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24 May 1971
“पोज़ीशन में ठहरने से अपोज़ीशन समाप्त”
24 May 1971 · हिंदी
सर्व आत्माओं के सुख और शान्ति कर्ता बने हो? क्योंकि दु:खहत्र्ता सुखकर्ता के सिकीलधे बच्चे हो तो जो बाप का कर्तव्य वही बच्चों का कर्तव्य। जो विश्व के कल्याण-कर्ता वा सुख-कर्ता हैं उनके पास कभी भी दु:ख की लहर स्वप्न में भी अथवा संकल्प में भी आ नहीं सकती। तो ऐसी स्थिति बना रहे हो वा इस स्थिति में स्थित रहते हो? जब से नया जन्म लिया, बापदादा के सिकीलधे बच्चे बने, तो सर्वशक्तिमान की सन्तान के पास कोई भी प्रकार का सन्ताप आ नहीं सकता। सन्ताप अर्थात् दु:ख की लहर तब तक है जब तक सर्वशक्तिमान बाप की स्मृति नहीं रहती अथवा उनकी सन्तान प्रैक्टिकल में नहीं बनते हैं। सुख के सागर बाप की सन्तान तो दु:ख की लहर क्या वस्तु होती है, इससे भी अन्जान रहते हैं। सुख की लहर में ही लहराते रहते हैं। माया की अपोज़ीशन क्यों होती है? अपोजीशन का निवारण बहुत सहज है। अपोज़ीशन से सिर्फ ‘अ' शब्द निकाल दो। तो क्या हो जायेगा? पोजीशन में ठहरने से अपोज़ीशन होगा? अगर अपने पोज़ीशन पर स्थित हैं तो माया की अपोज़ीशन नहीं होगी। सिर्फ एक शब्द कट कर देना है। अपने पोज़ीशन में ठहरना, यही याद की यात्रा है। जो हूँ, जिसका हूँ उसमें स्थित होना - यही याद की यात्रा है। मुश्किल है क्या? जो जैसा है ऐसा अपने को मानने में मुश्किल होता है क्या? आप लोगों ने असलियत को भुला दिया है, उसमें स्थित कराने की ही शिक्षा मिली है। तो असली रूप में ठहरना मुश्किल होता है वा नकली रूप में ठहरना मुश्किल होता है? होली के अथवा दशहरे के दिनों में छोटे बच्चे आर्टीफिशियल नकाब पहनते हैं, उन्हों को कहो कि यह नकली नकाब उतार असली रूप में हो जाओ तो क्या मुश्किल होगा? कितना समय लगेगा? आप लोगों ने भी यह खेल किया है ना। क्या-क्या नकाब धारण किये? कब बन्दर का, कब असुर का, कब रावण का। कितने नकली नकाब धारण किये हैं? अब बाप क्या कहते हैं? वह नकली नकाब उतार दो। इसमें क्या मुश्किल है? तो सदैव यह नशा रखो कि असली स्वरूप, असली धर्म, असली कर्म हमारा कौन सा है? असली नालेज के हम मास्टर नालेजफुल हैं यह नशा कम है? यह नशा सदैव रहे तो क्या बन जायेंगे? जो बन जायेंगे उसका यादगार देखा है? दिलवाला मन्दिर है तपस्वी कुमार और तपस्वी कुमारियों का यादगार। और सदैव नशे में स्थित रहने का यादगार कौन सा है? अचलघर। सदैव उस नशे में रहने से अचल, अड़ोल बन जायेंगे। फिर माया संकल्प रूप में भी हिला नहीं सकती। ऐसे अचल बन जायेंगे। यादगार है ना कि रावण सप्रदाय ने पांव हिलाने की कोशिश की लेकिन जरा भी हिला न सके। ऐसा नशा रहता है कि यह हमारा यादगार है या समझते हो कि यह बड़े-बड़े महारथियों का यादगार है? यह मेरा यादगार है, ऐसा निश्चय बुद्धि बनने से विजय अवश्य प्राप्त हो जाती है। यह कभी भी नहीं सोचो कि यह कोई और महारथियों का है, हम तो पुरुषार्थी हैं। अगर निश्चय में, स्वरूप की स्मृति में ही कमज़ोरी होगी तो कर्म में भी कमजोरी आ जायेगी। तो सदैव हर संकल्प निश्चयबुद्धि का होना चाहिए। कर्म करने के पहले यह निश्चय करो कि विजय तो हमारी हुई पड़ी है। अनेक कल्प विजयी बने हो। जब अनेक कल्प, अनेक बार विजयी बन विजय माला में पिरोने वाले, पूजन होने वाले बने हो तो अब वह रिपीट नहीं करेंगे? वही बना हुआ कर्म दुबारा रिपीट करना है। इसलिए कहा जाता है कि बना बनाया...। बना हुआ है लेकिन अब फिर से रिपीट कर ‘बना बनाया' जो कहावत है उसको पूरा करना है। जब निश्चय हो जाता है कि मैं यह हूँ वा यह मुझे करना ही है, मैं कर सकता हूँ तब वह नशा चढ़ता है। निश्चय नहीं तो नशा भी नहीं चढ़ता और निश्चय है तो नशे की स्थिति के सागर में लहराते रहेंगे। ऐसी स्थिति का अनुभवी मूर्त जब बन जायेंगे तो आपकी मूर्त से सिखलाने वाले की सूरत दिखाई देगी। तो ऐसे अनुभवी मूर्त हो जो बाप और शिक्षक की सूरत आपकी मूर्त से प्रत्यक्ष हो, ऐसे बने हो वा बन रहे हो? सफलता के सितारे हो वा उम्मीदवार सितारे हो? सफलता तो जन्मसिद्ध अधिकार है। क्योंकि जब सर्वशक्तिमान कहते हो तो असफलता का कारण है शक्तिहीनता। शक्ति की कमी के कारण माया से हार खाते हैं। जब सर्वशक्तिमान बाप की स्मृति में रहते हैं तो सर्वशक्तिमान के बच्चे होने के कारण सफलता तो जन्मसिद्ध अधिकार हो गया। हर सेकेण्ड में सफलता समाई हुई होनी चाहिए। असफलता के दिन समाप्त। अब सफलता हमारा नारा है - यह स्मृति में रखो।
बहुत सहज सरल रास्ता है, जो सेकेण्ड में अपने को नकली से असली बना सकते हो? इतना सरल मार्ग कब मिलेगा? कभी भी नहीं। माया के अधीन क्यों बनते हो? क्योंकि ऑलमाइटी अथारिटी के बच्चे हैं, यह भूल जाते हो। आजकल छोटी-मोटी अथॉर्टी रखने वाले कितनी खुमारी में रहते हैं। तो ऑलमाइटी अथारिटी वाले कितनी खुमारी में रहने चाहिए? शास्त्रवादी जो अपने को शास्त्रों की अथारिटी मानते हैं वह भी कितनी खुमारी में, कितना उल्टी नालेज के निश्चय में रहते हैं। किसने सुनाया, किसने देखा, कुछ भी पता नहीं। फिर भी शास्त्रों की अथॉरिटी मानने के कारण अपनी हार कभी नहीं मानेंगे। तो आप लोगों की सर्व से श्रेष्ठ अथॉरिटी है। ऐसे अथॉरिटी से किसके भी सामने जाओ तो सभी सिर झुकायेंगे। आप लोग नहीं झुक सकते। तो अपनी अथॉरिटी को कायम रखो। आप विश्व को झुकाने वाले हो। जो विश्व को झुकाने वाले हैं वह किसके आगे झुक नहीं सकते। उस अथॉरिटी की खुमारी से किसी भी आत्मा का कल्याण कर सकते हो। ऐसी खुमारी को कभी भी भूलना नहीं। बहुत समय से अभुल बनने से भविष्य में बहुत समय के लिए राज्य भाग्य प्राप्त करेंगे। अगर अल्पकाल इस खुमारी में रहते हैं तो राज्य भाग्य भी अल्पकाल के लिए प्राप्त होता है। यहाँ तो अभी आये हो सदा काल का वर्सा लेने, न कि अल्पकाल का। सिर्फ दो बातें साथ-साथ याद रखो। बात एक ही है, शब्द भिन्न-भिन्न हैं। बिल्कुल सहज से सहज दो बातें सरल शब्दों में कौन सी सिखाई जाती हैं? ऐसे दो-दो शब्द साथ याद रहें तो स्थिति कभी नीचे ऊपर नहीं हो सकती। अल्फ और बादशाही याद रहे तो कभी स्थिति नीचे ऊपर नहीं होगी। दो शब्दों की ही बात है। कोई अन्जान बच्चे को भी अल्फ और बे याद करने के लिए कहो तो भूलेगा? आप मास्टर सर्वशक्तिमान भूल सकते हो? जिस समय विस्मृति की स्थिति होती है तो अपने से यह बातें करो - मैं मास्टर सर्वशक्तिमान अल्फ और बे को भूल गया! ऐसी-ऐसी बातें करने से शक्ति जो खो देते हो उसकी फिर से स्मृति आ जायेगी। है सिर्फ मनन और वर्णन करना। पहले मनन करो और बाद में फिर वर्णन करो। जो बातें मनन की जाती हैं उनको वर्णन करना सहज हो जाता है। तो मनन करते और वर्णन करते चलो। यह भी दो बातें हुई। मनन करते-करते मगन अवस्था ऑटोमेटीकली हो जायेगी। जो मनन करना नहीं जानते वह मगन अवस्था का भी अनुभव नहीं कर सकते। ताज और तख्तनशीन अभी बने हो वा भविष्य में बनेंगे? अभी तो ताज और तख्त नहीं है ना? बेगर हो? संगमयुग का तख्त नहीं जानते हो? सारे कल्प के अन्दर सभी से श्रेष्ठ तख्त का मालूम नहीं है? बापदादा के दिल रूपी तख्त नशीन नहीं बने हो? जब याद रहेगा तब तो बैठेंगे। तख्त है तो ताज भी होगा। ताज बिना तख्त तो होगा ही नहीं। कौन सा ताज धारण करने से तख्त नशीन बनेंगे? बापदादा संगम पर ही ताज व तख्तनशीन बना देते हैं। इस ताज और तख्त के आधार से भविष्य ताज तख्त मिलता है। अभी धारण नहीं करेंगे तो भविष्य में कैसे धारण करेंगे। आधार तो संगमयुग है ना। ताज भी धारण करना पड़े, तिलक भी धारण करना पड़े और तख्तनशीन भी बनना पड़े। तिलक सदैव कायम रहता है वा कभी-कभी मिट जाता है? ताज, तिलक और तख्त - यह तीनों ही संगमयुग की बड़ी से बड़ी प्राप्ति है। इस प्राप्ति के आगे भविष्य राज्य कुछ भी नहीं। जिसने संगमयुग का ताज, तख्त नहीं लिया उसने कुछ भी नहीं लिया। विश्व के कल्याण के ज़िम्मेवारी का ताज है। जब तक यह ताज धारण नहीं करते तब तक बाप के दिल रूपी तख्त पर विराजमान नहीं हो सकते। अपना हक जमा करके जाना, नहीं तो बड़ा मुश्किल होगा। मधुबन में ताज व तख्तनशीन बनकर जाना। जब हिम्मतवान, निश्चय बुद्धि बनते हो तब ही तो मधुबन में आते हो अपनी ताजपोशी करने। बिगर ताज के नहीं जाना। बापदादा का तख्त इतना बड़ा है जो जितना भी चाहें उतना विराजमान हो सकते हैं। उस स्थूल तख्त पर तो सभी नहीं बैठ सकते। लेकिन यह तख्त इतना बड़ा है। बड़े से बड़े बाप के बच्चे, बड़े से बड़े तख्तनशीन होते हैं। अच्छा।