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28 Jan 1980
“सम्पूर्ण ब्रह्मा और ब्राह्मणों के सम्पूर्ण स्वरूप के अन्तर का कारण और निवारण”
28 January 1980 · हिंदी
आज हरेक बच्चे का डबल स्वरूप देख रहे हैं। कौन-सा डबल रूप? एक वर्तमान पुरूषार्थी स्वरूप, दूसरा वर्तमान जन्म का अन्तिम सम्पूर्ण फरिश्ता स्वरूप। इस समय ‘हम सो, सो हम' के मन्त्र में पहले हम सो फरिश्ता स्वरूप हैं फिर भविष्य में हम सो देवता रूप हैं। आज वतन में सभी बच्चों के नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार, जो अन्तिम फरिश्ता स्वरूप बनना है, उस रूप को इमर्ज किया। जैसा साकार ब्रह्मा और सम्पूर्ण ब्रह्मा, दोनों के अन्तर को देखते और अनुभव करते थे कि पुरूषार्थी और सम्पूर्ण में क्या अन्तर है। ऐसे आज बच्चों के अन्तर को देख रहे थे। दृश्य बहुत अच्छा था। नीचे तपस्वी पुरूषार्थी रूप और ऊपर खड़ा हुआ फरिश्ता रूप। अपना-अपना रूप इमर्ज कर सकते हो? अपना सम्पूर्ण रूप दिखाई देता है? सम्पूर्ण ब्रह्मा और सम्पूर्ण ब्राह्मण। हरेक समझते हैं कि ब्रह्मा और हमारे सम्पूर्ण रूप में कितना अन्तर होगा। नम्बरवार तो हैं ना। वहाँ क्या हुआ! नम्बरवार फरिश्ता स्वरूप बहुत बड़े सर्किल में राज्य दरबार के रूप में इमर्ज थे। लाइट के शेड में अन्तर था। कोई विशेष चमकता हुआ रूप था, कोई मध्यम प्रकाश रूप था, लेकिन विशेष अन्तर मस्तक के बीच चमकती हुई मणी के रूप में आत्मा का था। किसी की चमक और लाइट का विस्तार अर्थात् लाइट फैली हुई ज्यादा भी। किसी की चमकती हुई लाइट थी लेकिन फैली हुई नहीं थी। किसी की लाइट ही कम थी। बापदादा ने सब बच्चों के अन्तर को चेक किया। तो देखा यत्र की स्पीड तेज़ है। पुरुषार्थी और सम्पूर्णता दोनों की समानता का अन्तर भी ज्यादा दिखाई दिया। जैसे विज्ञान के यत्र की स्पीड तेज़ है वैसे समानता के पुरूषार्थ की स्पीड उससे कम थी।
बापदादा की रिज़ल्ट के ऊपर रूह-रूहान चली कि इतना अन्तर क्यों! ब्रह्मा बाप बोले - मेरे सभी बच्चे नालेजफुल हैं। शिव बाप बोले - नालेजफुल के साथ त्रिकालदर्शी भी हैं। समझने और समझाने में बहुत होशियार हैं। बाप को फालो करने में भी होशियार है। इन्वेन्टर भी हो गये हैं, क्रियेटर भी हो गये हैं, बाकी क्या रह गया जो अन्तर बड़ा हो गया है। इसका क्या कारण है? कारण तो छोटा-सा ही है। ब्रह्मा बाप बोले - बच्चों की ग्रहण करने की शक्ति बहुत तेज़ है। इसलिए ज्ञान, गुण और शक्तियों को ग्रहण करने के साथ-साथ दूसरों की कमजोरियों को भी ग्रहण करने की शक्ति तेज़ है। ग्रहण करने की शक्ति के आगे गुणग्राहक शब्द भूल जाता है। इसलिए अच्छाई के साथ कमज़ोरियाँ भी साथ में ग्रहण कर लेते हैं। और फिर क्या करते हैं, फिर एक खेल वहाँ इमर्ज हुआ। जो यहाँ आपकी प्रदर्शनियों में एक चित्र भी है। आपका चित्र दूसरे लक्ष्य से है लेकिन रूपरेखा वही है। वह चित्र है शान्ति का दाता कौन? ऐसी रूप-रेखा से कुछ बच्चे इमर्ज हुए। फिर क्या हुआ? कोई एक कमज़ोरी की बात पहले नम्बर में खड़े हुए बच्चे को सुनाई गई कि यह बात तीव्र पुरूषार्थ के हिसाब से ठीक नहीं है। तो क्या हुआ। उसने इशारा किया दूसरे की तरफ कि यह मेरी बात नहीं है लेकिन इनकी बात है। दूसरे ने कहा कि तीसरे ने भी ऐसे ही किया था तब मैंने किया। चौथे ने कहा कि यह तो महारथी भी करते हैं। पाँचवे ने कहा कि ऐसे सम्पूर्ण कौन बना है! छठे ने कहा अरे यह तो होता ही है। सातवें ने कहा फिर तो सम्पूर्ण हो के सूक्ष्मवतन में चले जायेंगे। आठवें ने कहा बापदादा तो इशारा दे रहे हैं, करना तो चाहिए लेकिन संगठन है, न चाहते भी कुछ कर लेते हैं - ऐसे पुरूषार्थ की बात एक दूसरे के ऊपर देखते और रखते हुए बात ही बदल गई। ऐसे आजकल का प्रैक्टिकल खेल बहुत चलता है। और इसी खेल में लक्ष्य और लक्षण में महान अन्तर पड़ जाता है। तो कारण क्या हुआ? इसी संस्कार के कारण सम्पूर्ण संस्कार अभी तक इमर्ज नहीं हो सकते है।
तो बापदादा बोले इस खेल के कारण पुरूषार्थी और सम्पूर्णता का मेल नहीं हो सकता। मूल कारण ग्रहण करने की शक्ति है, लेकिन गुण ग्राहक बनने की शक्ति कम है। दूसरी बात इस खेल से भी समझ में आ गई होगी कि अपनी गलती को दूसरे पर डालना आता है, लेकिन अपनी गलती को महसूस कर स्वयं पर डालना नहीं आता। इसलिए बापदादा ने कहा कि नालेजफुल हैं, छुड़ाने में होशियार हैं, लेकिन स्वयं को, बदलने में कम। और भी एक कारण निकला। वह क्या होगा? जिस कारण से प्रत्यक्षता होने में कुछ देरी पड़ रही है।
वह कारण है - स्व-चिन्तन। स्व के प्रति स्व-चिन्तक और औरों के प्रति शुभ-चिन्तक। स्व-चिन्तन अर्थात् मनन शक्ति और शुभ चिन्तक अर्थात् सेवा की शक्ति। वाचा की सेवा के पहले शुभचिन्तक भावना से जब तक धरती को तैयार नहीं किया है, तब तक वाचा की सेवा का भी फल नहीं निकलता। इसलिए पहले सेवा का आधार है - शुभचिन्तक। यह भावना आत्माओं की ग्रहण शक्ति बढ़ाती है। जिज्ञासा को बढ़ाती है। इस कारण वाणी की सेवा सहज और सफल हो जाती है। तो स्व के प्रति स्व-चिन्तन वाला सदा माया प्रूफ, किसी की भी कमज़ोरियों को ग्रहण करने से प्रूफ होगा। व्यक्ति व वैभव की आकर्षण से प्रूफ हो जाता है। इसलिए दूसरा कारण निवारण के रूप में सुनाया - शुभ-चिन्तक और स्व-चिन्तक बनो। दूसरे को नहीं देखो, स्वयं करो। आप सब पुरूषार्थियों का स्लोगन है “मुझे देखकर और करेंगे।'' ‘और को देखकर मैं करुँगा' यह नहीं है। तो सुना, क्या रूह-रूहान चली?
आजकल बापदादा कौन-सा काम कर रहे हैं? फाइनल माला बनाने के पहले मणकों के सेलेक्शन का सेक्शन बना रहे हैं तब तो जल्दी-जल्दी पिरोते जायेंगे ना। तो हरेक अपने-आपको देखो मैं किस सेक्शन में हूँ। नम्बरवन हैं 8 रत्न और सेकेण्ड हैं 100, थर्ड हैं 16 हजार। नम्बरवन की निशानी क्या है? नम्बर वन आने का सहज साधन है - जो नम्बरवन ब्रह्मा बाप है, उसी वन को देखो। देखने में तो होशियार हो ना। अनेकों को देखने के बजाए एक को देखो। तो सहज हुआ या मुश्किल हुआ? सहज है ना। तो 8 रत्नों में आ जायेंगे। सेकेण्ड और थर्ड को तो जानते ही हो।
जैसे भाग्य में अपने को आगे करते हो, वैसे त्याग में ‘पहले मैं' जब त्याग में हरेक ब्राह्मण आत्मा ‘पहले मैं' कहेगा तो भाग्य की माला सबके गले में पड़ जायेगी। आपका सम्पूर्ण स्वरूप सफलता की माला लेकर आप पुरूषार्थियों के गले में डालने के लिए नज़दीक आ रहा है। अन्तर को मिटा दो। हम सो फरिश्ता का मन्त्र पक्का कर लो तो साइन्स का यत्र अपना काम शुरू करे और हम सो फरिश्ते से हम सो देवता बन नई दुनिया में अवतरित होंगे। ऐसे साकार बाप को फालो करो। साकार को फालो करना तो सहज है ना। तो सम्पूर्ण फरिश्ता अर्थात् साकार बाप को फालो करना।
आज कर्नाटक का ज़ोन है। कर्नाटक की विशेषता बहुत अच्छी है। कर्नाटक वाले शमा पर परवाने बन जलने में होशियार हैं। वहाँ परवाने बहुत हैं, जलने में नम्बर वन हैं। जलने के बाद है चलना। तो जलने में बहुत होशियार हो। चलने में थोड़ा क्या करते हैं! चलने में चलते-चलते बाईप्लाट बहुत दिखाते हैं। भावना मूर्त नम्बरवन हैं। स्नेही और सहयोगी मूर्त भी हैं। कर्नाटक निवासियों की विशेषता रचयिता बनने में होशियार हैं। विष्णु बनना कम आता है, ब्रह्मा बनना अच्छा आता है। शंकर, विष्णु बनना कम आता है। शंकर रूप अर्थात् विघ्न-विनाशक - उसका भी पुरूषार्थ अभी और ज्यादा चाहिए। फिर भी बापदादा कर्नाटक निवासियों को मुबारक देते हैं। क्यों मुबारक देते हैं? क्योंकि प्रेम स्वरूप लगन में मगन रहने में अच्छे पुरूषार्थी हैं। अभी आगे कर्नाटक को क्या करना है, जो रह गया है। कर्नाटक की धरती फलदायक है। वी.आई.पी. के फल देने योग्य है और सहज ही सम्बन्ध में आने वाले हैं। सिल्वर जुबली में प्रत्यक्ष फल नहीं दिया है। वी.आई.पी. का ग्रुप कहाँ लाया है? जैसे सहज धरनी है वैसे भारत में आवाज़ फैलाने के निमित्त बनने वाली आत्मायें वहाँ से निकल सकती हैं। भारत की हिस्ट्री में नामीग्रामी आत्मायें कर्नाटक में बहुत हैं। जिस एक द्वारा बहुतों का कल्याण सहज हो सकता है। सिल्वर जुबली की सौगात क्या लाई है? कर्नाटक अभी कमाल दिखाये।
ऐसे सदा स्व-चिन्तक और शुभ चिन्तक, सदा फॉलो फादर, स्व-परिवर्तन से विश्व-परिवर्तन करने वाले, ऐसे विश्व-कल्याणकारी, सर्व आत्माओं द्वारा सत्कारी, सदा त्याग में पहले मैं करने वाले, ऐसे श्रेष्ठ भाग्यशाली, मास्टर सर्वशक्तिमान आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।