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आइए समझें कि, परमात्मा को ओमनीप्रेजेंट या सर्वव्यापी क्यों नहीं कह सकते हैं (भाग 1)

आइए समझें कि, परमात्मा को ओमनीप्रेजेंट या सर्वव्यापी क्यों नहीं कह सकते हैं (भाग 1)

हमारी दुनिया में एक बहुत ही प्रचलित कॉन्सेप्ट है कि, परमात्मा हर जगह, हर वस्तु, प्रत्येक जीवित प्राणी और व्यक्ति में मौजूद है, और प्रायः सभी इस पर विश्वास करते हैं। हिन्दी भाषा में इस बात का उल्लेख परमात्मा के सर्वव्यापि के रूप में किया गया है। तो आइए, इस संदेश के द्वारा हम उन 5 कारणों को जानें कि, यह सच क्यों नहीं है –

  1. परमात्मा सभी आत्माओं का आध्यात्मिक पिता है नाकि वो हर बच्चे या इंसान में मौजूद है – हम परमात्मा द्वारा बताए गए आध्यात्मिक ज्ञान से समझते हैं कि, हम सभी एक आध्यात्मिक ऊर्जा या आत्मा है और इस दुनिया में बड़ी संख्या में मानव आत्माएं हैं जोकि, अपने अपने फिजिकल शरीरों के माध्यम से अपनी अपनी भूमिकाएँ निभाते हैं। हम यह भी जानते हैं कि, परमात्मा भी हमारी तरह एक आध्यात्मिक शक्ति और आत्मा है, लेकिन वो हम सभी से भी अधिक शक्तिशाली हैं। तो, हम सभी आत्माएं भाई-भाई हैं और शायद इसीलिए हम आमतौर पर ये कह देते हैं कि, अलग-अलग धर्मों और देशों से बिलॉन्ग करते हुए भी हम सभी भाई-भाई हैं। चूँकि हम सभी आत्माएँ हैं, और हम सभी की अपनी-अपनी पहचान है। इस दुनिया में हम सभी परमात्मा की उपस्थिति और अपने दिलों में उनके प्यार को महसूस करते हैं क्योंकि, हम सभी उन्हें बहुत याद करते हैं, लेकिन इसका ये मतलब बिल्कुल भी नहीं है कि, वे स्वयं हम सभी के अंदर और हर इंसान में मौजूद हैं। परमपिता परमात्मा हमारे आध्यात्मिक पिता हैं और वह इस भौतिक यूनिवर्स और पांच तत्वों की भौतिक दुनिया से परे, आत्माओं की दुनिया में रहते हैं। वे इस भौतिक संसार से अलग रहते हुए भी, वे इसमें अपनी पॉजिटिव वाइब्रेशंस रेडिएट करते रहते हैं और सभी मनुष्य आत्माओं को अपने जीवन में बहुत सारी उपलब्धियां प्राप्त करने का अवसर प्रदान करते हैं।
  2. यदि परमात्मा हमारे अंदर होते, तो हम सभी हर प्रकार से एक जैसे ही होते – परमात्मा द्वारा दिया हुआ आध्यात्मिक ज्ञान हमें यह भी बताता है कि, प्रत्येक मनुष्य आत्मा में अपने अपने अद्वितीय मन, बुद्धि और संस्कार होते हैं। तो अगर परमात्मा हम सबके अंदर होते तो, हमारे मन, बुद्धि और संस्कार अलग-अलग नहीं होते। और हम सभी अपनी अलग-अलग सोच रखते हुए, चीज़ों को अपने अपने नजरिए से देखते हुए, अपनी बुद्धि से अलग-अलग निर्णय लेते हैं और हम सभी के अपने अलग-अलग संस्कार होते हैं। इसका अर्थ है कि, परमात्मा की अपनी एक अलग पहचान है और वह हम सभी के द्वारा सोचने, बोलने और कर्म करने का कार्य नहीं करते हैं बल्कि वे हमें सही ढंग से सोचने, बोलने और कार्य करने के लिए गाइड करते हैं। और हम सभी भी अपने मन, बुद्धि और संस्कारो की क्वॉलिटी के एकार्डिंग, उनके द्वारा दिए गए निर्देशों का अलग-अलग तरह से पालन करते हैं।

(कल भी जारी रहेगा…)

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