श्रीकृष्ण जन्माष्टमी आते ही हमारे जीवन में एक विशेष हर्षोल्लास छा जाता है। घरों में खुशी, उमंग, उत्साह और भक्ति का वातावरण बन जाता है। माताएँ और बहनें लड्डू गोपाल को सुंदर झूले में झुलाती हैं। युवा मिलकर दही-हांडी का उत्सव मनाते हैं। लेकिन शायद जन्माष्टमी हमें केवल उत्सव मनाने के साथ-साथ एक गहरा प्रश्न पूछने का अवसर भी देती है—
आखिर श्रीकृष्ण में ऐसी क्या विशेषता है कि उनकी जन्म-जयंती आज भी लोगों के हृदय में इतना हर्ष और खुशी भर देती है?
हर कोई श्रीकृष्ण के इतना समीप क्यों महसूस करता है?
श्रीकृष्ण के साथ लोगों का संबंध बहुत ही व्यक्तिगत और आत्मीय दिखाई देता है। एक माता की इच्छा होती है कि उसे श्रीकृष्ण जैसा बच्चा मिले। एक बहन सोचती है कि उसे श्रीकृष्ण जैसा भाई मिले। शायद इसीलिए हमारे मन में भी कभी न कभी यह विचार आता है—जब श्रीकृष्ण इस भारतभूमि पर थे, तब वह दुनिया कैसी रही होगी? उस समय का समाज कितना सुंदर और श्रेष्ठ रहा होगा? श्रीकृष्ण को सामने देखना, उनके समय में रहना और उस दुनिया का अनुभव करना कैसा रहा होगा? हममें से बहुतों के मन में यह भाव भी आया होगा—काश, हम भी उस समय होते। और यही विचार हमें श्रीकृष्ण के जीवन के एक और गहरे अर्थ की ओर ले जाता है।
क्या श्रीकृष्ण का जन्म वास्तव में अंधकार में हुआ था?
श्रीकृष्ण के जन्म की पारंपरिक कथा हमारे सामने एक बहुत प्रभावशाली दृश्य रखती है। श्रीकृष्ण को देवकी और वासुदेव के पुत्र के रूप में याद किया जाता है। उनका जन्म कारावास में, एक अंधेरी और तूफानी रात में दिखाया गया है। माता-पिता बंधन में हैं, चारों ओर अशांति है, और उसी अंधकार के बीच एक दिव्य बालक का जन्म होता है।
लेकिन बालक श्रीकृष्ण का एक और प्रसिद्ध चित्र भी हमारे सामने आता है। उसमें चारों ओर पानी ही पानी है और बालक श्रीकृष्ण एक पीपल के पत्ते पर शांत भाव से लेटे हुए अंगूठा चूस रहे हैं। ये दोनों दृश्य एक-दूसरे से बहुत अलग हैं। एक ओर कारावास और तूफानी अंधेरी रात है। दूसरी ओर चारों तरफ पानी है और पीपल के पत्ते पर शांत बालक श्रीकृष्ण हैं। तो फिर ये दोनों चित्र हमें क्या समझाना चाहते हैं? हो सकता है कि ये केवल बाहरी घटनाओं का वर्णन न हों, बल्कि किसी गहरे आध्यात्मिक सत्य की ओर भी संकेत करते हों। आखिर श्रीकृष्ण की महिमा सर्वगुण संपन्न, सोलह कला संपूर्ण और संपूर्ण निर्विकारी के रूप में की जाती है। यदि ऐसी पावन और श्रेष्ठ आत्मा जन्म लेती है, तो स्वाभाविक है कि उसकी दुनिया भी पावन और श्रेष्ठ होगी।
यदि श्रीकृष्ण ऐसी सुंदर दुनिया से संबंधित हैं, तो फिर यह कारावास किस बात का प्रतीक है?
कारावास: मनुष्य के बंधनों का प्रतीक है। आध्यात्मिक दृष्टि से कारावास को देह-अभिमान और अनेक प्रकार के बंधनों का प्रतीक समझा जा सकता है। आज के मनुष्य के जीवन को देखें। व्यक्ति बाहर से स्वतंत्र होते हुए भी भीतर अनेक अदृश्य बेड़ियों में जकड़ा हुआ हो सकता है—क्रोध, अहंकार, मोह, भय, लोभ, तनाव, संघर्ष, चिंता, दुःख और अनेक प्रकार की कमजोरियाँ। यही कलियुग की गहरी अंधेरी रात है। यह केवल बाहर की रात का अंधकार नहीं, बल्कि भीतर की आध्यात्मिक अज्ञानता का अंधकार है।
आज मनुष्य भौतिक रूप से बहुत विकास कर सकता है, लेकिन फिर भी रिश्तों, भावनाओं, इच्छाओं, असुरक्षाओं और मन की अशांति से जूझता रहता है। इस प्रकार आत्मा अपनी ही कमजोरियों और संस्कारों के कारण अनेक बंधनों की बेड़ियों में जकड़ी हुई अनुभव करती है। इसलिए श्रीकृष्ण के जन्म की तूफानी अंधेरी रात को ऐसे संसार का प्रतीक भी माना जा सकता है, जो आध्यात्मिक अज्ञानता की चरम अवस्था तक पहुँच चुका है। और ऐसे ही समय पर परिवर्तन की आवश्यकता होती है।
कलियुग के अंधकार से श्रीकृष्ण की दुनिया तक
जब आत्माएँ दुःख, कमजोरियों और अनेक प्रकार के बंधनों में जकड़ी होती हैं, तब परमात्मा उन्हें मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं। परमात्मा आत्माओं को वह आध्यात्मिक समझ और आंतरिक शक्ति देते हैं, जिससे वे परिस्थितियों को सही रूप में समझ सकें, उनका सामना कर सकें, अपनी कमजोरियों और विकारों पर विजय प्राप्त कर सकें और धीरे-धीरे आंतरिक बंधनों से मुक्त हो सकें। जब हमारी जागृति, सोच, संस्कार और जीवन जीने के तरीके में परिवर्तन आता है, तब उसका प्रभाव संसार पर भी पड़ता है—
स्व-परिवर्तन से विश्व-परिवर्तन।
और इसी प्रकार कलियुग की पुरानी अवस्था धीरे-धीरे परिवर्तित होकर एक पावन और श्रेष्ठ अवस्था में आती है, जिसे हम सतयुग—स्वर्णिम युग के रूप में याद करते हैं। यही श्रीकृष्ण की दुनिया है। एक ऐसी दुनिया जहाँ आत्माएँ स्वाभाविक रूप से पावन, शांत, सुखी और दिव्य गुणों से संपन्न होती हैं। श्रीकृष्ण जैसी आत्मा अकेली नहीं होती; उनकी उपस्थिति स्वयं उस दुनिया और उस समय के समाज की श्रेष्ठता का परिचय देती है।
श्रीकृष्ण की दुनिया, जिसे हम स्वर्ग कहते हैं
यह दुनिया कैसी है? अलग-अलग परंपराओं ने इसे अलग-अलग नामों से याद किया है—सतयुग, स्वर्ग, Heaven, Paradise या जन्नत। नाम अलग हो सकते हैं, लेकिन उनके पीछे मनुष्य की इच्छा एक ही है—ऐसी दुनिया की इच्छा जहाँ दुःख, संघर्ष और अपवित्रता न हो। एक ऐसी दुनिया जहाँ मनुष्य श्रेष्ठ मूल्यों के साथ जीवन जीते हों और आत्माएँ अपने श्रेष्ठ गुणों को स्वाभाविक रूप से व्यक्त करती हों। इसीलिए श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव केवल अतीत के एक सुंदर व्यक्तित्व को याद करने तक सीमित नहीं है। उनका जीवन हमें प्रेरणा देता है कि हम स्वयं कैसे मनुष्य बन सकते हैं और संसार को किस प्रकार का बना सकते हैं।
क्या हम केवल श्रीकृष्ण से मिलना चाहते हैं? शायद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न अंत में आता है। हम अक्सर कहते हैं कि काश हमें श्रीकृष्ण से मिलने का अवसर मिलता। हम कल्पना करते हैं कि उनके समय में रहना कितना सुंदर रहा होगा। हम उनकी सुंदरता, पवित्रता, खुशी और दिव्य गुणों की महिमा करते हैं। लेकिन एक प्रश्न ऐसा भी है जो हम शायद ही कभी स्वयं से पूछते हैं—यदि श्रीकृष्ण की दुनिया फिर सामने हो, तो क्या हम उस दुनिया के योग्य होंगे? केवल श्रीकृष्ण से मिलने की इच्छा रखना पर्याप्त नहीं है।
यदि हम पवित्रता, शांति, खुशी और आपसी सद्भाव से भरी दुनिया में रहना चाहते हैं, तो उन गुणों को हमें अपने भीतर भी धारण करना होगा। श्रीकृष्ण की जिन विशेषताओं और गुणों की हम महिमा करते हैं, वही गुण धीरे-धीरे हमारे जीवन का भी हिस्सा बनने चाहिए। यदि हमें उनकी पवित्रता अच्छी लगती है, तो हम अपने विचारों में अधिक पवित्रता लाएँ। यदि हमें उनकी खुशी आकर्षित करती है, तो हम अपने भीतर से खुशी उत्पन्न करना सीखें। यदि हम उनके दिव्य गुणों की महिमा करते हैं, तो हम अपने चरित्र और संस्कारों को भी श्रेष्ठ बनाने का पुरुषार्थ करें। इस प्रकार जन्माष्टमी केवल हर वर्ष आने वाला एक उत्सव नहीं रहती। यह हमें श्रीकृष्ण की दुनिया के योग्य बनने का निमंत्रण देती है।
श्रीकृष्ण का उत्सव—सतयुग के योग्य बनने की प्रेरणा
इसलिए जन्माष्टमी की वास्तविक सुंदरता केवल झूला सजाने, दही-हांडी फोड़ने या सुंदर झाँकियाँ देखने तक सीमित नहीं है। इन सभी उत्सवों का अपना आनंद और हर्ष है। लेकिन इनके पीछे एक गहरा संदेश भी छिपा हुआ है। श्रीकृष्ण हमें याद दिलाते हैं कि एक संपूर्ण पावन मनुष्य कैसा हो सकता है। वे हमें यह भी याद दिलाते हैं कि एक श्रेष्ठ समाज कैसा हो सकता है। और वे हमें इस बात की प्रेरणा देते हैं कि ऐसी दुनिया के गुण बाहर दिखाई देने से पहले हमारे अपने जीवन में दिखाई देने शुरू हों।
तो इस जन्माष्टमी, श्रीकृष्ण की जन्म-जयंती मनाने के साथ-साथ हम एक सरल प्रेरणा भी अपने जीवन में धारण करें—श्रीकृष्ण के जिन गुणों की हम महिमा करते हैं, उन्हीं गुणों को अपने जीवन में धारण करने का पुरुषार्थ करें। और केवल यह सोचने के बजाय कि काश हम श्रीकृष्ण के समय में होते, स्वयं से यह प्रश्न पूछें—आज मैं अपने भीतर ऐसा क्या परिवर्तन कर सकता हूँ, जिससे मैं उस पावन और श्रेष्ठ दुनिया के योग्य बन सकूँ?
शायद यही श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाने का एक बहुत सुंदर और सार्थक तरीका है।

श्रीकृष्ण की याद और स्वर्णिम युग के गीतों की श्रृंखला
श्रीकृष्ण के जन्म और नवस्वर्णिम युग की याद दिलाने वाली मधुर गीतों की यह श्रृंखला है। ये गीत हमें प्रेम, पवित्रता और खुशी जैसे अच्छे गुण अपनाने की प्रेरणा देते हैं।
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