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7 Dec 1983
“श्रेष्ठ पद की प्राप्ति का आधार - ‘मुरली’”
7 December 1983 · हिंदी
आज मुरलीधर बाप अपने मुरली के स्नेही बच्चों को देख रहे हैं कि कितना मुरलीधर बाप से स्नेह है और कितना मुरली से स्नेह है। मुरली के पीछे कैसे मस्त हो जाते हैं। अपनी देह की सुध-बुध भूल देही बन विदेही बाप से सुनते हैं। जरा भी देहधारी स्मृति की सुध-बुध नहीं। इस विधि से मस्त हो कैसे खुशी में नाचते हैं। स्वयं को भाग्य-विधाता बाप के सम्मुख पदमापदम भाग्यवान समझ रुहानी नशे में रहते हैं। जैसे-जैसे यह रुहानी नशा, मुरलीधर की मुरली का नशा चढ़ जाता है तो अपने को इस धरनी और देह से ऊपर उड़ता हुआ अनुभव करते हैं। मुरली की तान से अर्थात् मुरली के साज़ और राज़ से मुरलीधर बाप के साथ अनेक अनुभवों में चलते जाते। कभी मूलवतन, कभी सूक्ष्मवतन में चले जाते, कभी अपने राज्य में चले जाते। कभी लाइट हाउस, माइट हाउस बन इस दु:खी अशान्त संसार की आत्माओं को सुख-शान्ति की किरणें देते, रोज़ तीनों लोकों की सैर करते हैं। किसके साथ? मुरलीधर बाप के साथ। मुरली सुन-सुन अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूलते हैं। मुरलीधर की मुरली के साज़ से अविनाशी दुआ की दवा मिलते ही तन तनदुरुस्त, मनदुरुस्त हो जाता है। मस्ती में मस्त हो बेपरवाह बादशाह बन जाते हैं। बेगमपुर के बादशाह बन जाते हैं। स्वराज्य-अधिकारी बन जाते हैं। ऐसे विधि पूर्वक मुरली के स्नेही बच्चों को देख रहे थे। एक ही मुरली द्वारा कोई राजा, कोई प्रजा बन जाता है क्योंकि विधि द्वारा सिद्धि होती है, जितना जो विधिपूर्वक सुनते उतना ही सिद्धि स्वरुप बनते हैं।
एक हैं विधिपूर्वक सुनने वाले अर्थात् समाने वाले। दूसरे हैं नियम पूर्वक सुनने कुछ समाने कुछ वर्णन करने वाले। तीसरों की तो बात ही नहीं। यथार्थ विधिपूर्वक सुनने और समाने वाले स्वरुप बन जाते हैं। उन्हों का हर कर्म मुरली का स्वरुप है। अपने आप से पूछो - किस नम्बर में हैं? पहले वा दूसरे में? मुरलीधर बाप का रिगार्ड अर्थात् मुरली के एक-एक बोल का रिगार्ड। एक-एक वरशन 2500 वर्षो की कमाई का आधार है। पदमों की कमाई का आधार है। उसी हिसाब प्रमाण एक वरदान मिस हुआ तो पदमों की कमाई मिस हुई। एक वरदान खजानों की खान बना देता है। ऐसे मुरली के हर बोल को विधिपूर्वक सुनने और उससे प्राप्त हुई सिद्धि के हिसाब-किताब की गति को जानने वाले श्रेष्ठ गति को प्राप्त होते हैं। जैसे कर्मों की गति गहन है वैसे विधिपूर्वक मुरली सुनने समाने की गति भी अति श्रेष्ठ है। मुरली ही ब्राह्मण जीवन की साँस (श्वाँस) है। श्वाँस नहीं तो जीवन नहीं - ऐसी अनुभवी आत्माएं हो ना। अपने आपको रोज़ चेक करो कि आज इसी महत्व पूर्वक, विधि पूर्वक मुरली सुनी? अमृतवेले की यह विधि सारा दिन हर कर्म में सिद्धि स्वरुप स्वत: और सहज बनाती है। समझा।
नये-नये आये हो ना। तो लास्ट सो फास्ट जाने का तरीका सुना रहे हैं। इससे फास्ट चले जायेंगे। समय की दूरी को इसी विधि से गैलप कर सकते हो। साधन तो बापदादा सुनाते हैं जिससे किसी भी बच्चे का उल्हना रह न जाये। पीछे क्यों आये वा क्यों बुलाया... लेकिन आगे बढ़ सकते हो। आगे बढ़ो श्रेष्ठ विधि से श्रेष्ठ नम्बर लो। उल्हना तो नहीं रहेगा ना। रिफाइन रास्ता बता रहे हैं। बने बनाये पर आये हो। निकले हुए मक्खन को खाने के समय पर आये हो। एक मेहनत से तो पहले ही मुक्त हो। अभी सिर्फ खाओ और हज़म करो। सहज है ना। अच्छा!
ऐसे सर्व विधि सम्पन्न, सर्व सिद्धि को प्राप्त करने वाले, मुरलीधर की मुरली पर देह की सुध-बुध भूलने वाले, खुशियों के झूले में झूलने वाले, रुहानी नशे में मस्त योगी बन रहने वाले, मुरलीधर और मुरली का रिगार्ड रखने वाले, ऐसे मास्टर मुरलीधर, मुरली वा मुरलीधर स्वरुप बच्चों को बापदादा का साकारी और आकारी दोनों बच्चों को स्नेह सम्पन्न याद-प्यार और नमस्ते।
पार्टियों के साथ अव्यक्त बापदादा की मुलाकात:-
1\. सदा एक बाप की याद में रहने वाली, एकरस स्थिति में स्थित रहने वाली श्रेष्ठ आत्मायें हो ना! सदैव एकरस आत्मा हो या और कोई भी रस अपनी तरफ खींच लेता है? कोई अन्य रस अपनी तरफ खींचता तो नहीं है ना? आप सबको तो है ही एक। एक में सब समाया हुआ है। जब है ही एक, और कोई है नहीं। तो जायेंगे कहाँ। कोई काका, मामा, चाचा तो नहीं है ना। आप सबने क्या वायदा किया? यही वायदा किया है ना कि सब कुछ आप ही हो। कुमारियों ने पक्का वायदा किया है? पक्का वायदा किया और वरमाला गले में पड़ी। वायदा किया और वर मिला। वर भी मिला और घर भी मिला। तो वर और घर मिल गया। कुमारियों के लिए मां-बाप को क्या सोचना पड़ता है। वर और घर अच्छा मिले। तुम्हें तो ऐसा वर मिल गया जिसकी महिमा जग करता है। घर भी ऐसा मिला है, जहाँ अप्राप्त कोई वस्तु नहीं। तो पक्की वरमाला पहनी है? ऐसी कुमारियों को कहा जाता है समझदार। कुमारियां तो हैं ही समझदार। बापदादा को कुमारियों को देखकर खुशी होती है क्योंकि बच गयीं। कोई गिरने से बच जाए तो खुशी होगी ना। माताएं जो गिरी हुई थी उनको तो कहेंगे कि गिरे हुए को बचा लिया लेकिन कुमारियों के लिए कहेंगे गिरने से बच गई। तो आप कितनी लक्की हो। माताओं का अपना लक है, कुमारियों का अपना लक है। मातायें भी लकी हैं क्योंकि फिर भी गऊपाल की गऊएं हैं।
2\. सदा मायाजीत हो? जो मायाजीत होंगे उनको विश्व कल्याणकारी का नशा जरुर होगा। ऐसा नशा रहता है? बेहद की सेवा अर्थात् विश्व की सेवा। हम बेहद के मालिक के बालक हैं, यह स्मृति सदा रहे। क्या बन गये, क्या मिल गया, यह स्मृति रहती है। बस, इसी खुशी में सदा आगे बढ़ते रहो। बढ़ने वालों को देख बापदादा हर्षित होते हैं।
सदा बाप के याद की मस्ती में मस्त रहो। ईश्वरीय मस्ती क्या बना देती है? एकदम फर्श से अर्श निवासी। तो सदा अर्श पर रहते हो या फर्श पर क्योंकि ऊंचे ते ऊंचे बाप के बच्चे बने, तो नीचे कैसे रहेंगे। फर्श तो नीचे होता है। अर्श है ऊंचा तो नीचे कैसे आयेंगे। कभी भी बुद्धि रुपी पांव फर्श पर नहीं। ऊपर। इसको कहा जाता है ऊंचे ते ऊंचे बाप के ऊंचे बच्चे। यही नशा रहे। सदा अचल अडोल सर्व खजानों से सम्पन्न रहो। थोड़ा भी माया में डगमग हुए तो सर्व खजानों का अनुभव नहीं होगा। बाप द्वारा कितने खजाने मिले हुए हैं, उन खजानों को सदा कायम रखने का साधन है, सदा अचल अडोल रहो। अचल रहने से सदा ही खुशी की अनुभूति होती रहेगी। विनाशी धन की भी खुशी रहती है ना। विनाशी नेतापन की कुर्सी मिलती है, नाम-शान मिलता है तो भी कितनी खुशी होती है। यह तो अविनाशी खुशी है। यह खुशी उसे रहेगी जो अचल-अडोल होंगे।
सभी ब्राह्मणों को स्वराज्य प्राप्त हो गया है। पहले गुलाम थे, गाते थे मैं गुलाम, मैं गुलाम... अब स्वराज्यधारी बन गये। गुलाम से राजा बन गये। कितना फर्क पड़ गया। रात दिन का अन्तर है ना। बाप को याद करना और गुलाम से राजा बनना। ऐसा राज्य सारे कल्प में नहीं प्राप्त हो सकता। इसी स्वराज्य से विश्व का राज्य मिलता है। तो अभी इसी नशे में सदा रहो - हम स्वराज्य अधिकारी हैं, तो यह कर्मेन्द्रियां स्वत: ही श्रेष्ठ रास्ते पर चलेंगी। सदा इसी खुशी में रहो कि पाना था जो पा लिया... क्या से क्या बन गये। कहाँ पड़े थे और कहाँ पहुँच गये।
प्रश्न:- मायाजीत बनने का सहज साधन क्या है?
उत्तर:- मायाजीत बनने के लिए अपनी बुराईयों पर क्रोध करो। जब क्रोध आये तो आपस में नहीं करना, बुराईयों से क्रोध करो, अपनी कमजोरियों पर क्रोध करो तो मायाजीत सहज बन जायेंगे।
प्रश्न:- गांव वालों को देख बापदादा विशेष खुश होते हैं, क्यों?
उत्तर:- क्योंकि गांव वाले बहुत भोले होते हैं। बाप को भी भोलानाथ कहते हैं। जैसे भोलानाथ बाप वैसे भोले गांव वाले तो सदा यह खुशी रहे कि हम विशेष भोलानाथ के प्यारे हैं।
अच्छा, ओम् शान्ति।