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11 Feb 1971
“अंत:वाहक शरीर द्वारा सेवा”
11 February 1971 · हिंदी
एक सेकेण्ड में कितना दूर से दूर जा सकते हो, हिसाब निकाल सकते हो? जैसे मरने के बाद आत्मा एक सेकेण्ड में कहाँ पहुँच जाती है। ऐसे आप भी अन्त:वाहक शरीर द्वारा, अन्त:वाहक शरीर जो कहते हैं उसका भावार्थ क्या है? आप लोगों का जो गायन है कि अन्त:वाहक शरीर द्वारा बहुत सैर करते थे, उसका अर्थ क्या है? यह गायन सिर्फ दिव्य-दृष्टि वालों का नहीं है लेकिन तुम सभी का है। यह लोग तो अन्त:वाहक शरीर का अपना अर्थ बताते हैं। लेकिन यथार्थ अर्थ यही है कि अन्त के समय की जो आप लोगों की कर्मातीत अवस्था की स्थिति है वह जैसे वाहन होता है ना। कोई न कोई वाहन द्वारा सैर किया जाता है। कहाँ का कहाँ पहुँच जाते हैं! वैसे जब कर्मातीत अवस्था बन जाती है तो यह स्थिति होने से एक सेकेण्ड में कहाँ का कहाँ पहुँच सकते हैं। इसलिए अन्त:वाहक शरीर कहते हैं। वास्तव में यह अन्तिम स्थिति का गायन है। उस समय आप इस स्थूल स्वरूप के भान से परे रहते हो इसलिए इनको सूक्ष्म शरीर भी कह दिया है। जैसे कहावत है उड़ने वाला घोड़ा। तो इस समय के आप सभी के अनुभव की यह बातें हैं जो कहानियों के रूप में बनाई हुई हैं। एक सेकेण्ड में आर्डर किया यहाँ पहुँचो तो वहाँ पहुँच जायेगा। ऐसा अपना अनुभव करते जाते हो? जैसे आजकल साइंस भी स्पीड़ को क्विक करने में लगी हुई है। जहाँ तक हो सकता है समय कम और सफलता ज्यादा का पुरुषार्थ कर रहे हैं। ऐसे ही आप लोगों का पुरुषार्थ भी हर बात में स्पीड को बढ़ाने का चल रहा है। जितनी-जितनी जिसकी स्पीड़ बढ़ेगी उतना ही अपने फाईनल स्टेज के नज़दीक आयेंगे। स्पीड़ से स्टेज तक पहुँचेंगे। अपनी स्पीड से स्टेज को परख सकते हो।
अभी सभी महान् पर्व शिवरात्रि मनाने का प्लैन बना रहे हो, फिर नवीनता क्या सोची है? (झण्डा लहरायेंगे) अपने-अपने सेवाकेन्द्रों पर झण्डा भले लहराओ लेकिन हरेक आत्मा के दिल पर बाप की प्रत्यक्षता का झण्डा लहराओ। वह तब होगा जब शक्ति स्वरूप की प्रत्यक्षता होगी। शक्ति स्वरूप से ही सर्वशक्तिमान को प्रत्यक्ष कर सकते हो। शक्ति स्वरूप अर्थात् संहारी और अलंकारी। जिस समय स्टेज पर आते हो उस समय पहले अपनी स्थिति की स्टेज अच्छी तरह से ठीक बनाकर फिर उस स्टेज पर आओ, जिससे लोगों को आपकी आन्तरिक स्टेज का साक्षात्कार हो। जैसे और तैयारियाँ करते हो वैसे यह भी अपनी तैयारी देखो कि अलंकारी बनकर स्टेज पर आ रही हूँ। लाइट हाउस, माइट हाउस - दोनों ही स्वरूप इमर्ज रूप में हों। जब दोनों स्वरूप होंगे तब ठीक रीति से गाइड बन सकेंगे। आपके “बाप'' शब्द में इतना स्नेह और शक्ति भरी हुई हो जो यह शब्द ज्ञान अंजन का काम करे, अनाथ को सनाथ बना दे। इस एक शब्द में इतनी शक्ति भरो। जिस समय स्टेज पर आते हो उस समय की स्थिति एक तो तरस की हो, दूसरी तरफ कल्याण की भावना, तीसरी तरफ अति स्नेह के शब्द, चौथी तरफ स्वरूप में शक्तिपन की झलक हो। अपनी स्मृति और स्थिति को ऐसा पावरफुल बनाकर ऐसे समझो कि अपने कई समय के पुकारते हुए भक्तों को अपने द्वारा बाप का साक्षात्कार कराने के लिए आई हूँ। इस रीति से अपने रूहानी रूप, रूहानी दृष्टि, कल्याणकारी वृत्ति द्वारा बाप को प्रत्यक्ष कर सकती हो। समझा, क्या करना है? सिर्फ भाषण की तैयारी नहीं करनी है। लेकिन भाषण की तैयारी ऐसी करो जो भाषण द्वारा भाषा से भी परे स्थिति में ले जाने का अनुभव कराओ। भाषण की तैयारी ज्यादा करते हैं लेकिन रूहानी आकर्षण स्वरूप की स्मृति में रहने की तैयारी पर अटेन्शन कम देते हैं। इसलिए इस बारी ज्यादा तैयारी इस बात की करनी है। हरेक के दिल पर बाप के सम्बन्ध के स्नेह की छाप लगाना है। अच्छा!
मधुबन वाले क्या सर्विस करेंगे? मधुबन वालों को उस दिन खास बापदादा अव्यक्त वतन में आने का निमन्त्रण दे रहे हैं। वहाँ वतन में आकर सभी तरफ की सर्विस को देख सकेंगे। शाम 7 से 9 बजे तक यह दो घण्टे खास सैर करायेंगे। जैसे सन्देशियों को ले जाते हैं - सभी स्थानों का सैर कराने, इसी रीति से मधुबन वालों को यहाँ बैठे हुए सर्व स्थानों की सर्विस का सैर करायेंगे। अगर बिना मेहनत के सारा सैर कर लो तो और क्या चाहिए। इसलिए मधुबन वाले उस दिन अपने को इस स्थूल देह से परे अव्यक्त वतन वासी समझ कर बैठेंगे तो सारे दिन में कई अनुभव करेंगे। फिर सुनाना, क्या अनुभव किया। उस दिन अगर अपना थोड़ा भी पुरुषार्थ करेंगे तो सहज ही अनोखे भिन्न-भिन्न अनुभव करने के वरदान को पा सकेंगे। समझा। 7 से 9 शाम को खास याद का प्रोग्राम रखना। यूं तो सारे दिन का ही निमन्त्रण दे रहे हैं। लेकिन विशेष यह सैर का समय है। ऐसे समय पर हरेक यथा शक्ति अनुभव कर सकेंगे। मधुबन वाले विशेष स्नेही हैं इसलिए विशेष निमन्त्रण है। सिर्फ बुद्धि द्वारा अपने इस देह के भान से अलग होकर बैठना। फिर ड्रामा में जो अनुभव होने हैं वह होते रहेंगे। सन्देशियों के लिए तो साक्षात्कार कॉमन बात है लेकिन बुद्धि द्वारा भी ऐसे अनुभव कर सकते हो। इतना स्पष्ट होगा जैसे इन आंखों से देखा हुआ अनुभव है। अच्छा!
टीचर्स के साथ :- इस ग्रुप को कौन सा ग्रुप कहें? (स्पीकर्स ग्रुप) स्पीकर्स अर्थात् स्पीच करने वाले। स्पीच के साथ स्पीड भी है? क्योंकि स्पीच के साथ-साथ अगर पुरुषार्थ की स्पीड भी है तो ऐसे स्पीच करने वाले के प्रभाव से विश्व का कल्याण हो सकता है। अगर स्पीड के बिना स्पीच है, तो विश्व का कल्याण होना मुश्किल हो जाता है। तो ऐसे कहें कि यह स्पीच और स्पीड़ में चलने वाले ग्रुप हैं। जिन्हों की स्पीच भी पॉवरफुल, स्पीड भी पॉवरफुल है उनको कहते हैं विश्व-कल्याणकारी, मास्टर दु:ख हर्ता सुख कर्ता। तो ऐसे कार्य में लगे हुए हो? जो दु:ख हर्ता सुख कर्ता होता है वह स्वयं इस दुनिया की लहर से भी परे होगा। और उन्हों की स्पीच भी दु:ख की लहर से परे ले जाने वाली होगी। ऐसी स्टेज पर ठहर कर स्पीच करते हो? स्पीच तो स्टेज पर ठहर कर की जाती है तो आप किस स्टेज पर ठहर स्पीच करते हो? जो बाहर की बनी हुई स्टेज होती है उस पर? स्पीकर को जिस समय कोई स्थूल स्टेज पर जाना होता है तो पहले अपनी स्थिति की स्टेज तैयार है वा नहीं - यह चेक करता है। ऐसे स्टेज पर ठहर कर स्पीच करने वाले को कहते हैं श्रेष्ठ स्पीकर। जैसे स्थूल स्टेज को तैयार करने के लिए भी कितना समय और परिश्रम करते हैं। ऐसे ही अपनी स्थिति की स्टेज सदैव तैयार रहे - उसके लिए भी इतना ही पुरुषार्थ करते हो? ऐसी पॉवरफुल स्टेज पर ठहर स्पीच करने वाले का यहाँ आबू में यादगार है। कौन सा? (दिलवाला), दिलवाला तो याद की यात्रा का यादगार है। गऊमुख नहीं देखा है? गऊमुख किसका यादगार है? यह मुख का यादगार है। जैसे बाप का यादगार है - गऊमुख। क्योंकि मुख द्वारा ही सारा स्पष्ट करते हैं इसलिए मुख का यादगार है। स्पीकर का भी काम मुख से है लेकिन ऐसे जो श्रेष्ठ स्टेज पर ठहर कर स्पीच करते हैं। सदैव एवररेडी स्टेज हो। ऐसे नहीं कि समय पर तैयार करनी पड़े। एवररेडी स्टेज होने से जो प्रभाव होता है, वह बहुत अच्छा पड़ता है। इसलिए पूछा कि प्रभावशाली हो? इस ग्रुप को प्रभावशाली ग्रुप कहें? सभी सर्टीफिकेट देंगे? (अच्छा ग्रुप है) अगर आप सर्टीफिकेट देती हो तो फिर यह सर्व को सेटिस्फाई करने वाले भी होंगे। सन्तुष्ट मणियां तो हो ना। इसमें ‘हाँ' करते हो? अगर खुद सन्तुष्ट मणियां हैं तो औरों को भी सन्तुष्ट करेंगे। टीचर्स का भी पेपर होता है, कैसे? (टीचर का पेपर सूक्ष्मवतन से आता है) टीचर का पेपर कदम कदम पर होता है। जो भी कदम उठाते हो वह ऐसा ही समझ कर उठाना चाहिए कि पेपर हॉल में बैठकर कदम उठाती हूँ। क्योंकि स्पीकर अर्थात् स्टेज पर बैठे हैं। तो जो सामने स्टेज पर होता है उसके ऊपर सभी की नज़र होती है। आप लोग भी ऊंची स्टेज पर बैठे हो। अनेक आत्माओं की निगाह आप लोगों के कदम पर है। तो आपको कदम-कदम पर ऐसा अटेन्शन से कदम उठाना है। अगर एक कदम भी ढीला वा कुछ भी नीचे ऊपर उठता है तो अनेक आप लोगों को फ़ॉलो करेंगे। इसलिए टीचर्स को जो भी कदम उठाना है वह ऐसा सोचकर उठाना है। क्योंकि ताजधारी बने हो ना? ताज कौन सा मिला है? ज़िम्मेवारी का ताज। जितनी बड़ी जिम्मेवारी उतना बड़ा ताज। तो जो बड़ी जिम्मेवारी मिली हुई है, तो अपने को ऐसे निमित्त बने हुए समझ कर के फिर कदम उठाओ। अभी अलबेलापन नहीं। ताज व तख्त-धारी बनने के बाद अलबेलापन समाप्त हो जाता है। अलबेलापन अर्थात् पुरुषार्थ में अलबेलापन। इस ग्रुप को सदैव यह समझना चाहिए कि जो भी कदम वा कर्म होता है वह हर कर्म विश्व के लिए एक एक्जाम्पुल बनकर के रहे। क्योंकि आप लोगों के इन कर्मों का कहानियों के रूप में यादगार बनेगा। आप लोगों के यह चरित्र गायन योग्य बनेंगे। इतनी ज़िम्मेवारी समझ करके चलते हो? यह इस ज़िम्मेवार ग्रुप की विशेषतायें हैं। जो जितना ज़िम्मेवार उतना ही हल्का भी रहेगा। अच्छा।