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18 Jul 1974
“सम्पूर्ण पवित्र वृत्ति और दृष्टि से श्रेष्ठ तकदीर की तस्वीर”
18 July 1974 · हिंदी
आज विशेष रूप से, मधुबन निवासियों के तकदीर की लकीर देख रहे हैं। हरेक श्रीमत के अनुसार व बापदादा की पालना के अनुसार, अपनी-अपनी तकदीर की लकीर बना रहे हैं। क्या अपनी तस्वीर को सदैव दर्पण में देखते रहते हो? क्या इस तकदीर की लकीर की मुख्य विशेषताओं को जानते हो? स्थूल तस्वीर व चित्र बनाने वाले जानते हैं कि इस चित्र की वैल्यू (कीमत) किन-किन विशेषताओं के आधार पर होगी। स्थूल चित्र की मुख्य विशेषता, आकर्षण व वैल्यू उसके फेस (चेहरे) के आधार पर ही होती है। कोई भी चित्र को देखेंगे, तो सबकी नज़र पहले उसके चेहरे अर्थात् फेस (चेहरे) पर ही जाती है। हर चित्र के नैन-चैन देखते हुए ही, उन चित्रों की वैल्यू की जाती है। वैसे भी, इस तकदीर के तस्वीर की वैल्यू, मुख्य किन बातों पर होती है? उसकी मुख्य क्या विशेषतायें हैं? अगर कोई की तकदीर की तस्वीर देखेंगे तो क्या विशेषतायें देखेंगे? एक मुख्य विशेषता यह देखी जाती है कि तकदीर की तस्वीर में क्या स्मृति पॉवरफुल है अर्थात् सदा स्मृति स्वरूप है? दूसरी बात कि क्या भाई-भाई की वृत्ति सदा कायम रहती है? तीसरी, क्या रूहानी अर्थात् सम्पूर्ण पवित्र दृष्टि है? मूल में ये तीन ही बातें हैं - स्मृति, वृत्ति और दृष्टि। इन तीनों विशेषताओं के आधार से ही दिव्य गुणों का श्रृंगार व चमक, झलक और फलक तस्वीर में दिखाई देती है। अगर यह तीनों ही बातें, युक्तियुक्त व श्रेष्ठ हैं और यह यथार्थ हैं, तो ऐसी तकदीर की तस्वीर ऑटोमेटिकली सर्व आत्माओं को अपनी तरफ आकर्षित करती है। जैसे स्थूल नेत्रों के नैन-चैन, रास्ता चलते हुए, आत्मा को भी अपनी तरफ आकर्षित कर देते हैं, ऐसे ही यह तकदीर की तस्वीर भी सर्व आत्माओं को अपनी रूहानी दृष्टि व सदा स्मृति और वृत्ति से अपनी तरफ आकर्षित जरुर करती है। जैसे स्थूल चित्र देहधारी बनाने में अर्थात् देह अभिमान में लाने के निमित्त बन जाते हैं, ना चाहते हुए भी आकर्षित करते हैं, कच्चे ब्राह्मणों को व देही अभिमानी बनने के पुरुषार्थियों को भी आकर्षित कर देह अभिमानी बना देते हैं, जो ही फिर कम्पलेन्ट (शिकायत) करते हैं कि रास्ता चलते चैतन्य चित्र व जड़ चित्र देखते हुए, आत्म अभिमानी से देह अभिमानी बन जाते हैं। ऐसे ही जब रूहानी चित्र व तस्वीर आकर्षणमय बनायेंगे तो अनेक आत्मायें चलते-फिरते भी देह अभिमानी से निकल देही अभिमानी बन जायेंगी। जब स्थूल चित्रों में इतनी आकर्षण है, तो क्या आप रूहानी चैतन्य चित्रों में इतनी रूहानी आकर्षण नहीं है, अब यही चेक करना है कि मेरी तस्वीर व चित्र कहाँ तक आकर्षणमूर्त बना है? इस रूहानी चित्र में अगर इन तीन विशेष बातों में से एक की भी कमी है तो वह वैल्युएबल नहीं गिना जायेगा। जैसे स्थूल चित्रों में भी आंख, नाक व कान आदि-आदि कोई भी एक चीज़ यथार्थ नहीं होती है, तो चित्र की वैल्यू कम हो जाती है। चाहे सारा चित्र कितना ही सुन्दर हो, लेकिन मुख्य फेस में, अगर थोड़ी-सी भी कमी रहती है, तो चित्र बेकार हो जाता है या फिर उसकी वैल्यू आधी हो जाती है। ऐसे ही, यहाँ भी इन तीन विशेषताओं में से एक की भी कमी है तो प्रालब्ध व प्राप्ति के समय में से, आधा समय कम हो जाता है अर्थात् सोलह कला से चौदह कला हो जाने से आधी वैल्यू हो गयी ना? इसलिये इन तीनों ही बातों की हर समय चेकिंग चाहिए। अच्छा, तो क्या ऐसी चेकिंग करते हो?
क्या चेकिंग का यन्त्र जानते हो? यन्त्र द्वारा ही तो चेकिंग करेंगे ना? वह कौन सा यन्त्र है कि जिससे अपने को चेक कर सको? यंत्र है बुद्धि, लेकिन दिव्य-बुद्धि का नेत्र ब्राह्मण बनते ही दे देते हैं। जैसे, ऐसे कई लौकिक कुल होते हैं जहाँ जन्म लेने से ही युद्ध में व हिंसा में प्रवीण बनाने के लिये बचपन से ही तलवार के बजाय चाकू व लाठी चलाना सिखलाते हैं। जिससे कि उनको अपने शूरवीर कुल की स्मृति रहे। बापदादा भी हर ब्राह्मण को माया के वार से बचने के लिये व माया को परखने के लिये यह दिव्य-बुद्धि का नेत्र देते हैं। लेकिन दिव्य-बुद्धि के बजाय, जब साधारण लौकिक बुद्धि वाले बन जाते हैं, तब माया को परख नहीं सकते व माया के वार से बच नहीं सकते व अपनी चेकिंग नहीं कर सकते। पहले यह देखो कि क्या अपना दिव्य बुद्धि-रूपी नेत्र अपने पास कायम है? कहीं दिव्य बुद्धि-रूपी नेत्र पर, माया के संगदोष व वातावरण का प्रभावशाली जंक तो नहीं लग रहा है व कोई डिफेक्ट तो नहीं कर रहा है?
अपनी ऐसी श्रेष्ठ तस्वीर बनाने के लिये मुख्य तीन विशेषताओं को भरने के लिये तीन शब्द याद रखो। (1) निर्वाण स्थिति में रहना है (2) निर्मान बनना है और (3) निर्माण करना है। निर्वाण, निर्माण और निर्मान अर्थात् मान से परे - यह तीन शब्द स्मृति में रखो तो तकदीर की तस्वीर आकर्षणमय बन जायेगी। चलते-चलते इन तीन बातों की कमी हो जाती है। निर्वाण स्थिति में कम रहते हैं, वाणी में सहज और रुचि से आते हैं। जितनी वाणी से लगन है, उतनी वाणी से परे स्थिति में स्थित होने की लगन व रस कम अनुभव करते हो। निर्मान बनने के बजाए अनेक प्रकार के मान, देह का व पोजीशन का, गुणों का, सेवा का, सफलता का व अनेक प्रकार के मान सहज स्वीकार कर लेते हो या स्वीकार करने की इच्छा में रहते हो। मान के जिज्ञासु हो, इसलिये स्वमान का कोर्स अभी तक समाप्त नहीं कर सके हो। जब यह जिज्ञासु रूप समाप्त होता है, तब ही स्वमान की स्थिति स्वत: और सदा रहती है। मान, स्वमान को भुला देता है। ऐसे ही नव-निर्माण करने के बजाय या कन्स्ट्रक्शन (निर्माण) के बजाय डिस्ट्रक्शन (बिगाड़ या गिरा देना) कर देते हो। अर्थात् नव-निर्माण के बजाय कभी-कभी कोई की स्थिति को नीचे गिराने के निमित्त बन जाते हो। सदैव हर कर्म में व हर संकल्प में चेक करो कि यह संकल्प, बोल व कर्म क्या नव-निर्माण के निमित्त हैं? ऐसी स्टेज रखने से सर्व विशेषतायें स्वत: ही आ जायेंगी। यह है वर्तमान समय पुरुषार्थ को तीव्र करने की युक्ति।
मधुबन निवासियों की रिजल्ट अच्छी रही। मैजॉरिटी (अधिकतर) स्नेह और सहयोग में अथक सेवाधारी रहे हैं और आगे भी बनते रहेंगे। महिमा योग्य तो बने हो, जो कि स्वयं बापदादा महिमा कर रहे हैं। अब आगे क्या करना है? मधुबन निवासियों को और सब आत्माओं से विशेष व्रत लेना चाहिए। कौन सा? व्रत यही लेना है कि हम सब एक मत, एक ही श्रेष्ठ वृत्ति, एक ही रूहानी दृष्टि और एकरस अवस्था में एक-दो के सहयोगी बन, शुभ चिन्तक बन, शुभ भावना और शुभ कामना रखते हुए और अनेक संस्कार होते हुए भी, एक बाप समान सतोप्रधान संस्कार और स्व के भाव में रहने वाला स्वभाव बनाने का किला मजबूत बनायेंगे - यह है व्रत। क्या स्वयं के प्रति व सर्व आत्माओं के प्रति, यह व्रत लेने की हिम्मत है? स्वयं के प्रति तो प्रवृत्ति में रहने वाले और वातावरण में रहने वाले भी करते हैं। मधुबन निवासियों में न सिर्फ स्वयं के प्रति, साथ ही संगठन के प्रति भी व्रत लेने की हिम्मत चाहिए। यही मधुबन वरदान भूमि की विशेषता है। समझा!
जैसे अभी हिम्मत का प्रत्यक्ष फल दिखाया, ऐसे ही एक-दो को सावधान करते हुए और एक-दो के सहयोगी बनते हुए, इस व्रत को साकार रूप में लाने में सफल हो जायेंगे। जैसे और ज़ोन वालों को, अपनी-अपनी विशेष सर्विस का सबूत देने के लिये सुनाया है वैसे ही मधुबन निवासियों को भी इस बात का सबूत देना है। सबूत देना मुश्किल है क्या? साकार रूप द्वारा व अव्यक्त रूप द्वारा शिक्षा और स्नेह की पालना, कितने समय ली है? पालना लेने के बाद, अन्य आत्माओं की पालना करने के निमित्त बन जाते हैं। क्या ऐसी पालना करने के निमित्त बने हो या अभी तक लेने वाले ही हो? अभी तो पुरानों को, आने वाले नये बच्चों की पालना करनी चाहिए अर्थात् अपने शिक्षा स्वरूप द्वारा और स्नेह द्वारा उनको आगे बढ़ाने में सहयोगी बनना है और इस कार्य में दिन-रात बिज़ी रहना चाहिए। यह अव्यक्त पार्ट भी विशेष नयों के लिये है और पुरानों को तो अब बाप के समान बन, नई आत्माओं के हिम्मत और उल्लास को बढ़ाना है। जैसे बापदादा ने बच्चों को अपने से भी आगे रखते हुए, अपने से भी ऊंच बनाया, ऐसे ही पुरानों का कार्य है नयों को अपने से भी आगे बढ़ाने का सबूत दिखाना व सर्व शिक्षाओं को साकार स्वरूप में दिखाना। पालना का प्रैक्टिकल रूप रिटर्न रूप में देना है।
अच्छा, ऐसे सपूत बच्चे, अपनी तकदीर की तस्वीर अपनी धारणाओं द्वारा दिखलाने वाले, सदा मूल मन्त्र और यन्त्र को कर्तव्य में लाने वाले, बापदादा के समान हर सेकण्ड और संकल्प सर्व आत्माओं के कल्याण के प्रति लगाने वाले, सदा स्व के भाव में रहने वाले, बापदादा समान श्रेष्ठ संस्कार अर्थात् अनादि और आदि संस्कारों को प्रत्यक्ष रूप में लाने वाले, हर संकल्प और हर समय को सफल बनाने वाले सफलतामूर्त सितारों को बापदादा का याद प्यार, गुडनाइट और नमस्ते।