी दफ्तरों में नहीं पूछा जाता। उन्होंने पूछा— "आप किस शहर के रहने वाले हैं?"

अधिकारी ने जवाब दिया, "मैं अमृतसर का हूं।"

ब्रजमोहन भाईजी के चेहरे पर मुस्कान आ गई, क्योंकि वे स्वयं भी अमृतसर के ही थे। इसके बाद यादों का एक ऐसा सिलसिला चला जिसने सरकारी औपचारिकता की दीवार को गिरा दिया:

स्कूल का नाम: दोनों एक ही स्कूल (PN High School) से पढ़े थे।

पुराने शिक्षक: उन्होंने अपने एक पुराने शिक्षक 'कुकुर सोढ़ी' को याद किया, जिनकी दाढ़ी और व्यक्तित्व की बातें सुनकर दोनों ठहाके लगाने लगे।

स्कूल बैंड: उन्होंने चर्चा की कि कैसे उनके स्कूल का बैंड हमेशा पूरे शहर में प्रथम आता था।

महज कुछ मिनटों में, एक अनजान अधिकारी और एक आगंतुक के बीच ऐसा रिश्ता बन गया जैसे वे बरसों पुराने मित्र हों। अधिकारी ने बड़े अपनत्व से पूछा, "अब बताइए भाईजी, मैं आपके लिए क्या कर सकता हूं?"

नियमों की दीवार और संजय गांधी का उदाहरण

भाईजी ने जब 220 टन सीमेंट की बात की, तो अधिकारी एक पल के लिए ठिठक गया। उस समय देश में सीमेंट की भारी किल्लत थी। सरकार का सख्त नियम था कि राशन कार्ड पर 3 महीने में केवल 20 बोरी सीमेंट ही मिलता था। प्राथमिकता केवल मिलिट्री और CPWD को दी जाती थी।

लेकिन उस अधिकारी के दिल में सहयोग की ऐसी भावना जगी कि उसने फाइलों में एक रास्ता ढूंढ निकाला। उसने याद किया कि कैसे संजय गांधी ने एक बार आनंदपुर साहिब गुरुद्वारे के लिए विशेष कोटा स्वीकृत करवाया था। इसी आधार पर उसने एक नोट तैयार किया और ब्रह्माकुमारीज़ के लिए 220 टन सीमेंट की मंजूरी दिलवा दी।

इतना ही नहीं, उसने अपनी विशेषज्ञता का लाभ देते हुए भाईजी से कहा:

"मैं आपको सामान्य सीमेंट (PPC) नहीं, बल्कि सबसे बेहतरीन क्वालिटी का APC (All Purpose Cement) दूंगा, जो पुल बनाने में इस्तेमाल होता है। और ट्रांसपोर्ट का खर्चा बचाने के लिए मैं आबू के पास की JK सीमेंट फैक्ट्री को ऑर्डर भेज रहा हूं।"

जब राजस्थान सरकार ने लगाया निर्माण पर प्रतिबंध

चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई थीं। निर्माण कार्य आधा ही हुआ था कि राजस्थान सरकार ने माउंट आबू को 'हिल स्टेशन' के रूप में संरक्षित करने के लिए वहां हर तरह के कंस्ट्रक्शन पर 'ब्लैंकेट बैन' (पूर्ण प्रतिबंध) लगा दिया।

दादी प्रकाशमणि जी ने ब्रजमोहन भाईजी को इस समस्या के समाधान के लिए सिरोही के कलेक्टर से मिलने भेजा। भाईजी अपने साथ सिरोही की सेंटर इंचार्ज शारदा बहन को लेकर गए।

कलेक्टर साहब ने एक कड़ा सवाल पूछा— "आपकी संस्था इतनी बड़ी है, आप गरीबों के लिए क्या करते हैं?"

भाईजी ने एक ऐसा जवाब दिया जिसने कलेक्टर की सोच बदल दी। भाईजी ने अपने जेब से एक रुमाल निकाला और कहा,

"अगर हम देश के 40 करोड़ गरीबों को एक-एक रुमाल भी दें, तो भी करोड़ों रुपये खर्च हो जाएंगे, लेकिन क्या उनकी गरीबी मिटेगी? हम उन्हें आत्मिक शक्ति देते हैं। हम उन्हें व्यसनों (शराब, सिगरेट) से मुक्त कराते हैं। एक व्यक्ति जब बुरी आदतें छोड़ता है, तो वह अपने परिवार के लिए पैसे बचाता है। यही असली सेवा है।"

कलेक्टर साहब इस तर्क से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने संस्था के सेवा भाव को समझा और विशेष अनुमति के साथ निर्माण कार्य को फिर से शुरू करने का रास्ता साफ कर दिया।

ओम शांति भवन, जिसका निर्माण वर्ष 1983 में हुआ था

एक व्यक्तिगत अहसास: त्याग और जमा का हिसाब

ब्रजमोहन भाईजी ने एक बहुत ही मार्मिक घटना सुनाई। एक बार वे दिल्ली में लाल बत्ती पर अपने स्कूटर पर खड़े थे। बगल में तत्कालीन गृह मंत्री बूटा सिंह की बड़ी कार खड़ी थी। भाईजी के मन में विचार आया कि उन्होंने अपनी अच्छी-खासी नौकरी और कार छोड़ दी और अब बाबा की सेवा में स्कूटर पर हैं।

तभी उनके मन के अंदर से एक आवाज आई (बाबा का टचिंग)—

"बच्चे, तुमने नौकरी छोड़ी तो क्या हुआ? उस 220 टन सीमेंट के सौदे में तुमने यज्ञ के जो पैसे बचाए, अगर तुम्हारी 10 साल की सैलरी भी जोड़ी जाए, तो भी वह बचत उससे कहीं ज्यादा बड़ी है। तुमने यज्ञ की सेवा की, और वह तुम्हारे खाते में जमा हो गई।"

प्लग और पावर हाउस

वो अधिकारी, श्याम सुंदर मिगलानी जी, अंत तक संस्था के सहयोगी बने रहे। वे अक्सर कहते थे, "ब्रजमोहन भाई मेरा 'प्लग' हैं और भगवान 'पावर हाउस'। मैं इस प्लग से जुड़ा रहता हूं ताकि मुझे करंट मिलता रहे।"

यह कहानी हमें सिखाती है कि जब हम ईश्वरीय कार्य में 'निमित्त' बनकर चलते हैं, तो समय, व्यक्ति और परिस्थितियां खुद-ब-खुद हमारे पक्ष में मुड़ जाती हैं। ओम शांति भवन का हर कोना आज भी उन रूहानी यादों की खुशबू बिखेरता है।

निष्कर्ष : करन-करावनहार और ड्रामा

ब्रजमोहन भाईजी ने पूरी कहानी का सार बताते हुए कहा कि हम सब केवल 'निमित्त' हैं।

विनोद जैन भाई अमेरिका चले गए क्योंकि बाबा को मिगलानी जी (सीमेंट कंट्रोलर) से काम कराना था, जो ब्रजमोहन भाईजी के स्कूल के साथी थे।

मिगलानी जी अक्सर कहते थे— "मुझे पावर हाउस (भगवान) का पता नहीं, लेकिन ब्रजमोहन भाई मेरा 'प्लग' हैं, जिनसे मुझे करंट मिलता है।"

यह सब 'बना बनाया ड्रामा' है जो कल्प-कल्प दोहराया जाता है। हम पहले भी यहाँ बैठे थे और आगे भी बैठेंगे।

बाबा अपने बच्चों से खुद काम कराता है। चाहे कोई मंदिर के बाहर जूते साफ करने की सेवा करे या कोई करोड़ों का प्रबंध करे, भावना 'यज्ञ सेवा' की होनी चाहिए। परमात्मा की मदद हमेशा उपलब्ध है, बस हमें अपनी बुद्धि को स्वच्छ और 'निमित्त भाव' में रखना चाहिए।

आज का अभ्यास

परमात्मा जब अपने बच्चों को निमित्त बनाता है, तो वह 'अमृतसर' की पुरानी यादों और 'कुकुर सोढ़ी' जैसे पुराने टीचरों के जरिए भी सरकारी दफ्तरों के कड़े नियम और सीमेंट के कोटे खुलवा देता है। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि यज्ञ सेवा के लिए किया गया त्याग कभी घाटा नहीं होता, बल्कि वह एक ऐसा 'सीमेंटेड' भाग्य लिखता है जिसकी रूहानी कीमत किसी भी सांसारिक वेतन से कहीं ऊँची है।

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