दीदी मनमोहिनी

दीदी मनमोहिनी

सारांश — Summary

दीदी मनमोहिनी ने अपना सम्पूर्ण जीवन परमात्मा, सेवा और त्याग को समर्पित किया। उन्होंने अनुशासन, स्नेह और आध्यात्मिक मूल्यों से हजारों लोगों के जीवन को प्रेरित किया। उनके नेतृत्व में सेवाओं का विस्तार हुआ जहां अनेक सेवाकेन्द्र भी स्थापित हुए। उनका जीवन निस्वार्थ सेवा, प्रेम और दृढ़ संकल्प का अमूल्य आदर्श है।

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दीदी जी का लौकिक नाम गोपी था | आप एक बहुत ही नामीगिरामी धनाढूय सिन्धी परिवार से थी | यज्ञ की स्थापना के समय, किसी की परवाह किये बिना, अनेक बंधनों को तोड़ते हुए, आप अपनी लौकिक माँ क्वीन मदर और लौकिक बहन शील के साथ, झाटकू रूप से समर्पित हो गई । आपमें अनेकानेक विशेषतायें थी । आपका बाबा से अटूट प्यार था। हर पल, हर बोल में बाबा-बाबा ही निकलता था। आप दिलवाला की सच्ची दिलरूबा थी। दीदी को अव्यक्त नाम मिला, "मनमोहिनी” | दीदी के सान्निध्यमें जो भी आता, दीदी उसका मन ऐसा मोह लेती थी जो वह बाबा का बन जाता था। विभाजन के बाद सन्‌ 1952 से भारतवर्ष में जब ईश्वरीय सेवायें प्रारंभ हुई, तब आप पहले-पहले दिल्‍ली, इलाहाबाद आदि स्थानों पर त्याग-तपस्या के आधार पर कई सेवाकेन्द्र खोलने के निमित्त बनी और मातेश्वरी जगदम्बा माँ के अव्यक्त होने के पश्चात्‌ सन्‌ 1965 से आप फिर से बापदादा के साथ मधुबन में रहकर यज्ञ की इंटरनल कारोबार को, पूरे प्रशासन को संभालने के निमित्त बनी | सन्‌ 1969 में ब्रह्मा बाबा के अव्यक्त होने के पश्चात्‌ दीदी और दादी प्रकाशमणि जी की जोड़ी ने पूरे यज्ञ को संभाला, दोनों ने मिलकर मात-पिता के रूप में देश-विदेश के सर्व ब्राह्मण परिवार की निस्वार्थ पालना की और पूरे विश्व में सेवाओं का खूब विस्तार किया | दीदी-दादी की जोड़ी को सभी कहते थे शरीर दो हैं, आत्मा एक है। ऐसी एकता का प्रमाण देकर, एक दो की राय को सम्मान देते हुए यज्ञ को निर्विघ्न बनाया। आपने 28 जुलाई, 1983 के दिन अपना शरीरी छोड़ अपनी देहिक यात्रा पूरी की |

दादी मनोहर इन्द्रा जी ने, दीदी मनमोहिनी के साथ का अनुभव इस प्रकार सुनाया था -

हैदराबाद-सिन्ध में दीदी जी का लौकिक जन्म एक धनीमानी घर में हुआ। दीदी का लौकिक नाम गोपी था। गोपियाँ कृष्ण की प्यारी होती हैं । तो जैसा नाम था, वैसी ही उसके जीवन में चाहना थी | गोपी के नाम से गोपीपने के संस्कार भी उनमें जागृत हो गये थे | उन्होंने अपने मुख से स्वयं हमें बताया कि मैं श्रीकृष्ण की भक्तिन थी और दिल में चाहना थी कि जैसे गोपियों का जीवन था, वैसे मेरा भी हो परंतु ड्रामा में हरेक बात समय आने पर ही इमर्ज होती है|

अपनी कमाई से दान करने की लगन

दीदी की शादी दस वर्ष की बाल्यावस्था में हो गई थी | दीदी कपड़े सिलाई में बहुत होशियार थी | हाथ में बहुत सफाई थी | बड़े घर की होने के कारण सिलाई करने की उन्हें जरूरत नहीं थी। जिसके साथ शादी की वो भी बहुत पैसे वाला था पर दीदी की भावना यह थी कि मैं जितना अधिक पैसा कमाऊँगी, उतना अधिक गरीबों को दान कर पाऊँगी, अपनी मेहनत से पैसा कमाकर दान करने का अधिक पुण्य मिलता है। जब बाबा ने बड़े बेटे की शादी रचाई थी तब शादियों के दिन होने के कारण कपड़े सिलाई वाले नहीं मिल रहे थे | बाबा को मालूम था कि गोपी बहुत अच्छे कपड़े सिलाई करती है| बाबा ने जब दीदी को कहा तो दीदी ने कहा कि मैं दो दिन में कपड़े सिलाई करके दे दूँगी । जसोदा माता तो बहुत खुश हो गई | इस प्रकार, बाबा के घर दीदी का आना-जाना प्रारंभ हो गया | बाबा के घर में धन बहुत था पर धन के साथ-साथ भक्ति और नम्रता भी बहुत थी।

बाबा से श्री कृष्ण की भासना आई

जब बाबा के घर में सत्संग शुरू हुआ तो पहली बार दीदी अपनी माँ के साथ वहाँ गई । बाबा अपने छोटे-से मकान में बैठा था, आध्यात्मिक पाठ चल रहा था। दीदी को उस सत्संग में आनन्द बहुत आया । जब सत्संग पूरा करके बाबा उठा तो बाबा ने दीदी को अपने पास बुलाया और पूछा, “तुमने सुना, तुम्हें कैसा लगा ?” बाबा को जवाब देने के स्थान पर दीदी ने ही पूछ लिया, “हमारे शास्त्रों में लिखा है कि हिन्दू नारी को गुरु करने की जरूरत नहीं क्योंकि पति ही गुरु और परमेश्वर है।” बाबा ने कहा, “बच्ची, मैंने तो कहा ही नहीं कि तुम मुझे गुरु बनाओ, यहाँ गुरु बनाने की तो बात ही नहीं, यह तो ज्ञान है, इस ज्ञान से जीवन बनता है| बच्ची, अगर तुम रोज आओगी, सात दिन तक सुनोगी तो तुम्हारा जीवन बहुत ऊँचा बन जायेगा।” बाबा ने जब यह कहा तो दीदी को लगा कि यहाँ केवल ज्ञान सुनने आना है, बाकी गुरु आदि बनाने की बात नहीं है।

शांत समाधि में रहना

एक बार दीदी जी ने बाबा से पूछा कि बाबा, पति कहता है कि मेरे साथ सिनेमा में जाओ तो मैं जाऊं क्या ? बाबा ने कहा, “बच्ची, तुम जाना पर शांत समाधि में रहना, निज अवस्था में टिकी रहना ।” बाबा ने कहा, “बच्ची, तुम बड़े घर की हो। ऐसे ना हो कि झगड़ा हो जाए, नहीं तो सारी कन्याओं-माताओं पर बंधन आ जायेगा। तुम बड़ी हो, युक्ति से चलती रहना ।”

दीदी कंट्रोलर थी

ओम मंडली के बाद ओम निवास खुला तो उसमें पढ़ने वाले बच्चे रहने लगे | कुछ समय बाद हम कराची चले गए। वहाँ दीदी बनी कंट्रोलर और मैं बनी वाइस कंट्रोलर | दीदी बड़ी एक्यूरेट और चुस्त थी | स्मृति बड़ी पावरफुल थी | कारोबार संभालने में बड़ी होशियार थी | यज्ञ का सारा कारोबार इनके हाथ में था। कपड़ा देना, फैन्सी सामान देना आदि-आदि सब सेवायें करती थी। आठ-दस बहनें उनकी मददगार थी पर सब उनकी राय से चलती थी। बाबा भी मम्मा को कहता था, बच्ची, कोई भी काम करना हो तो दीदी से राय कर लेना। मम्मा कुमारी थी, यह अनुभवी थी, माता थी इसलिए बाबा कहता था, दीदी से हरेक कार्य में राय लेकर इसे आगे लगा देना | बाबा के कहे अुनसार मम्मा पूछती थी, दीदी, इस बात में आपकी क्या राय है तब दीदी राय मिलाती थी कि हाँ, यह हो सकता है और फिर वह कार्य हो जाता था। इस प्रकार कराची में हम कई वर्ष रहे |

दीदी ने बाबा की राय से माउंट आबू का चुनाव किया

फिर हम माउंट आबू आये | माउंट आबू हमारे आने में भी दीदी का विशेष पार्ट रहा। भारत से कई मित्र-संबंधियों का निमंत्रण आ रहा था कि पाकिस्तान में आपकी सेवायें नहीं चलेंगी इसलिए भारत आओ । दीदी के परिवार वाले दीदी को विशेष निमंत्रण देते थे कि तुम भारत में आ जाओ । दीदी कहती थी, ये हमारा संयुक्त परिवार है तो हम इकडट्ठे आयेंगे। दीदी ने साफ लिखकर भेजा कि यदि आप बुलाना चाहते हैं तो सारा ईश्वरीय विश्व विद्यालय आयेगा । दीदी के चाचा लोकोमल जिनका मुंबई में जसलोक हॉस्पिटल है, ने भी लिखकर भेजा कि जैसे राजा जनक को ज्ञान मिला था, ऐसे मुझको भी दो | इनकी लौकिक भाभी कमला ने भी निमंत्रण लिखकर भेजा तो बाबा ने कहा, दीदी, तुम जाओ। भारत में जाकर मकान पसंद करो, पास करो फिर मैं बच्चों को लेकर आऊंगा |

दीदी आईं तो इसने भारत के बड़े-बड़े स्थानों- पूना, अहमदाबाद आदि में मकान देखे। अहमदाबाद में इनके लौकिक घराने के गुरु गंगेश्वरानंद ने राय दी कि आबू पर्वत बहुत अच्छा है तपस्या के लिए, तो दीदी अपने लौकिक संबंधियों के साथ आबू पर्वत पर आई | यहाँ बहुत बड़े-बड़े बंगले देखे पर इतने बड़े विद्यालय के लिए पसंद नहीं आये। दीदी लौटने लगी तो रास्ते में एक भाई से बातचीत हुई। उसने कहा, हाँ, एक बंगला खाली है। वह दिखाने लेकर गया। बंगला बहुत बड़ा था, राजाओं का था। फिर सारा यज्ञ वहाँ (बृज कोठी में) आकर रहा ।

चौदह वर्षों का ज्ञान-कोर्स

शुरू-शुरू में जब हम ओम मण्डली में आये थे और ज्ञान सीखने लगे थे तो हमारे परिवार वाले हमसे पूछते थे कि तुम इतनी सारी कन्यायें-मातायें वहाँ रह रही हो तो तुम हमें ज्ञान कब सुनाओगी ? तो बाबा कहता था, बच्ची, इनको कहो, हमारा 14 साल का कोर्स है मनुष्य से देवता बनने का, उसे पूरा कर आयेंगे । हमें बाबा की बात पर निश्चय होता था तो हमने भी ऐसा बोल दिया। सचमुच हमारे 14 साल पूरे हुए। माउंट आबू आये, बेगरी पार्ट शुरू हुआ। इतना जो 14 साल हमने बाबा से पालना ली तो मन में था कि इस पालना का रिटर्न कब देंगे। पहले तो हम समझते थे कि यज्ञ में ही जीना है, यज्ञ में ही मरना है, यज्ञ छोड़कर कहीं नहीं जाना है लेकिन बाबा कराची में कहता था, लिखकर लाओ, साधुओं को ज्ञान कैसे सुनायेंगे, राजाओं को ज्ञान कैसे सुनायेंगे, कॉलेज में कैसे सुनायेंगे। तब हमें लगता था कि बाबा हमारी बुद्धि को चलाने के लिए यह प्लान देता है, नहीं तो कहाँ हम संन्यासियों से मिलेंगे । हम सेवा के अच्छे-अच्छे प्लान बनाकर बाबा के पास ले जाते थे। अच्छे- अच्छे प्वाइंट्स निकालते थे ।

दीदी और हम दिल्‍ली गए सेवार्थ

दीदी बाबा से बहुत हलकी होकर बात करती थी जैसे बाबा दीदी का सखा हो| उसे देखकर हमारे भी यही संस्कार पड़ गये । हमारा कनेक्शन दीदी के साथ था, दीदी का बाबा के साथ इसलिए हम बाबा के बहुत नजदीक आ गये।

हमने दीदी को एक दिन कहा कि दीदी, बाबा की इन प्रेरणाओं का राज क्या है| दुनिया हमने देखी नहीं, लोगों को जानते नहीं, जमाना बदल गया, हम कहाँ जायेंगे, कैसे बाबा की आश पूरी करेंगे। रतनमोहिनी दादी भी हमारे साथ थी | तो हमने योजना बनाई कि जिसके भी संबंधी दिल्‍ली में हों तो निमंत्रण पर हम पहले दिल्‍ली जायेंगे और जो-जो हमने कराची में सीखा, वो वहाँ काम में लायेंगे |

सबसे पहले मैंने कहा, दीदी, दिल्‍ली में मेरे संबंधी हैं तो दीदी ने कहा, तुम उनको चिट्ठी डालो | उनका निमंत्रण आये फिर हम बाबा को निमंत्रण दिखायेंगे । फिर हमको दिल्‍ली से निमंत्रण आ गया। हम दिल्‍ली गये, ट्रेन में भी सेवा करते गये । कुछ समय दिल्‍ली में दीदी के साथ रहे फिर दीदी अलग हो गई, इलाहाबाद की तरफ गई और सेवाओं का विस्तार किया।

राजयोगिनी दादी प्रकाशमणि जी, दीदी के प्रति अपना अनुभव इस प्रकार सुनाती हैं -

मुंबई में ऑप्रिशन

एक दिन दीदी अपने कमरे में गिर गई थी, थोड़ी चोट भी लगी थी। थोड़ा बी.पी. हाई था। फिर दीदी का एक्सरे किया गया तो बायीं तरफ ब्रेन में, लीची जितनी गांठ दिखाई पड़ी । फिर कई डॉक्टरों की राय ली गई, सभी का मत था कि दीदी का ऑप्रिशन होना चाहिए। यहाँ यह भी बात सामने आई कि एक तो दीदी उम्र वाली हैं, दूसरा यह भी था कि बी.पी. ऊपर-नीचे है, शुगर भी है| फिर राय-सलाह होती रही | डॉक्टर्स की राय से ऑप्रेशन फाइनल हुआ | मुम्बई में डॉक्टर्स ने कहा, आप शाम को दीदी को थोड़ा घुमाने-फिराने ले जा सकते हो। दीदी आई तो हॉस्पिटल में थी । शाम को नरीमन प्वाइंट पर घुमाने ले जाते थे। दादी जानकी कोलाबा में रहती थी । दीदी हॉस्पिटल में थी | गामदेवी से दीदी को कार लेने जाती थी, इधर से दीदी निकलती थी, उधर से दादी जानकी निकलती थी | नरीमन प्वाइंट पर जाकर सभी दादियाँ मिलते थे और दीदी से थोड़ा समय रूहरिहान करते थे, हँस-बहलके आते थे।

दो सितारों के मिलन की घड़ी

बीच में एक बात यह भी आई कि डॉक्टर्स ने कहा, दीदी को छोटा-सा ट्यूमर है । वह तो बहनों ने सुना और दीदी को नहीं बताया। दीदी को यही कहा, ऑफप्रेशन होना है लेकिन किसका ऑफप्रेशन, वो नाम नहीं बताया । तो एक दिन दीदी डॉ. भगवती को कहती है कि डॉक्टर, तुम मेरे भाई हो ना, सच बताओ, किसका ऑप्रेशन करना है, ये बहनें मेरे से छिपाती हैं, कुछ सुनाती नहीं हैं, समझती हैं, मैं कोई डरूँगी | मेरे भाई हो ना, मुझे सच बताओ, किसका ऑफप्रेशन है ? डॉक्टर ने कहा, सच तो यह है कि इतनी छोटी गांठ है, उसका ऑफप्रिशन है, चुम्बक का है, यह सच बात है| दीदी ने कहा, ठीक है । दादी जानकी, बृजइन्द्रा, सब दीदी के पास आते थे। सुबह १०.३० का रिकॉर्ड बजता तो ये योग करते, पूरी दिनचर्या ठीक चलती थी | नर्स आती थी, देखती थी, ये सब चटाई बिछाके बैठ जाते हैं, उसे मालूम तो था, ये लोग कौन हैं। दीदी कहती थी, यह हॉस्पिटल नहीं है, सत्संग है। दीदी कभी हँसती थी, रूहरिहान करती थी, कभी लेट जाती थी | एक दिन हमने भी पूछा था, दीदी, लूडो लाएँ, खेलेंगे ? जब हम गई, वो तीन मिनट की सीन तो क्या बताऊंँ ! जितने दीदी को प्रेम के मोती बहाने थे, वो उसी घड़ी बहाए। बाबा ने कहा है, दो सितारों का मिलन होता है, वो दो सितारों के मिलन की घड़ी थी | बाबा ने ड्रामा में ऐसी विचित्र जोड़ी बनाई जो सभी कहते, शरीर तो दो हैं पर आत्मा एक है। प्रैक्टिकल ऐसा है भी | नेचुरल मिलने की घड़ी में भी ऐसे रहा। फिर गुलजार बहन, निर्वैर भाई, जगदीश भाई सब पहुँचे, दीदी से मिले | दीदी की गोद में बैठे । दीदी ने कहा, तुम लोग तो बच्चे हो, आओ, बैठो | ऐसे मिलकर हम सभी हलके होकर बैठे थे। दीदी हलकी हो गई, हर्षितचित्त हो गई । शाम को हम घूमने भी गए ।

फिर ऑप्रेशन हुआ। ऑप्रेशन के दिन तो मिलने नहीं दिया। अगले दिन हम गई, हमने कहा, दीदी | तो दीदी ने आँखें खोली, देखा, मुसकराया, बोल नहीं सकी | तीसरे दिन भी मिलकर आई | मैंने कहा, ओमशान्ति | दीदी ने धीरे से कहा, ओमशान्ति। उस समय दीदी पुरी कांशस में थी और तीसरे दिन थोड़ा जूस मुख से लेती रही । ऑप्रेशन बिल्कुल ठीक हुआ।

निर्वैर भाई दीदी के प्रति अपना अनुभव इस प्रकार सुनाते हैं -

अब घर जाना है

कुछ समय से, जब भी कारोबार की कोई बात सामने आती थी, दीदी एक ही बात कहती थी, अब तो घर चलना है! यूँ तो बाबा ने सबके लिए यह संदेश दिया पर उनके मुख पर हर रोज ही यह बात सुनते थे।

भाषा का बैरियर खत्म कर देती थी

याद आता है, विदेश के भाई-बहनें जब उनसे मिलने आते, तो बड़े रमणीक ढंग से वो सबको बोल्व्रती , इंग्लिश में मैं बुद्ध, हिन्दी में यू बुद्ध, नो इंग्लिश - ऐसा कहकर वो भाषा का बैरियर (बाधा) खत्म कर देती और स्नेह से जो दृष्टि देती, साथ उस समय जो दो शब्द हिन्दी में बोलती, उन्हें कोई ट्रांसलसेट कर देता, वे उन सबके लिए प्रेरणादायक, जीवन को पलटाने वाले महावाक्य सिद्ध हो जाते |

तुलसी भाई (मधुबन) दीदी जी के साथ का अनुभव इस प्रकार सुनाते हैं -

मैं अजमेर से हूँ, अजमेर का कनेक्शन दीदी के साथ था | उन दिनों अजमेर में ३५-४० मिनट तक भी ट्रेन रुकती थी | हमें सौभाग्य मिलता था दीदी-दादियों की स्टेशन पर सेवा करने का | दीदी से मेरी पहली मुलाकात स्टेशन पर ही हुई थी |

परख शक्ति और सूझ-बूझ

जयपुर में फरवरी 1979 में एक मेला हुआ था, उसकी सेवा में मधुबन निवासी आये थे। उस मेले में भोली दादी भी आई थी भण्डारे की सेवा में। मैं भी वहाँ सेवारत था। बाद में मधुबन में मुझे दीदी ने बुलाया | मुझे स्टोरकीपर बनाया गया। दीदी मुरली सुनने जाती थी तो किचन की तरफ से चक्कर लगाते हुए जाती थी। उस समय मैं स्टोर ठीक कर रहा होता था। इस कारण उनका विशेष अटेन्शन रहा।

उनकी परख शक्ति, सूझ-बूझ बहुत थी।

समय की पाबंद

दीदी समय की बड़ी पाबंद थी, हर कार्य में बड़ी रेग्यूलर पंक्चुअल थी |

जो भी नया आता था, दीदी उसे सब शिक्षाओं से सजा देती थी । मुझे शिक्षा दी कि तुम्हें संग बहुत संभालकर करना है। ज्ञान-योग से भरपूर संग करना है। एक बार मैंने पूछा, दीदी, आपको कैसे पता पड़ता है कि इस आत्मा को कहाँ सेट करना है ? दीदी ने कहा, नये आने वाले को मैं चार-पाँच दिनों तक खाली छोड़ देती हूँ, फिर देखती हूँ, वो कौन-से डिपार्टमेंट में जाता है, कहाँ का संग करता है, तो वह वहाँ जाकर सेट हो जायेगा ।

लुधियाना सेवाकेन्द्र की निमित्त संचालिका राज बहन दीदी के प्रति अपने अनुभव इस प्रकार व्यक्त करती हैं

विवेक को कभी मत दबाना

जब पहली बार मधुबन आए तो मैं दीदी को नहीं जानती थी | मैं आफिस की तरफ जा रही थी | दीदी सामने से आ रही थी | जैसे ही मेरी दृष्टि उनसे मिली, मैं खड़ी हो गई, वे भी खड़ी हो गई । यह मौन मिलन था जिसमें जन्मों के संबंध के राज़ खुल गये | मेरा संकोच खत्म हो गया और उनसे अपनापन पैदा हो गया | मैं जयपुर में रहती थी | हर 15 दिन बाद दीदी, जयपुर में आते थे, वहाँ म्यूजियम बन रहा था। दीदी बड़ी तर्कवाली बातें करती थी | उन्होंने हमें भी सिखाया कि यज्ञ में रहते अपने विवेक को कभी मत दबाना |

बड़ों की श्रीमत में कल्याण

19 दिसंबर,1968 में मैं सेवा में समर्पित हो गई। बाद में कन्याओं की भट्टी शुरू हुई | दीदी ने मुझे बुलाया । उद्घाटन अव्यक्त जे बाबा को करना था। हरेक कुमारी की दिल थी कि मैं बाबा की गद्दी के नजदीक बैठूँ। मेरी भी दिल थी पर दीदी ने मुझे सब कुमारियों के लास्ट में बिठाया। मैं चुप करके बैठ गई, मेरा कोई जोर नहीं था। फिर बाबा आए, बाबा की पहली दृष्टि मुझ पर ही पड़ी, मुझे ही सबसे पहले बुलाया और बाबा ने विक्ट्री का तिलक सबसे पहले मेरे मस्तक पर लगाया इससे मुझे बहुत प्रेरणा मिली कि बड़े जहाँ भी बिठाएँ, उसी में कल्याण समाया हुआ है। भट्टी के दिनों में ही मेरा लौकिक जन्मदिन आया । मैंने कहा, दीदी, मुझे 24 फल चाहिएँ। दीदी ने कहा,24 टोलियाँ ले लो। दीदी ने कहा, आपका जन्मदिन हम सब मिलकर मनायेंगे। हिस्ट्री हाल की छत पर दीदी ने सबकी पिकनिक कराई | कई बार मुझे कई कार्यक्रमों में जाने में रुचि नहीं होती थी | दीदी कहती थी, अमुक कार्यक्रम में जाओ | मैं कहती थी, मुझे बोलना तो है नहीं, जाकर क्या करूंगी | दीदी ने कहा, कार्यक्रम में जाकर देखने से भी मनुष्य बहुत कुछ सीखता है । दीदी की इस बात को माना तो सचमुच सेवा के क्षेत्र में बहुत कुछ सीखने को मिला |

एक बार एक बाँघेली गोपिका को मैं अमृतसर ले गई | दीदी भी वहाँ आई थी । दीदी ने चन्द्रमणि दादी को कहा, इनको बेड दे देना। उन दिनों बहुत ठंड थी। रात 10.30 बजे दीदी खास देखने आये कि इनको बिस्तरा-रजाई सब मिला है ? इतने व्यस्त होते भी बहुत ध्यान रखती थी।

कुछ मिनट याद कर लेना

मुम्बई जाने का मेरा कार्यक्रम दीदी ने बनाया | मैंने कहा, मैं मुम्बई जाकर क्या करूंगी, वहाँ लड़कियाँ बहुत होशियार हैं, मेरे से तो बोला ही नहीं जायेगा | दीदी ने कहा, हम तुमको जानते हैं, तुम अपने को नहीं जानती, तुम सब कुछ कर सकती हो पर मेरा मन उमंग में नहीं आया । उस समय बाबा के कमरे में बाबा आये हुए थे। बृजमोहन भाई बात कर रहे थे। दीदी ने कहा, इनके बाद आप बाबा से बात कर लेना। बाबा के सामने भी मैंने वही बात रखी । बाबा ने कहा, तुम अपने को नहीं जानती हो, त्रिकालदर्शी बाबा तुम्हारे तीनों कालों को जानता है, तुमको जब बोलना हो तो पहले कुछ मिनट मुझे याद कर लेना । इस तरह बाबा ने बल भरकर मुझे तैयार कर दिया । मैंने इस युक्ति को अपनाया और सफल रही |

दिल्‍ली, रानीबाग सेवाकेन्द्र की सरला बहन दीदी के साथ के अनुभव इस प्रकार सुनाती हैं -

दीदी, राजौरी गार्डन सेवाकेन्द्र पर आये हुए थे मैं छोटी कुमारी थी, घर से आती-जाती थी | किसी ने मुझे कहा कि दीदी से मिलो | मैं दीदी से मिली, दीदी ने पूछा, तुम्हें ट्रेनिंग में बुलाऊंगी , तुम आओगी ना ? मैंने कहा, हाँ दीदी। दीदी ने ऐसा ट्रेनिंग में बुलाया कि हम वापस घर ही नहीं गये | ट्रेनिंग के बाद सीधे सेन्टर पर ही चले गये ।

दीदी के बोल साकार होने लगे

जब भी हम मधुबन आते तो दीदी बहुत प्यार करती | मधुबन में दीदी से मिलने का ही विशेष आकर्षण होता | दीदी के बोले हुए बोल जब साकार जब भी हम मधुबन आते तो दीदी बहुत प्यार करती। मधुबन में दीदी से मिलने का विशेष आकर्षण होता | दीदी के बोले हुए बोल जब साकार होने लगे तो दीदी के प्रति भावना बढ़ने लगी | एक बार मधुबन से वापस जाने का मन नहीं कर रहा था। दीदी ने बहुत प्यार किया, कहा, तुम जल्दी वापस आना पार्टी लेकर । सेवाकेन्द्र पर गई तो सचमुच तुरंत ही शिविर की पार्टी लेकर मधुबन आने का कार्यक्रम बन गया | इस प्रकार दीदी के बोल सिद्ध होने का प्रमाण मिला |

एक बार मैंने दीदी को कहा, दीदी, नया-नया सेवाकेन्द्र खुला है, दिल नहीं लग रहा। दीदी ने कहा, दिल से सेवा करो तो सेन्टर भरपूर हो जायेगा | दीदी के ये वरदानी बोल साकार हुए। तभी से सेन्टर पर मातायें आने लगी और सेन्टर भरपूर हो गया।

अपनेपन की फीलिंग

एक बार मधुबन में मेरे हाथ से कांसे का बर्तन टूट गया। मैंने दीदी को सुना दिया कि मेरे से बर्तन टूट गया है। दीदी ने मुझे प्यार किया और कहा, आप सेवा करोगी तो बहुत बर्तन मिल जायेंगे तब पता नहीं था कि सेवा करने से कैसे बर्तन मिलते हैं । दीदी से बहुत अपनेपन की फीलिंग आती थी |

होलसेल सेवा करो

मधुबन पार्टी लेकर आते थे तो दीदी खुद बुलाती थी, सारा समाचार पूछती थी। हम कहती थी, दीदी, फलाना-फलाना आया था, उसे कोर्स कराया । दीदी कहती, यह रेजगारी सेवा है, होल- सेल सेवा करो, आपके अंदर सच्चाई-सफाई का गुण है, यह आपको आगे बढ़ायेगा।

दिल्‍ली, पांडव भवन की ब्र.कु. पुष्पा बहन दीदी के प्रति अपने अनुभव इस प्रकार बताती हैं -

बड़े निश्चिन्त हैं, यह सबसे बड़ी सेवा है

जब हम मधुबन आते तो दीदी सारा हालचाल पूछती, सेवा कैसे चल रही है आदि-आदि। मैंने दीदी को कहा कि मैं तो इतनी सेवा करती नहीं । उस समय मुझे थोड़ा ही समय हुआ था समर्पित हुए। दीदी ने कहा, तुम बहुत बड़ी सेवा करती हो। मुझे आश्चर्य हुआ कि दीदी ऐसा कैसे कह रही है। फिर दीदी ने समझाते हुए कहा, “तुमसे बड़े निश्चिन्त हैं, यह सबसे बड़ी सेवा है।” मेरे अंदर एकदम ख़ुशी उमड़ आई । दीदी ने आगे समझाया कि सेवा करते हुए बड़ों को निश्चिन्त रखना बहुत जरूरी है। अगर सेवा करें पर बड़े निश्चिन्त न हों तो उस सेवा का कोई फायदा नहीं है।

प्रश्नोत्तर देने में तत्परता

जब हम मधुबन आते तो आलराउण्डर दादी सारा समाचार सिन्धी भाषा में लिख दीदी के नाम चिट्ठी भेजती | एक बार मैं सुबह-सुबह मधुबन पहुँची। आराम से नहा-धोकर, नाश्ता कर, १० बजे दीदी के पास चिट्टी देने पहुँची । दीदी ने कहा, अभी आती हो, तुम्हें पता है हमारी कारोबार सुबह से शुरू हो जाती है, क्लास के बाद पहले पत्र लिखती हूँ, पीछे नाश्ता करती हूँ। यहाँ तो डाक सुबह चली जाती है, तुम्हें आते ही देनी चाहिए थी | मैंने कहा, मैं स्नान करने चली गई। दीदी ने कहा, चिट्ठी देना जरूरी था या पहले स्नान करना | दीदी को ख्याल था कि मैं पत्र पढ़कर, सुबह ही उसका जवाब दे चुकी होती | इससे पत्रोत्तर देने में दीदी की तत्परता का ज्ञान हुआ। तब से नियम बनाया कि मधुबन आते ही पहले जरूरी पत्र देने हैं, फिर बाकी के काम करने हैं।

ओमप्रकाश भाई (मधुबन) , दीदी के बारे में लिखते हैं -

बाबा पर गहरा निश्चय

दीदी के संपर्क में मैं सन्‌1953में आया | दीदी और सभी साथी बहनों का जीवन सादगी भरा था तथा विचार बहुत ऊँचे थे। सादगी के साथ रायल्टी भी थी । एक छटांक दाल की खिचड़ी में ये सभी बहनें तृप्त हो जाती थी। परंतु इनकी चाल-चलन, बोल-चाल इतने रॉयल थे कि बाहर वाला कोई सोच भी नहीं सकता था कि अंदर इतने कम साधन हैं। चेहरे पर बहुत रूहानियत थी | दीदी को बाबा पर गहरा निश्चय था। उस समय हम साकार सो निराकार, निराकार सो साकार मानते थे। बापदादा ही सब कुछ है, इसके अलावा और कुछ है ही नहीं, यही भाव था। निश्चय का अर्थ था, बाबा दिन कहे तो दिन, रात कहे तो रात । दीदी भाषण ज्यादा नहीं करती थी पर ब्राह्मण जीवन की मर्यादाओं धारणाओं में अडिग थी । मर्यादा विरुद्ध यदि कोई चलता तो समझौता नहीं करती थी | गलती करने वाले को सज़ा मिलनी ही चाहिए, यह उनका दृढ़ मत था।

मातृभाव

उन दिनों दोनों समय क्लास होती थी | दीदी सबसे पहले कापी पेन लेकर पहुंचती थी । मुरली बहुत ध्यान से सुनती थी। केवल सुनने तक नहीं थी वरन्‌ आपस में मिलकर मुरली को दोहराती थी और बाबा के महावाक्यों को प्रैक्टिकल करती थी | दीदी में मातृ भाव बहुत था| परिवार में सबके साथ समान व्यवहार करती थी | धीरे-धीरे दिल्‍ली में जगह-जगह सेन्टर खुलते गए और दीदी सब जगह जाकर धारणा की क्लास कराती रही । दीदी सबका स्नेह बाबा से जुड़वा देती थी, यह उनकी बड़ी विशेषता थी ।

मातेश्वरी जगदम्बा माँ के अव्यक्त होने के पश्चात्‌ सन्‌ १९६५ से आप फिर से बापदादा के साथ मधुबन में रहकर यज्ञ की इंटरनल कारोबार को, पूरे प्रशासन को संभालने के निमित्त बनी | सन्‌ १९६९ में ब्रह्मा बाबा के अव्यक्त होने के पश्चात्‌ दीदी और दादी की जोड़ी ने पूरे यज्ञ को संभ- ला, दोनों ने मिलकर मात-पिता के रूप में देश-विदेश के सर्व ब्राह्मण परिवार की निःस्वार्थ पालना की और पूरे विश्व में सेवाओं का खूब विस्तार किया|

दीदी की विशेषतायें

  1. 1किसी भी कार्य को दीदी पहले खुद करती थी, फिर दूसरों से कराती थी । उनकी विशेषता थी, जो कहना है वो करना है। अपने कर्म से सिखाती थी | योग का चार्ट, यज्ञ की सेवा, सब एक्यूरेट रखती थी | सफाई में बहुत अच्छी थी । उनके संग में रहकर ये सब बातें हम बहुत अच्छे से सीखे |
  2. 2दीदी नंबर वन स्टूडेन्ट थी। उसने बाबा को कंप्लीट फॉलो किया। टाइम पर आना, लगन से पढ़ाई पढ़ना, प्वाइंट्स नोट करना और बाबा जो कहे वो करना। अंतिम समय तक भी चश्मा, पेन और डायरी लेकर क्लास में आती रही | मुरली से अच्छे-अच्छे प्रश्न निकालती थी । फिर आपस में ज्ञान-चर्चा करती थी | रात को एक बहन को कमरे में बुलाकर कहती थी, आज जो प्रश्न निकाले, वो मुझे सुनाओ फिर जो पार्टी मिलने आती, प्रश्न पूछकर उनको बहलाती थी | श्रीमत पर चलने की बहुत बड़ी शक्ति थी दीदी के अंदर | सारा जीवन हमने देखा, दीदी कदम-कदम श्रीमत पर चली।
  3. 3निश्चय का फाउंडेशन दीदी का बहुत गहरा था।
  4. 4दीदी को जो भी मिलती थी, उसको कहती थी, तुम तो मेरी सखी हो | छोटी हो या बड़ी हो, सखी कहकर उसका दिल जीत लेती थी
  5. 5हरेक से गुण उठाती थी। समझो किसी ने भाषण अच्छा किया तो झट दीदी का ध्यान जाता था कि देखो, इसने भाषण कितना अच्छा किया, समझो किसी ने अच्छा काम किया तो कहती थी, कितना अच्छा काम किया। फिर उसका उत्साह भी बढ़ाती थी, आफरीन भी देती थी। दीदी को देखकर हम सीखते थे कि छोटी-सी बच्ची का अच्छा काम देखकर दीदी ने कैसे उसे लिफ्ट दे दी | दीदी गुणचोर थी।
  6. 6सौगात देने की भी दीदी में वंडरफुल कला थी | बाबा के घर में बच्चे तो आते ही रहते हैं, उन्हें मीठे वचन बोलकर, प्यार से सौगात देती थी। डायरी-पेन देती थी तो डायरी का पन्‍ना खोलकर पढ़ाती थी कि देखो कितना अच्छा स्लोगन है| फिर पूछती थी कि स्लोगन से क्या प्रेरणा मिली | ज्ञान देकर ज्ञानयुक्त सौगात देती थी ।
  7. 7अगर कभी किसी कारण से छोटी-मोटी भूल हो भी जाये तो छोटे के सामने भी अपनी भूल मानने में हिचकती नहीं थी जैसे दीदी कहती थी, मैंने यह बात इस भाव से कही, अगर आपको फील हुई हो तो भूल जाना।
  8. 8दीदी सच्ची मस्तानी गोपिका थी | बाबा से इतना अटूट स्नेह था जो नज़रों में एक ही बाबा बसता था। दीदी के दिल में एक बाबा के सिवाय कोई भी नहीं समाया | बाबा के प्यार में कभी डांस करती तो सेमी ट्रांस में जाकर लवलीन (मगन) हो जाती |
  9. 9सदा तुम्हीं संग खाऊं, तुम्हीं संग बैदूं, तुम्हीं से रास रचाऊं - ऐसी एकव्रता होकर, सदा एक के ही गुण गाते आज्ञाकारी, वफादार, ऑनेस्ट बनकर रही । कभी किसी वस्तु, व्यक्ति की तरफ आकर्षित नहीं हुई |
  10. 10दीदी ने कभी बड़ी स्टेज पर जाकर प्रवचन नहीं दिये लेकिन एक-एक को जिगरी पालना देकर स्नेह की भासना दी। सभी का प्यार एक बाबा से जुड़ाया। हर एक को इतना निःस्वार्थ प्यार दिया जो और किसी में उसकी बुद्धि न जाये ।
  11. 11दीदी की बुद्धि इतनी स्वच्छ स्पष्ट थी, जो सामने कैसी भी आत्मा आये, उसे फौरन परख लेती और उसकी हर आवश्यकता को पूरा कर उसे बाबा का बना देती | दीदी के बात करने का ढंग ऐसा था जो बड़े-बड़े वी.आई.पी. भी दीदी से मिलने के बाद रेग्यूलर स्टूडेन्ट बन जाते ।
  12. 12दीदी की दृष्टि में रूहानी जादू था। जो भी दृष्टि लेते, उन्हें वैकुण्ठ की दुनिया का साक्षात्कार हो जाता | योग की ऐसी स्थिति थी, आत्मिक स्थिति का ऐसा अभ्यास था जो नजर से निहाल कर हर आत्मा को तृप्त कर देती |
  13. 13दीदी इतनी अंतर्मुखी रहती जो उनके मुख से कभी व्यर्थ बोल नहीं निकले। कभी किसी का परचिंतन, परदर्शन नहीं किया। उनके जीवन में गंभीरता के साथ रमणीकता का बैलेन्स था। वे सभी से अलौकिक चिटचैट करके खूब रिफ्रेश कर देती | उनके साथ बहुत रमणीकता से खेलपाल करती |
  14. 14दीदी कभी सुनी-सुनाई एक तरफ की बातों के आधार पर निर्णय नहीं लेती थी। अगर कोई किसी की कम्प्लेन करता, तो उसी समय उनके सामने उसे भी बुलाकर फैसला करती और जिसे जो शिक्षा देनी होती उसे स्पष्ट शब्दों में दे देती |
  15. 15दीदी कभी किसी बात में भयभीत नहीं होती थी | बाबा की शक्तियों में उनका अटूट विश्वास था| निश्चय अटल था इसलिए सदा निर्भय रही | यज्ञ के सामने कैसी भी परिस्थितियाँ आईं, उनमें सदा निश्चिंत रही, कभी क्यों-क्या का प्रश्न नहीं किया, सदा प्रसन्नचित्त रही । कभी उनके चेहरे पर चिंता के चिन्ह दिखाई नहीं दिये ।
  16. 16दीदी अंदर-बाहर स्वच्छ साफ थी। सच्चाई अति प्रिय थी, अगर कोई अपनी गलतियाँ सच्चे दिल से महसूस कर लेता तो उसे क्षमा कर देती और आगे बढ़ने की प्रेरणा देती । कथनी और करनी सदा समान रहीं । जो दूसरों को कहती, वह पहले खुद करके दिखाती |
  17. 17दीदी यज्ञ की मालिक थी लेकिन उनके जीवन में बालक और मालिकपन का बैलेन्स देखा । जो यथार्थ बात होती वह मालिक बन सबके सामने रखती लेकिन अगर सबकी एकमत नहीं होती तो बालक बन उसे भूल जाती। कभी बहस या डिबेट में समय नहीं गंवाती थी | दीदी बालक बन बाबा की अंगुली पकड़कर यज्ञ की हर डिपार्टमेन्ट का चक्कर लगाती। बाबा उन्हें कहते, अभी आपने बाबा की अंगुली पकड़ी है, भविष्य में श्रीकृष्ण आपकी अंगुली पकड़कर चलेगा । ऐसा नशा है ना!
  18. 18दीदी की रग-रग में यज्ञ के प्रति अटूट प्यार था, यज्ञ को किसी भी प्रकार की आंच न आये, उसके लिए बहुत ध्यान रखती थी और हर एक को यज्ञ की अमानत संभालने की, निःस्वार्थ सेवा करने की प्रेरणा देती थी ।
  19. 19दीदी ने अनेकों का तन-मन-धन सफल कराया । दीदी ने यह परखकर कि यज्ञ को कौन स- 'भाल सकते हैं, उन्हें समर्पित कराया और उनके दिल में यज्ञ के प्रति भावना भरी |
  20. 20दीदी अलौकिक माँ के रूप में सबको रनेह भी देती, हर प्रकार से यज्ञ वत्सों को खाने-पीने, पहनने, रहने की सुविधा देती, उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखती, लेकिन कभी कोई ईश्वरीय नियम एवं मर्यादाओं में अलबेला होता, आलस्य करता या किसी मर्यादा को तोड़ता तो उसे फौरन सज़ा देती या डायरेक्ट बुलाकर इशारा देती |
  21. 21दीदी स्वयं को ईश्वरीय मर्यादाओं का कंगन बांधकर रखती और सभी का उन पर ध्यान खिचवाती | ब्राह्मण सो देवता बनने वाली आत्माओं को विशेष संगदोष, अन्नदोष न लग जाए इसलिए दीदी पहली शिक्षा यही देती कि संग से अपनी संभाल करना । पवित्रता के व्रत को कभी खंडित होने नहीं देना| ब्रह्मचर्य के साथ ब्रह्माचारी बनकर रहना|
  22. 22दीदी का ध्यान यज्ञ की आलराउण्ड सेवा पर रहता, वे मुरली क्लास के पश्चात्‌ स्वयं भण्डारे में चक्कर लगाती और कुछ समय सबके साथ बैठकर सब्जी काटने में मदद करती | एक्यूरेसी उनके जीवन में कुट-कूटकर बाबा ने भरी थी | वे बाबा के अव्यक्त होने के बाद सभी पत्रों का जवाब खुद बैठकर लिखती या लिखवाती | कभी दीदी ने कोई भी सेवा पैन्डिंग नहीं रखी । जो सेवा जब जरूरी है, उसे उसी समय अलर्ट बनकर किया और कराया।
  23. 23स्वयं सर्वशक्तिवान बाबा हमारा साथी है, दीदी सदा इसी स्वमान में रहती और सबको दिल से सम्मान देती । अगर कोई अपनी सेवा समय प्रमाण सच्चाई से करता तो उसे इतना ही सम्मान देती, खातिरी करती, विशेष सौगात देती । दीदी के दिल में यज्ञ के सच्चे सेवाधारियों प्रति अति रिस्पेक्ट था।
  24. 24दीदी स्वयं योग के गहरे अनुभवों में सदा रहती और अमृतवेले विशेष खुद सबको संगठित रूप में योग की ड्रिल कराती, साथ-साथ कर्म करते कैसे योग में रहना है, उस पर भी ध्यान खिंचवाती |
  25. 25दीदी कभी तेरे-मेरे की हदों में नहीं आई, यह जोन अथवा यह एरिया इसकी है या उसकी है, इस प्रकार की भाषा दीदी के मुख से कभी नहीं सुनी | वे सदा बेहद में रही, बेहद की सोच वा समझ से सबकी पालना की।| मैं और मेरेपन की भाषा से मुक्त रही |
  26. 26यज्ञ की अनेक जवाबदारियों को संभालते हुए, “करावनहार बाबा है, वही करता कराता है”, इसी निश्चय से स्वयं को निमित्त बनाये दीदी सदा निर्माण होकर रही । दीदी के बोल में कभी अभिमान का अंश नहीं दिखाई दिया ।
  27. 27दीदी यज्ञ की इकानामी का बहुत ध्यान रखती, दीदी कहती, गरीब-गरीब बच्चे, भोली-भोली मातायें अपनी मेहनत की कमाई यज्ञ में भेजती हैं, इसलिए कोई भी व्यर्थ खर्च नहीं करना है। अपने प्रति कम से कम खर्च हो, इस बात पर ध्यान रखना है। साधन-सुविधायें सब सेवा के लिए हैं, अपने प्रति नहीं।
  28. 28कभी कोई यज्ञ की वा बड़ों की इनसल्ट करता, कोई उल्टा-सुल्टा बोलता तो भी दीदी कहती, बाबा ने सब पर उपकार किया है, इसका दोष नहीं है। इसलिए कभी भी बदला लेने का ख्याल नहीं रखना। दूसरे को बदलने के बजाय खुद को बदल लो, इसमें ही भलाई है।
  29. 29दीदी अव्यक्त होने के कुछ महीने पहले से ही हर कारोबार से उपराम होती गई। कभी कोई बात दीदी को सुनाते तो दीदी कहती, छोड़ो इन बातों को, अब तो घर चलना है। दीदी के इस वाक्य के आधार पर ही एक गीत बना, “अब घर चलना है।” इसी एक स्मृति से दीदी साक्षीद्रष्टा बनती गई, कार्य व्यवहार से भी उपराम होते, 28 जुलाई1983 में इस भौतिक देह से अलग हो अव्यक्तवतन- वासी बन बेहद सेवा में चली गई ।

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