अपने मूल स्वभाव; शांति और प्रेम का अनुभव करें (भाग 3)

कभी-कभी, हममें से कई लोग गुस्से को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं जिससे हम लोगों को नियंत्रित कर सकें। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि, लोगों को नियंत्रित करना मुश्किल या असंभव है, बल्कि उन्हें प्रभावित करना आसान है। लोगों के प्रति शांति, प्रेम और शुभकामनाएं रखने से, उन्हें प्रभावित करना हमेशा आसान होता है। इसके अलावा, लोगों के प्रति पॉजीटिव एटिट्यूड और दृष्टिकोण रखना कि, वे अच्छे हैं, उन्हें वह करने में मदद करता है जिसकी हम उनसे उम्मीद रखते हैं। इसके अलावा, विनम्र और दयालु होने से लोग आपका सम्मान करेंगे और वही करेंगे जो आप चाहते हैं या अपने में बदलाव लाएंगे।
हमेशा याद रखें कि, स्वाभाविक रूप से हम सभी; शांति और प्रेम से भरपूर आत्माएं हैं और जैसे-जैसे हम जन्म और पुनर्जन्म के चक्र में आते हैं, अपने इन गुणों को खोते जाते हैं और अनेक प्रकार की अन्य इच्छाओं को जागृत करने लगते हैं। किसी भी व्यक्ति से; एक विशेष प्रकार के व्यवहार की अपेक्षा करना या इच्छा रखना सभी प्रकार के क्रोध का मूल कारण है। इसके अलावा, अपनी पसंद के अनुसार किसी विशेष स्थिति की इच्छा करना भी, क्रोध का एक अन्य कारण है। ये दोनों इच्छाएं पूरी न होने पर हमें चिड़चिड़ा या परेशान कर देती हैं या कुछ मामलों में अग्रेसिव भी बना देती हैं। दूसरी ओर, परिस्थितियों और लोगों को जैसे वो हैं, वैसे ही सहजता से स्वीकार करना उन लोगों के लिए संभव है जो आंतरिक रूप से इन गुणों और शक्तियों से भरपूर हैं। इन सभी गुणों और शक्तियों को हम आध्यात्मिक ज्ञान की मदद से अपने जीवन में ला सकते हैं। हम जितना अधिक आध्यात्मिक रूप से मजबूत होंगे, उतना ही अधिक हम अपने जीवन में उन बदलावों को स्वीकार करने में सक्षम होंगे; जो हमारी पसंद के अनुसार नहीं हैं। इसके अलावा, जब कभी-कभी हमारे अपने करीबी लोग; हमारे विचारों के अनुसार या पसंद से अलग तरीके से व्यवहार करते हैं, तो यही गुण हमें स्टेबल भी रखते हैं। इसके साथ, बाहरी स्तर पर संतुष्टता हमें अहंकारी बना सकती है जबकि दूसरी ओर इन सुंदर गुणों की आंतरिक भरपूरता हमें विनम्र और हमारे व्यवहार को बहुत सरल बनाती है; एक ऐसा व्यवहार जो लोगों को आसानी से संतुष्ट कर देता है।
आज का अभ्यास
अपने मूल गुण शांति और प्रेम को पहचानें। यह संदेश सिखाता है कि आध्यात्मिक मजबूती से अहंकार घटता और विनम्रता बढ़ती है।
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