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24 Jul 1970
“बिन्दु रूप की स्थिति सहज कैसे बने?”
24 July 1970 · हिंदी
सभी जिस स्थिति में अभी बैठे हैं, उसको कौन सी स्थिति कहेंगे? व्यक्त में अव्यक्त स्थिति है? बापदादा से मुलाकात करते समय बिन्दु रूप की स्थिति में स्थित रह सकते हो? (हरेक ने अपना-अपना विचार सुनाया) बिन्दु रूप की स्थिति विशेष किस समय बनती है? जब एकान्त में बैठते हो तब या चलते फिरते भी हो सकती है? अन्तिम पुरुषार्थ याद का ही है। इसलिए याद की स्टेज वा अनुभव को भी बुद्धि में स्पष्ट समझना आवश्यक है। बिन्दु रूप की स्थिति क्या है और अव्यक्त स्थिति क्या है, दोनों का अनुभव क्या-क्या है? क्योंकि नाम दो कहते हैं तो जरूर दोनों के अनुभव में भी अन्तर होगा। चलते-फिरते बिन्दु रूप की स्थिति इस समय कम भी नहीं लेकिन ना के बराबर ही कहें। इसका भी अभ्यास करना चाहिए। बीच-बीच में एक दो मिनट भी निकाल कर इस बिन्दी रूप की प्रैक्टिस करनी चाहिए। जैसे जब कोई ऐसा दिन होता है तो सारे चलते-फिरते हुए ट्रैफिक को भी रोक कर तीन मिनट साइलेन्स की प्रैक्टिस कराते हैं। सारे चलते हुए कार्य को स्टॉप कर लेते हैं। आप भी कोई कार्य करते हो वा बात करते हो तो बीच-बीच में यह संकल्पों की ट्रैफिक को स्टॉप करना चाहिए। एक मिनट के लिए भी मन के संकल्पों को चाहे शरीर द्वारा चलते हुए कर्म को बीच में रोक कर भी यह प्रैक्टिस करना चाहिए। अगर यह प्रैक्टिस नहीं करेंगे तो बिन्दु रूप की पावरफुल स्टेज कैसे और कब ला सकेंगे? इसलिए यह अभ्यास करना आवश्यक है। बीच-बीच में यह प्रैक्टिस प्रैक्टिकल में करते रहेंगे तो जो आज यह बिन्दु रूप की स्थिति मुश्किल लगती है वह ऐसे सरल हो जायेगी जैसे अभी मैजारिटी को अव्यक्त स्थिति सहज लगती है। पहले जब अभ्यास शुरू किया तो व्यक्त में अव्यक्त स्थिति में रहना भी मुश्किल लगता था। अभी अव्यक्त स्थिति में रह कार्य करना जैसे सरल होता जा रहा है वैसे ही यह बिन्दु रूप की स्थिति भी सहज हो जायेगी। अभी महारथियों को यह प्रैक्टिस करनी चाहिए। समझा।
फरिश्ता रूप की स्थिति अर्थात् अव्यक्त स्थिति जिसकी सदा काल रहती है वह बिन्दुरूप में भी सहज स्थित हो सकेगा। अगर अव्यक्त स्थिति नहीं हैं तो बिन्दु रूप में स्थित होना भी मुश्किल लगता है। इसलिए अभी इसका भी अभ्यास करो। शुरू शुरू में अव्यक्त स्थिति का अभ्यास करने के लिए कितना एकान्त में बैठ अपना व्यक्तिगत पुरुषार्थ करते थे। वैसे ही इस फाइनल स्टेज का भी पुरुषार्थ बीच-बीच में समय निकाल करना चाहिए। यह है फाइनल सिद्धि की स्थिति। इस स्थिति को पहुँचने के लिए एक बात का विशेष ध्यान रखना पड़ेगा। आजकल वह गवर्नमेंट कौन सी स्कीम बनाती है? उन्हों के प्लैन्स भी सफल तब होते हैं जब पहले-पहले यह लक्ष्य रखते हैं कि सभी बातों में जितना हो सके इतनी बचत हो। बचत की योजना भी करते हैं ना। समय बचे, पैसे बचें, इनर्जी की भी बचत करना चाहते हैं। इनर्जी कम लगे और कार्य ज्यादा हो। सभी प्रकार की बचत की योजना करते हैं। तो अब पाण्डव गवर्नमेंट को कौन सी स्कीम करनी पड़े? यह जो सुनाया कि बिन्दु रूप की सम्पूर्ण सिद्धि की अवस्था को प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ करना पड़े। अभी जिस रीति चल रहे हैं उस हिसाब से तो सभी यही कहते हैं कि बहुत बिजी रहते हैं, एकान्त का समय कम मिलता है, अपने मनन का समय भी कम मिलता है। लेकिन समय कहाँ से आयेगा। दिन प्रतिदिन सर्विस भी बढती जानी है और समस्यायें भी बढ़ती जानी हैं। और यह जो संकल्पों की स्पीड है वह भी दिन प्रतिदिन बढ़ेगी। अभी एक सेकेण्ड में जो दस संकल्प करते हो उसकी डबल ट्रिपल स्पीड हो जायेगी। जैसे आजकल जनसंख्या का हिसाब निकालते हैं ना कि एक दिन में कितनी वृद्धि होती है। यहाँ फिर यह संकल्पों की स्पीड तेज होगी। एक तरफ संकल्पों की, दूसरी तरफ ईविल प्रिट्स (आत्माओं) की भी वृद्धि होगी। लेकिन इसके लिए एक विशेष अटेन्शन रखना पड़े, जिससे सर्व बातों का सामना कर सकेंगे। वह यह है कि जो भी बात होती है उसको स्पष्ट समझने के लिए दो शब्द याद रखना है। एक अन्तर और दूसरा मन्त्र। जो भी बात होती है उसका अन्तर करो कि यह यथार्थ है या अयथार्थ है। बापदादा के समान है वा नहीं है। बाप समान है वा नहीं? एक तो हर समय अन्तर (भेंट) करके उसका एक सेकेण्ड में नॉट या तो डॉट। करना नहीं है तो फिर डॉट देंगे, अगर करना है तो करने लग जायेंगे। तो नॉट और डॉट यह भी स्मृति में रखना है। अन्तर और मन्त्र यह दोनों प्रैक्टिकल में होंगे। दोनों को भूलेंगे नहीं तो कोई भी समस्या वा कोई भी ईविल प्रिट्स सामना नहीं कर सकेगी। एक सेकेण्ड में समस्या भस्म हो जायेगी। ईविल प्रिट्स आप के सामने ठहर नहीं सकती हैं। तो यह पुरुषार्थ करना पड़े। समझा।
(ईविल प्रिट्स का रूप कौन सा है?) उनका स्पष्ट रूप है किन्हीं आत्माओं में प्रवेश होना। लेकिन ईविल प्रिट्स का कुछ गुप्त रूप भी होता है। चलते-चलते कोई में विशेष कोई न कोई बुरा संस्कार बिल्कुल प्रभावशाली रूप में देखने में आयेगा। जिसका इफेक्ट क्या होगा कि उनका दिमाग अभी-अभी एक बात, अभी अभी दूसरी बात। वह भी फोर्स से कहेंगे। उनकी स्थिति भी एक ठिकाने टिकी हुई नहीं होगी। वह अपने को भी परेशान करते हैं, दूसरों को भी परेशान करेंगे। स्पष्ट रूप में जो ईविल प्रिट आती हैं उसको परख कर और उससे किनारा करना सहज है। लेकिन आप लोगों के सामने स्पष्ट रूप में कम आयेगी। गुप्त रूप में बहुत आयेगी। जिसको आप लोग साधारण शब्दों में कहते हो कि पता नहीं उनका दिमाग कुछ पागल सा लगता है। लेकिन उस समय उसमें यह ईविल अर्थात बुरे संस्कारों का फोर्स इतना होता है जो वह ईविल प्रिट के समान ही होती है। जैसे वह बहुत तंग करते हैं वैसे यह भी बहुत तंग करते हैं। यह बहुत होने वाला है। इसलिए सुनाया कि अभी समय की बचत, संकल्पों की बचत, अपनी शक्ति की बचत यह योजना बनाकर बीच-बीच में उस बिन्दी रूप की स्थिति को बढ़ाओ। जितना बिन्दी रूप की स्थिति होगी उतना कोई भी ईविल प्रिट वा ईविल संस्कार का फोर्स आप लोगों पर वार नहीं करेगा। और आप लोगों का शक्तिरूप ही उन्हों को मुक्त करेगा। यह भी सर्विस करनी है। ईविल प्रिट को भी मुक्त करना है क्योंकि अभी अन्त के समय का भी अन्त है तो ईविल प्रिट वा ईविल संस्कारों को भी अति में जाकर फिर उन्हों का अन्त होगा। किचड़ा सारा बाहर निकल कर भस्म हो जायेगा। इसलिए उन्हों का सामना करने के लिए अगर अपनी समस्याओं से ही मुक्त नहीं हुए होंगे तो इन समस्याओं से कैसे सामना कर सकेंगे। इसलिए कहते हैं बचत की स्कीम बनाओ और प्रैक्टिकल में लाओ तब अपना और सर्व आत्माओं का बचाव कर सकेंगे। सिर्फ भाषण करने वा समझाने की सर्विस नहीं, अब तो सर्विस का रूप भी बड़ा सूक्ष्म होता जायेगा। इसलिए अपने सूक्ष्म स्वरूप की स्थिति भी बढ़ाओ। यह सभी प्रत्यक्ष होकर फिर प्राय: लोप होना है। प्राय: लोप होने से पहले प्रत्यक्ष हो फिर प्राय: लोप होंगे। सर्विस इतनी बढ़नी है जो एक-एक को दस का कार्य करना पड़ेगा।
शक्तियों की भुजायें कितनी दिखाते हैं? भुजाओं का अर्थ है इतनी सर्विस में मददगार बनना। पाण्डव समझते हैं कि यह तो शक्तियों की ही भुजायें हैं। पाण्डवों को फिर क्या दिखाया है, मालूम है? लम्बा दिखाया है। तो यह भी पाण्डवों की इतना ज्यादा मददगार बनने की निशानी है। लम्बा शरीर नहीं लेकिन बुद्धि लम्बी है। इन्हों का आगे दौड़ना गोया शक्तियों का आगे दौड़ना है। शक्तियों को आगे रखना यही इन्हों की दौड़ की निशानी है। अच्छा।