आर्थिक तनाव और जीवन की उथल-पुथल के बीच, 13 वर्ष पहले मैंने अनजाने में शराब का सहारा लिया। जिसे मैंने 'सहारा' समझा था, वह धीरे-धीरे एक गहरी लत बन गया। परिणाम स्वरूप, भूख मिट गई, लीवर कमजोर होने लगा और मन निरंतर बेचैनी की गिरफ्त में रहने लगा। मैं छोड़ना चाहता था, पर विवश था। मेरे जीवन में निर्णायक मोड़ तब आया, जब मैंने ब्रह्माकुमारीज़ के माध्यम से राजयोग का मार्ग अपनाया। स्वयं की पहचान और आध्यात्मिक सत्य ने मेरे भीतर सोई हुई शक्ति को जगा दिया।
मुझे गहराई से यह अनुभव हुआ कि मैं एक 'देवकुल' की पवित्र आत्मा हूँ-व्यसन मेरा स्वभाव नहीं, बल्कि एक विकार है।
इसी आत्म-जागृति ने बरसों पुरानी लत की जंजीरों को काट दिया। नियमित राजयोग अभ्यास के परिणामस्वरूप न केवल मेरा शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर हुआ, बल्कि मेरा मानसिक और भावनात्मक संतुलन भी मजबूत हुआ। अब मेरा मन पहले की तरह अशांत नहीं रहता, बल्कि हल्कापन, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव करता है। मेरे पारिवारिक संबंध, जो पहले तनावपूर्ण हो गए थे, अब मधुर और सहयोगपूर्ण बन चुके हैं। आज मैं पूरे आत्मविश्वास और अनुभव के साथ यह कह सकता हूँ कि जीवन की किसी भी चुनौती का समाधान 'नशा' नहीं, बल्कि 'आत्मबल' है। जब इंसान स्वयं को पहचान लेता है और अपने भीतर की शक्ति को जाग्रत कर लेता है, तब कोई भी बुरी आदत या परिस्थिति उसे लंबे समय तक बाँधकर नहीं रख सकती।






