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12 Jul 1972
“मरजीवापन की स्मृति से गृहस्थी वा प्रवृत्ति की विस्मृति”
12 July 1972 · हिंदी
(अधरकुमारों की भट्ठी में)
अपने आपको जहाँ चाहो, जब चाहो ऐसे परिवर्तन कर सकते हो? भट्ठी में अपने आपको परिवर्तन करने के लिए आते हो ना। तो परिवर्तन करने की शक्ति अनुभव करते हो? कैसा भी वायुमण्डल हो, कोई भी परिस्थिति हो लेकिन अपनी स्व स्थिति के आधार से वायुमण्डल को परिवर्तन में ला सकते हो? वायुमण्डल के प्रभाव में आने वाली आत्मायें हो या वायुमण्डल को सतोप्रधान बनाने वाली आत्मायें हो? अपने को क्या समझते हो? इतना अनुभव करते हो कि अभी कोई भी वायुमण्डल हमें अपनी तरफ आकर्षित नहीं कर सकता? जो समझते हैं कि भट्ठी में आने के बाद इतनी हिम्मत वा शक्ति अपने में जमा की है, जो कहीं भी, किसी स्थान पर जाते, जमा की हुई शक्तियों के आधार से वायुमण्डल वा परिस्थिति मुझ मास्टर सर्वशक्तिमान को हिला नहीं सकती है, अपनी स्थिति को एकरस वा अटल-अचल बना सकते हैं, वह हाथ उठायें। यह बात तो स्पष्ट है ही कि दिन-प्रतिदिन परिस्थितियाँ अति तमोप्रधान बननी हैं। परिस्थितियाँ अथवा वायुमण्डल अभी सतोप्रधान बनने वाला नहीं है। अति तमोप्रधान के बाद ही फिर सतोप्रधान बनने वाला है। तो दिन-प्रतिदिन वायुमण्डल बिगड़ने वाला है, न कि सुधरने वाला। तो जैसे कमल पुष्प कीचड़ में रहते हुए न्यारा रहता है, वैसे अति तमोप्रधान, तमोगुणी वायुमण्डल में होते हुए भी अपनी स्थिति सदा सतोप्रधान रहे - इतनी हिम्मत समझ कर हाथ उठाया ना? फिर ऐसे तो नहीं कहेंगे कि यह बात ऐसे हुई इसलिए अवस्था नीचे ऊपर हुई। चाहे प्रकृति द्वारा, चाहे लौकिक सम्बन्ध द्वारा, चाहे दैवी परिवार द्वारा कोई भी परीक्षा आये वा कोई भी परिस्थिति सामने आये उसमें भी अपने आपको अचल-अटल बना सकेंगे ना? इतनी हिम्मत समझते हो ना? परीक्षाएं बहुत आनी हैं, पेपर तो होने ही हैं। जैसे-जैसे अन्तिम फाइनल रिजल्ट का समय समीप आ रहा है वैसे समय प्रति समय प्रैक्टिकल पेपर स्वत: ही होते रहते हैं। पेपर प्रोग्राम से नहीं लिया जाता। आटोमेटिकली ड्रामा अनुसार समय प्रति समय हरेक का प्रैक्टिकल पेपर होता रहता है। तो पेपर में पास होने की हिम्मत अपने में समझते हो? घबराने वाले तो नहीं हो ना? अंगद के मुआफिक जरा भी अपने बुद्धियोग को हिलाने वाले नहीं हो?
यह भट्ठी अधरकुमारों की है ना। अपने को अधरकुमार तो समझते हो ना? संकल्प वा सम्बन्ध में अधरकुमार की स्मृति नहीं रहती है? जैसे देखो, पहले बहन-भाई की स्मृति में स्थित किया गया, उसमें भी देखा गया कि बहन-भाई की स्मृति में भी कुछ देह अभिमान में आ जाते हैं, इसलिए उससे भी ऊंची स्टेज भाई-भाई की बताई। ऐसे ही अपने को अधरकुमार समझ कर चलते हो गोया प्रवृत्ति मार्ग के बन्धन में बंधी हुई आत्मा समझ कर चलते हो। इसलिए अब इस स्मृति से भी परे। अधर कुमार नहीं, लेकिन ब्रह्मा कुमार हूँ। अब मरजीवा बन गये तो मरजीवा जीवन में अधरकुमार का सम्बन्ध है क्या? मरजीवा जीवन में प्रवृत्ति वा गृहस्थी है क्या? मरजीवा जीवन में बाप-दादा ने किसको गृहस्थी बना कर नहीं दी है। एक बाप और सभी बच्चे हैं ना, इसमें गृहस्थीपन कहाँ से आया? तो अपने को ब्रह्माकुमार समझ कर चलना है। अगर अधरकुमार की स्मृति भी रहती है तो जैसी स्मृति वैसी ही स्थिति भी रहती है। इस कारण अभी इस स्मृति को भी ख़त्म करो कि हम अधरकुमार हैं। नहीं, ब्रह्माकुमार हूँ। जो बाप-दादा ने ड्यूटी दी है उस ड्यूटी पर श्रीमत के आधार पर जा रहा हूँ। मेरी प्रवृत्ति है या मेरी युगल है - यह स्मृति भी रांग है। युगल को युगल की वृत्ति से देखना वा घर को अपनी प्रवृत्ति की स्मृति से देखना, इसको मरजीवा कहेंगे? जैसे देखो, हर चीज को सम्भालने के लिए ट्रस्टी मुकरर किये जाते हैं। यह भी ऐसे समझ कर चलो - यह जो हद की रचना बाप-दादा ने ट्रस्टी बनाकर सम्भालने के लिए दी है, वह मेरी रचना नहीं लेकिन बाप-दादा द्वारा ट्रस्टी बन इसको सम्भालने के लिए निमित्त बना हुआ हूँ। ट्रस्टीपन में मेरापन नहीं होता। ट्रस्टी निमित्त होता है। प्रवृत्ति मार्ग की वृत्ति भी बिल्कुल ना हो। यह ईश्वरीय आत्मायें हैं, ना कि मेरे बच्चे हैं। भले छोटे-छोटे बच्चे हों, तो भी क्या बाप-दादा ने छोटे बच्चों की पालना नहीं की क्या? जैसे बाप-दादा ने छोटे बच्चों की पालना करते हुए ईश्वरीय कार्य के निमित्त बना दिया, वैसे ही छोटे-छोटे बच्चे वा बड़े, जिन्हों के प्रति भी बाप द्वारा निमित्त बने हो, उन आत्माओं प्रति भी यह वृत्ति रहनी चाहिए कि इन आत्माओं को ईश्वरीय सेवा के योग्य बना कर इसमें लगा देना है। घर में रहते ऐसी स्मृति रहती है? जैसे ईश्वरीय परिवार की अनेक आत्माओं के सम्बन्ध वा सम्पर्क में रहते हो वैसे ही जिन आत्माओं की ड्यूटी मिली है, उन्हों के साथ भी ऐसे ही सम्पर्क में आते वा फ़र्क रहता है? जो आप लोगों के सम्पर्क में रहने वाली आत्मायें हैं, उन्हों से रिजल्ट मंगाई जायेगी। जैसे सेवाकेन्द्र की निमित्त बनी हुई बहनों वा भाइयों से उस ईश्वरीय दृष्टि, वृत्ति से सम्पर्क में आते हो, वैसे ही उन आत्माओं से सम्पर्क में आते हो वा पिछले जन्म का अधिकार समझ चलते हो? समय प्रति समय स्थिति और वृत्ति ऊंची होती जा रही है ना। और जब तक समय के प्रमाण अपनी स्थिति और वृत्ति को ऊंचा नहीं बनाया है वा परिवर्तन में नहीं लाया है तब तक ऊंच पद कैसे पा सकेंगे? जैसे साकार में बाप को देखा - लौकिक सम्बन्ध की वृत्ति, दृष्टि वा स्मृति स्वप्न में थी? तो फॉलो फादर करना है ना। क्या वही लौकिक सम्बन्धी साथ नहीं रहते थे क्या? तो आप लोगों को भी साथ रहते हुए इस स्मृति और वृत्ति में चलने की हिम्मत रखनी है। इस भट्ठी में क्या परिवर्तन करके जायेंगे? अधरकुमार का नाम निशान समाप्त। जैसे भट्ठी में पड़ने से हर वस्तु का रूप परिवर्तन हो जाता है, वैसे इस भट्ठी में, मैं प्रवृत्ति मार्ग वाला हूँ, मैं अधर कुमार हूँ - इस स्मृति को भी समाप्त करके यह समझना कि मैं ब्रह्मा कुमार हूँ और इन निमित्त बनी हुई आत्माओं की सेवा करने के लिए ट्रस्टी हूँ। इस स्मृति को मजबूत करके जाना। यही है भट्ठी का परिवर्तन। इतना परिवर्तन करने की शक्ति अपने में भरी है या वहाँ जाकर फिर प्रवृत्ति वाले बन जायेंगे? अभी प्रवृत्ति नहीं समझना लेकिन इस गृहस्थीपन की वृत्ति से पर-वृत्ति अर्थात् दूर, गृहस्थी की वृत्ति से परे - ऐसी अवस्था बना कर जाने से ही अज्ञानी आत्मायें भी आपकी चलन से, आपके बोल से, नैनों से जो न्यारी और प्यारी स्थिति गाई जाती है, उसका अनुभव कर सकेंगे। अब तक दुनिया के बीच रहते हुए, दुनिया वालों को न्यारी और प्यारी स्थिति का अनुभव नहीं करा पाते हो क्योंकि अपनी वृत्ति इतनी न्यारी नहीं बनी है। न्यारी न बनने के कारण इतने प्यारे भी नहीं बने हो। प्यारी चीज सभी को स्वत: ही आकर्षित करती है। तो दुनिया के बीच रहते हुए ऐसी न्यारी स्थिति बनायेंगे तो प्यारी स्थिति भी स्वत: बन जायेगी। ऐसी प्यारी स्थिति अनेक आत्माओं को आपकी तरफ स्वत: ही आकर्षित करेगी। अभी भी मेहनत करनी पड़ती है ना। क्योंकि अभी तक जो न्यारी और प्यारी स्थिति होनी चाहिए वह प्रत्यक्ष रूप में नहीं है। अपने आपको प्रत्यक्ष करना पड़ता है। अगर प्रत्यक्ष रूप में हो तो प्रत्यक्ष करने की मेहनत नहीं करनी पड़े। तो अब उस श्रेष्ठ स्थिति को कर्म में प्रत्यक्ष रूप में लाओ। अब तक गुप्त है।
दुनिया के बीच अलौकिक दिखाई देते हो? कोई भी दूर से आप लोगों को देखते अलौकिकता का अनुभव करते हैं कि साधारण समझते हैं? प्रैक्टिकल जीवन का इतना प्रभाव है जो कोई भी देख कर समझे कि यह कोई विशेष आत्मायें हैं? जैसे स्थूल ड्रेस को देख कर समझ लेते हैं कि यह हम लोगों से कोई न्यारे हैं। वैसे ही यह सूरत वा अव्यक्त मूर्त न्यारापन दिखाये तब प्रभाव निकलेगा। चलते-फिरते ऐसी श्रेष्ठ स्थिति हो, ऐसी श्रेष्ठ स्मृति और वृत्ति हो जो चारों ओर की वृत्तियों को अपनी तरफ आकर्षण करे। जैसे कोई आकर्षण की चीज आस-पास वालों को अपनी तरफ आकर्षित करती है ना। सभी का अटेन्शन जाता है। वैसे यह रुहानियत वा अलौकिकता आस-पास वालों की वृत्तियों को अपनी तरफ आकर्षित नहीं कर सकती है? क्या यह स्टेज अन्त में आनी है? साधारण रीति भी कोई रायल फैमली के बच्चे होते हैं तो उनकी एक्टिविटी से, उन्हों के बोल से ना परिचित होते हुए भी जान लेते हैं कि यह कोई रॉयल फैमिली की आत्मायें हैं। तो क्या अलौकिक वृत्ति में स्थित रहने वाली श्रेष्ठ आत्माओं का दूर से इतना प्रभाव नहीं पड़ सकता है? क्या मुश्किल है? जो सहज बात होती है वह करने में देरी लगती है क्या?
ऐसे समझें कि भट्ठी से इतने सभी अलौकिक शक्तिशाली, मास्टर ज्ञान सूर्य बनकर जब चारों ओर जायेंगे तो जैसे सूर्य छिप नहीं सकता, वैसे मास्टर ज्ञान सूर्य का प्रकाश वा प्रभाव चारों ओर फैलने से यहाँ तक भी प्रैक्टिकल सबूत आयेगा? सबूत कौन-सा? कम से कम जो आप द्वारा प्रभावित हुई आत्मायें हों, उन्हों का समाचार तो आये। स्वयं ना आवें, लेकिन समाचार तो आये। हरेक एक-एक तरफ जाकर प्रभाव डाले तो कितने समाचार के पत्र आयेंगे? ऐसा सबूत देंगे? वा जैसे भट्ठी करके जाते हैं, कुछ समय प्रभावशाली रहते फिर प्रभाव में आ जाते हैं। बाप तो सदैव उम्मीदवार ही रहते हैं। अब रिजल्ट देखेंगे कि कहाँ तक अविनाशी रिजल्ट चलती है और कहाँ तक अटल-अचल रहते हैं?
वरदान भूमि में वरदानों की प्राप्ति जो की है, उन प्राप्त हुए वरदानों से अब वरदाता-मूर्त बनकर निकलना है। कोई भी आत्मा सम्बन्ध वा सम्पर्क में आये तो महादानी और महा-वरदानी की स्मृति में रहते हुए हर आत्मा को कुछ ना कुछ प्राप्ति जरूर करानी है। कोई भी आत्मा खाली हाथ नहीं जानी चाहिए। आप तो महादानी हो ना। वे उस दान को सम्भालते हैं या नहीं, वह उनकी तकदीर हुई। आप तो महादानी बन अपना कर्तव्य करते रहो, उसी कल्याणकारी वृत्ति और दृष्टि से। विश्व कल्याणकारी हूँ, महादानी हूँ, वरदानी हूँ - इसी पावरफुल वृत्ति में रहने से आत्माओं को परिवर्तन कर सकेंगे। अभी अपनी वृत्ति को पावरफुल बनाओ। अच्छा!