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15 Sept 1974
“पुरुषार्थ का अन्तिम लक्ष्य है अव्यक्त फरिश्ता-पन”
15 September 1974 · हिंदी
अभी तुम बच्चों का अन्तिम स्थिति बनाने का अन्तिम पुरुषार्थ चल रहा है। जो महारथी बच्चे निमित्त बने हुए हैं, उनको अपने पुरुषार्थ की रफ्तार में भी सबके आगे निमित्त बनना है। श्रेष्ठ पुरुषार्थ कौन सा होता है? वह किसको देख फॉलो करेंगे? जैसे कि साकार में पुरुषार्थ कैसे करना है और पुरुषार्थ किसको कहा जाता है? पहले तो पुरुषार्थ के सिम्बल (प्रतीक) अर्थात् साकार ब्रह्मा बाबा को देखते हुए सब आगे बढ़ते थे लेकिन इस समय साकार में, सिम्बल कौन हैं? महारथी। क्या महारथियों का ऐसा पुरुषार्थ चल रहा है कि जिसको देखकर अन्य आत्माओं का भी पुरुषार्थ सिम्पल हो जाए! अन्तिम पुरुषार्थ कौन सा है, क्या उसको जानते हो? जैसे शुरू-शुरू में देह-अभिमान को मिटाने का पुरुषार्थ रखा कि “मैं चतुर्भूज हूँ।” इससे स्त्री-भान, कमजोरी, कायरता आदि सब निकल गई और आप निर्भय और शक्तिशाली बन गये। तो जैसे आदि में देह-अभिमान मिटाने के लिये, कि मैं चतुर्भुज हूँ, यह प्रैक्टिकल पुरुषार्थ चला ना? चलते-फिरते व बात करते यह नशा रहता था कि मैं नारी नहीं हूँ, मैं चतुर्भुज हूँ तो ये दोनों संस्कार और वह दोनों शक्तियाँ मिल गई जैसेकि ये दोनों कार्य हम कर सकते हैं, तो वैसे ही अन्तिम लक्ष्य कौन सा स्मृति में रहे, जिससे कि ऑटोमेटिकली वह लक्षण आ जाऍ?
वह अन्तिम लक्ष्य पुरुषार्थ के लिये कौन सा है? वह है अव्यक्त फरिश्ता हो रहना। अव्यक्त-रूप क्या है? फरिश्ता-पन। उसमें भी लाइट-रूप सामने है - अपना लक्ष्य। वह सामने रखने से जैसे लाइट के कार्ब (घेरे) में यह मेरा आकार है। जैसे वतन में भी अव्यक्त-रूप देखते हो, तो अव्यक्त और व्यक्त में क्या अन्तर देखते हो? व्यक्त, पाँच तत्वों के कार्ब में है और अव्यक्त, लाइट के कार्ब में है। लाइट का रूप तो है, लेकिन आस-पास चारों ओर लाइट ही लाइट है, जैसे कि लाइट के कार्ब में यह आकार दिखाई देता है। जैसे सूर्य देखते हो तो चारों ओर फैली सूर्य की किरणों की लाइट के बीच में, सूर्य का रूप दिखाई देता है। सूर्य की लाइट तो है, लेकिन उसके चारों ओर भी सूर्य की लाइट परछाई के रूप में, फैली हुई दिखाई देती है। और लाइट में विशेष लाइट दिखाई देती है। इसी प्रकार से, मैं आत्मा ज्योति रूप हूँ - यह तो लक्ष्य है ही। लेकिन मैं आकार में भी कार्ब में हूँ। चारों ओर अपना स्वरूप लाइट ही लाइट के बीच में स्मृति में रहे और दिखाई भी दे तो ऐसा अनुभव हो। जैसे कि आइने में देखते हो तो स्पष्ट रूप दिखाई देता है, वैसे ही नॉलेज रूपी दर्पण में, अपना यह रूप स्पष्ट दिखाई दे और अनुभव हो। चलते-फिरते और बात करते, ऐसे महसूस हो कि मैं लाइट-रूप हूँ, मैं फरिश्ता चल रहा हूँ और मैं फरिश्ता बात कर रहा हूँ। तो ही आप लोगों की स्मृति और स्थिति का प्रभाव औरों पर पड़ेगा।
कर्तव्य करते हुए भी कि मैं फरिश्ता निमित्त इस कार्य अर्थ पृथ्वी पर पाँव रख रहा हूँ, लेकिन मैं हूँ अव्यक्त देश का वासी, अब इस स्मृति को ज्यादा बढ़ाओ। मैं इस कार्य-अर्थ अवतरित हुई हूँ अर्थात् जैसे कि मैं इस कार्य-अर्थ पृथ्वी पर वतन से आई हूँ, कारोबार पूरी हुई, फिर वापस अपने वतन में। जैसे कि बाप आते हैं, तो बाप को स्मृति है ना कि हम वतन से आये हैं, कर्तव्य के निमित्त और फिर हमको वापिस जाना है। ऐसे ही आप सबकी भी यह स्मृति बढ़नी चाहिए कि मैं अवतार हूँ अर्थात् मैं अवतरित हुई हूँ, अभी मैं ब्राह्मण हूँ और फिर मैं देवता बनूँगी - यह भी वास्तव में मोटा रूप है। यह स्टेज भी साकारी है। अभी आप लोगों की स्टेज आकारी चाहिए, क्योंकि आकारी से फिर निराकारी सहज बनेंगे। जैसे बाप भी साकार से आकारी बना, आकारी से फिर निराकारी और फिर साकारी बनेंगे।
अब आप लोगों को भी अव्यक्त वतनवासी स्टेज तक पहुँचना है, तभी तो आप साथ चल सकेंगे। अभी यह साकार से अव्यक्त रूप का पार्ट क्यों हुआ - सबको अव्यक्त स्थिति में स्थित कराने क्योंकि अब तक उस स्टेज तक नहीं पहुँचे हैं। अभी अन्तिम पुरुषार्थ यह रह गया है। इसी से ही साक्षात्कार होंगे। साकार स्वरूप के नशे की प्वॉइन्ट्स तो बहुत हैं कि मैं श्रेष्ठ आत्मा हूँ, मैं ब्राह्मण हूँ और मैं शक्ति हूँ। इस स्मृति से तो आपको नशे और खुशी का अनुभव होगा। लेकिन जब तक इस अव्यक्त स्वरूप में, लाइट के कार्ब में स्वयं को अनुभव नहीं किया है, तब तक औरों को आपका साक्षात्कार नहीं हो सकेगा। क्योंकि जो दैवी स्वरूप का साक्षात्कार भक्तों को होगा, वह लाइट रूप के कार्ब में चलते-फिरते रहने से ही होगा। साक्षात्कार भी लाइट के बिना नहीं होता है। स्वयं जब लाइट-रूप में स्थित होंगे, आपके लाइट रूप के प्रभाव से ही उनको साक्षात्कार होगा। जिसे शास्त्रों में दिखाते हैं कि कंस ने कुमारी को मारा, तो वह उड़ गई, साक्षात्-रूपधारी हो गई और फिर आकाशवाणी की। वैसे ही आप लोगों का साक्षात्कार हो, तो ऐसा अनुभव होगा कि मानो यह देवी द्वारा आकाशवाणी हो रही है। वह सुनने को इच्छुक होंगे कि यह देवी या शक्ति मेरे प्रति क्या आकाशवाणी करती है। आप में अब यह नवीनता दिखाई दे। साधारण बोल नज़र न आयें, ऊपर से आकाशवाणी हो रही है, बस ऐसा अनुभव हो। इसलिये कहा कि अब ज्वालामुखी बनने का समय है। अब आपका गोपीपन का पार्ट समाप्त हुआ। महारथी जो आगे बढ़ते जा रहे हैं, उनका इस रीति सर्विस करने का पार्ट भी ऑटोमेटिकली बदली होता जाता है। पहले आप लोग भाषण आदि करती थीं और कोर्स कराती थीं। अभी चेयरमैन के रूप में थोड़ा बोलती हो, कोर्स आदि आपके जो साथी हैं, वह कराते हैं। अभी इस समय, कोई को आकर्षण करना, हिम्मत और उल्लास में लाना, यह सर्विस रह गई है, तो फर्क आ जाता है ना? इससे भी आगे बढ़ कर यह अनुभव होगा जैसे कि आकाशवाणी हो रही है। कहेंगे यह कोई अवतार हैं और यह कोई साधारण शरीरधारी नहीं हैं। अवतार प्रकट हुए हैं। जैसे कि साक्षात्कार में अनुभव करते-करते देवी प्रकट हुई है। महावाक्य बोले और प्राय: लोप। अभी की स्टेज व पुरुषार्थ का लक्ष्य यह होना है।
अब स्थूल कारोबार से भी, जैसेकि उपराम होते जायेंगे। इशारे में सुना, डायरेक्शन दिया और फिर अव्यक्त वतन में। जैसे साकार में देखा, अनुभव किया, नीचे आये, डायरेक्शन दिया, सुना और फिर ऊपर। शुरू और अन्त की कारोबार में रात और दिन का अन्तर दिखाई दे। अभी जिम्मेवारियाँ तो और भी बढ़ेगी। ऐसे नहीं कि जिम्मेवारियाँ कम होंगी, तब फरिश्ता बनेंगे। नहीं, जिम्मेवारियाँ और सर्विस का विस्तार तो चारों ओर और बढ़ेगा। जैसे अब विदेश की भी सर्विस बढ़ी ना और विस्तार भी हुआ ना? ऐसे ही भिन्न-भिन्न प्रकार की जो सर्विस हो रही है, वह बढ़ेगी जरूर। विश्व की हर प्रकार की आत्माओं का उद्धार होने का गायन भी शास्त्रों में है ना? प्रैक्टिकल में हुआ है ना, तब तो इसका शास्त्रों में गायन है? यह सब होगा। अभी तो एक-एक स्थान पर बैठे हो, फिर दस-दस स्थान सम्भालने पड़ेंगे फिर तो एक जगह बैठ भी नहीं सकेंगे। अभी तो छ: आठ मास एक ही जगह बैठते हो, लेकिन फिर तो लाइट हाउस मिसल चारों ओर सर्विस करते रहेंगे।
जो निमित्त बने हुए मुख्य हैं, सर्विसएबुल हैं और राज्य-भाग्य की गद्दी लेने वाले हैं, ऐसे अनन्य रत्न लाइट हाउस मिसल घूमते और चारों ओर लाइट देते रहेंगे। लाइट हाउस का भी प्रैक्टिकल रूप चाहिए ना? एक अनेकों को लाइट देंगे। बेहद विश्व के मालिक, फिर वह कोई एक एरिया के हद का ही जिम्मेवार हो, ऐसा तो हो नहीं सकता। चाहे निमित्त-मात्र भले ही उनका एक ठिकाना हो, जैसे लाइट हाउस का निमित्त ठिकाना तो एक है ना? लेकिन सर्विस एक ठिकाने की नहीं करते बल्कि चारों ओर लाइट फैलाते हैं। इसी रीति स्थान भले एक ही होगा, लेकिन जो अपने में विशेषतायें होंगी या शक्तियाँ हैं, उसका लाभ चारों ओर हो। अभी तक सिर्फ एक स्थान पर ही आपकी विशेषता का लाभ है। सूर्य एक स्थान को ही रोशनी देता है क्या? तो आपकी भी विशेष शक्ति रूपी किरणें चारों ओर फैलनी चाहिए ना? नहीं तो मास्टर सर्वशक्तिमान् और ज्ञान सितारे आप कैसे सिद्ध होंगे? मास्टर ज्ञानसूर्य अर्थात् बाप समान। सितारे होते हुए भी बाप समान स्टेज। वह तो अष्ट रत्न ही प्राप्त करेंगे ना? अगर कोई सितारा एक ही स्थान पर, अपना प्रकाश फैलाता है और वह टिमटिमाता उसी अपनी एरिया में ही रोशनी देता है तो उसको मास्टर ज्ञानसूर्य व बाप समान नहीं कहेंगे। जब तक वह बाप समान की स्टेज पर नहीं आया है, तब तक बाप समान तख्त नहीं ले सकता। इसलिये अपनी स्टेज ऐसी बनाओ जो सर्विस बढ़े।
चक्रधारी बनने से ही चक्रवर्ती महाराजा बनेंगे। यहाँ चक्रधारी, वहाँ चक्रवर्ती। जिसमें लाइट का भी चक्र हो और सेवा में प्रकाश फैलाने वाला चक्र भी हो, तब ही कहेंगे - चक्रधारी। ऐसा चक्रधारी ही चक्रवर्ती बन सकता है। चलते-फिरते लाइट का चक्र हरेक को दिखाई देगा, जैसे इन आंखों से दिखाई पड़ रहा है। आश्चर्य खायेंगे कि यह सचमुच है व मैं ही देख रहा हूँ? आपके लाइट का रूप और लाइट का क्राउन ऐसा कॉमन हो जायेगा कि चलते-फिरते सबको दिखाई देगा। यह लाइट के ताजधारी हैं। जैसे साकार में लाइट का अनुभव करना कॉमन बात थी, सबको उसी रूप से नज़र आता था, जैसे कि इन आंखों से देख रहे हैं। ऐसे आप लोगों को अनुभव होगा। देखते-देखते वह खुद गुम होने लगेंगे - मैं कहाँ हूँ और क्या देख रहा हूँ? जैसे साकार द्वारा अनुभव करते थे, स्वयं से ही कभी-कभी आश्चर्य खाते थे; कि क्या मेरे पाँव यहाँ हैं अथवा मूल वतन या सूक्ष्म वतन में हैं? जैसे साकार द्वारा आपको अनुभव होते थे, वैसे ही फिर आपके द्वारा सबको अनुभव होगा। तब तो समान की स्टेज में आयेंगे। वह तब होंगे, जब बीच-बीच में अपने इस स्वरूप की स्मृति लाते रहेंगे। साकार ने भी गुप्त पुरुषार्थ किया। इसी प्रकार आप लोगों को भी यह गुप्त पुरुषार्थ व गुप्त मेहनत करनी है। इतना अटेन्शन है? टेन्शन होते हुए भी अटेन्शन रहे।
अभी तो फिर भी रात और दिन में आराम करने का टाइम मिलता है, लेकिन फिर तो यह रेस्ट लेना, यह भी समाप्त हो जायेगा। लेकिन जितना अव्यक्त लाइट रूप में स्थित होंगे, उतना ही शरीर से परे का अभ्यास होने के कारण दो-चार मिनट भी अशरीरी बन जायेंगे, तो मानों जैसे कि चार घण्टे का आराम कर लिया। ऐसा समय आयेगा जो कि नींद के बजाए चार-पाँच मिनट अशरीरी बन जायेंगे, जैसे कि नींद से शरीर को खुराक मिल जाती है, वैसे ही यह भी खुराक मिल जायेगी। शरीर तो पुराने ही रहेंगे। हिसाब-किताब पुराना तो होगा ही। सिर्फ उसमें यह एडीशन होगी। लाइट-स्वरूप के स्मृति को मजबूत करने से हिसाब-किताब चुक्त करने में भी लाइट रूप हो जायेंगे। जैसे इन्जेक्शन लगाने से पाँच मिनट में ही फर्क पड़ जाता है, नींद की गोली लेने से भी परेशानी समाप्त हो जाती है। वैसे आप भी ऐसे ही समझो कि यह हम नींद की खुराक लेते हैं। ऐसी स्टेज लाने के लिये ही यह अभ्यास है।
अमृतवेले भी विशेष यह अभ्यास करना है - हम जैसेकि अवतरित हुए हैं। कभी ऐसे समझो कि मैं अशरीरी और परमधाम का निवासी हूँ अथवा अव्यक्त रूप में अवतरित हुई हूँ और फिर स्वयं को कभी निराकार समझो। यह तीन स्टेजेस पर जाने की ऐसी प्रैक्टिस हो जाए जैसे कि एक कमरे से दूसरे कमरे में जाना होता है। तो अमृतवेले यह विशेष अशरीरी-भव का वरदान लेना चाहिए अभी विशेष यह अनुभव हो। अच्छा! चढ़ती कला सर्व का भला। चढ़ती कला का, प्रैक्टिकल स्वरूप क्या होता है? उसमें सर्व का भला होता है। इनसे ही चढ़ती कला का अपना पुरुषार्थ देख सकेंगे। सर्व का भला ही सिद्ध करता है कि चढ़ती कला है। वास्तव में यही थर्मामीटर है।
आप लोगों का शुरू में था शीतला देवी का पार्ट। अभी है ज्वाला देवी का पार्ट। पहले स्नेह से, समीप सम्बन्ध में आये और अब फिर, शक्ति स्वरूप बनना है। अभी सिर्फ गुण और स्नेह का प्रभाव है या नॉलेज का प्रभाव है, लेकिन साक्षात्कारमूर्त अनुभव करें कि यह कोई साधारण शक्ति नहीं है। जैसे सूर्य की किरणें फैलती हैं, वैसे ही मास्टर सर्वशक्तिमान् की स्टेज पर शक्तियों व विशेषताओं रूपी किरणें चारों ओर फैलती अनुभव करें। मैं विघ्न-विनाशक हूँ, इस स्मृति की सीट पर स्थित होकर कारोबार चलायेंगे तो विघ्न सामने तक भी नहीं आयेंगे। अच्छा!