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9 Dec 1970
“पुरुषार्थ का मुख्य आधार कैचिंग पॉवर”
9 December 1970 · हिंदी
आज हरेक की दो बातें देख रहे हैं कि हरेक कितना नालेजफुल और कितना पावरफुल बने हैं। उसमें भी मुख्य कैचिंग पॉवर हरेक की कितनी पावरफुल हैं - यह देख रहे हैं। पुरुषार्थ का मुख्य आधार कैचिंग पॉवर पर है। जैसे आजकल साईस वाले आवाज को कैच करने का भी प्रयत्न करते हैं। लेकिन साइलेन्स की शक्ति से आप लोग क्या कैच करते हो? जैसे वह बहुत पहले के साउन्ड को कैच करते हैं, वैसे आप क्या कैच करते हो? अपने 5000 वर्ष पहले के दैवी संस्कार कैच कर सकते हो? कैचिंग पावर इतनी आई है। वह तो दूसरों की साउन्ड को कैच कर सकते हैं। आप अपने असली संस्कारों को सिर्फ कैच नहीं करते, लेकिन अपना प्रैक्टिकल स्वरूप बनाते हो। सदैव यह स्मृति में रखो कि मैं यही था और फिर बन रहा हूँ। जितना-जितना उन संस्कारों को कैच कर सकेंगे उतना स्वरूप बन सकेंगे। अपनी स्मृति को पावरफुल बनाओ अर्थात् श्रेष्ठ और स्पष्ट बनाओ। जैसे अपने वर्तमान स्वरूप का, वर्तमान संस्कारों का स्पष्ट अनुभव होता है ऐसे अपने आदि स्वरूपों और संस्कारों का भी इतना ही स्पष्ट अनुभव हो। समझा। इतनी कैचिंग पावर चाहिए। जैसे वर्तमान समय में अपनी चलन व कर्तव्य स्पष्ट और सहज स्मृति में रहती है। ऐसे ही अपनी असली चलन सहज और स्पष्ट स्मृति में रहे। सदैव यही दृढ़ संकल्प रहे कि यह मैं ही तो था। 5000 वर्ष की बात इतनी स्पष्ट अनुभव में आये जैसे कल की बात। इसको कहते हैं कैचिंग पावर। अपनी स्मृति को इतना श्रेष्ठ और स्पष्ट बनाकर जाना। भट्ठी में आये हो ना। सदैव अपना आदि स्वरूप और आदि संस्कार सामने दिखाई दे। अपनी स्मृति को पावरफुल बनाने से वृत्ति और दृष्टि स्वत: ही पावरफुल बन जायेंगी। फिर यह कुमार ग्रुप क्या बन जायेंगे? अनुकुमार अर्थात् अनोखे। हरेक के दो नयनों से दो स्वरूप का साक्षात्कार होगा। कौन से दो स्वरूप? सुनाया था ना कि निराकारी और दिव्य गुणधारी। फरिश्ता रूप और दैवी रूप। हरेक ऐसे अनुभव करेंगे वा हरेक से ऐसा अनुभव होगा जैसे कि चलता फिरता लाइट हाउस और माइट हाउस हो। ऐसे अपने स्वरूप का साक्षात्कार होता है? जब 5000 वर्ष की बात को कैच कर सकते हो, अनुभव कर सकते हो तो इस अन्तिम स्वरूप का अनुभव नहीं होता है? अभी जो कुछ कमी रह गई है वह भरकर ऐसे अनुभवी मूर्त बनकर जायेंगे। तो देखना कभी कोई कमी न रह जाये। भट्ठी से ऐसा परिवर्तन करके जाना, जैसे कभी-कभी सतयुगी आत्मायें जब प्रवेश होती हैं तो उन्हों को इस पुरुषार्थी जीवन का बिल्कुल ही नालेज नहीं होता। ऐसे आप लोगों को कमजोरियों और कमियों की नालेज ही मर्ज हो जाये। इसके लिए विशेष इस ग्रुप को दो बातें याद रखनी है। दो बातें दो शब्दों में ही हैं। एक गेस्ट हाउस, दूसरा गेट आउट अर्थात् बाहर निकालना है और आगे के लिए अन्दर आने नहीं देना है। दूसरा इस पुरानी दुनिया को सदैव गेस्ट हाउस समझो। फिर कभी कमजोरी वा कमी का अनुभव नहीं करेंगे। सहज पुरुषार्थ है ना। इस ग्रुप को कमाल कर दिखानी है इसलिए सदैव लक्ष्य रखना है कि अब फिर 21 जन्म के लिए रेस्ट करना है। लेकिन अभी एक सेकण्ड में भी मन्सा, वाचा, कर्मणा सर्विस से रेस्ट नहीं। तब ही बेस्ट बनेंगे। समझा। क्योंकि यह है हार्ड वर्कर ग्रुप। हार्ड वर्कर ग्रुप में रेस्ट नहीं। कभी रेस्ट नहीं करता और वेस्ट नहीं करता। इसलिए इस हार्ड वर्कर्स ग्रुप वा रूहानी सेवाधारी संगठन को सेवा के सिवाए और कुछ सूझे ही नहीं। यह है नाम का काम। यह भी याद रखना - सेवा प्रति स्वयं को ही ऑफर करना है तब बाप दादा से ऑफरीन मिलेगी। हार्ड वर्कर्स वा रूहानी सेवाधारी ग्रुप को सदैव यह स्लोगन याद रखना है। समाना और सामना करना हमारा निशाना है। यह है इस ग्रुप का स्लोगन। सामना माया से करना है न कि दैवी परिवार से। समाना क्या है? अपने पुराने संस्कारों को समाना है। नालेजफुल के साथ-साथ पावरफुल भी बनना है तब ही सर्विसएबुल बनेंगे। अच्छा।
तिलक समारोह देख राज-तिलक समारोह याद आता है? अभी यह तिलक सम्पूर्ण स्थिति में रहने के लिए है। फिर मिलेगा राज-तिलक। यह तिलक है प्रतिज्ञा और प्रत्यक्षता का तिलक। इतनी पावर है? रूहानी सेवाधारी ग्रुप के लिए यह खास शिक्षा दे रहे हैं। अपने को जितना अधिकारी समझते हो उतना ही सत्कारी बनो। पहले सत्कार देना फिर अधिकार लेना। सत्कार और अधिकार दोनों साथ-साथ हो। अगर सत्कार को छोड़ सिर्फ अधिकार लेंगे तो क्या हो जायेगा? जो कुछ किया वह बेकार हो जायेगा। इसलिए दोनों बातों को साथ-साथ रखना है। अच्छा।