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गणेश चतुर्थी का आध्यात्मिक महत्व (भाग 1)

September 19, 2023

गणेश चतुर्थी का आध्यात्मिक महत्व (भाग 1)

हम सभी “श्री गणेश” के आगमन और जन्म को बड़ी आस्था और उत्साह के साथ मनाते हैं, और उनसे अपने जीवन के विघ्नों को नष्ट करने का आह्वान करते हैं। हममें से अधिकांश लोग उनके जन्म की पौराणिक कहानी और उनके शारीरिक स्वरूप से परिचित हैं। अन्य उत्सवों की तरह, श्री गणेश चतुर्थी (इस वर्ष; 19 सितंबर से 28 सितंबर) का भी गहरा आध्यात्मिक महत्व है। लेकिन क्या हम जानते हैं कि, श्री गणेश हममें से प्रत्येक के अंदर मौजूद हमारी रियल दिव्यता का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनका स्वरूप; कई गुणों का प्रतीक है और हम सभी को अपने जीवन में इन्हें अपनाने और फॉलो करने के लिए एक गाईडिंग प्रिंसिपल की तरह है।

उनके बारे में ज्ञात कहानी इस प्रकार से है कि, देवी पार्वती जब स्नान करने जाएं तो कोई द्वार पर पहरा दे। इसलिए उसने अपने शरीर की धूल को झटक कर एक बालक का निर्माण किया, उसमें प्राण फूंके और उसे द्वार के बाहर रक्षक के रूप में खड़े रहने का निर्देश दिया। उसके पश्चात जब शंकर जी 10 वर्ष की गहन तपस्या के बाद घर लौटे, लेकिन बालक श्री गणेश ने उन्हें अपनी माता की आज्ञानुसार प्रवेश करने से मना कर दिया। फिर उन्होंने क्रोधित होकर बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया, जिससे उस बालक के प्राण निकल गए, लेकिन तथ्यों को जानने के बाद, शंकर जी ने बच्चे के शरीर पर एक हाथी का सिर लगाकर उसे वापस जीवित कर दिया।

हालाँकि यह एक दिलचस्प कहानी है, लेकिन हमें इसमें कुछ घटनाओं के क्रम को रोककर कुछ प्रश्नों के जवाब ढूंढने की ज़रूरत है। पार्वती जी एक देवी थीं, उनके शरीर पर धूल कैसे चढ़ सकी जिससे उन्होंने एक बालक पैदा किया? और वर्षों की तपस्या से लौटने के बाद भी देवता शंकर जी को इतना क्रोध कैसे आया? साथ ही, वह एक दयालु देवता हैं तो उन्होंने एक मामूली सी बात के लिए एक मासूम बच्चे का सिर धड़ से अलग क्यों कर दिया? और फिर श्री गणेश जी को अपना पुराना मनुष्य रूपी सिर वापस क्यों नहीं मिला, बल्कि एक हाथी का सिर ही क्यों मिला?

कहानी के पीछे के सार का आत्मनिरीक्षण करने से यह पता चलता है कि, उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर हमारे स्वयं के जीवन के लिए प्रासंगिक हैं। श्री पार्वती जी ने अपने शरीर से जो बालक पैदा किया वह हमारे देह-भान को रिप्रेजेंट करता है, श्री गणेश के अहंकार ने उसे अपने पिता को पहचानने नहीं दिया, यह इस बात का प्रतीक है कि, जब हम आत्मायें देह-अभिमान वश होती हैं तो हमारा अहंकार हमें अपने परमपिता परमात्मा; सर्वशक्तिमान को पहचानने नहीं देता है। सिर हमारे अहंकार को रिप्रेजेंट करता है इसलिए शंकर जी द्वारा गणेश बालक का सिर काटना इस बात का प्रतीक है कि, परमात्मा हमारे अहंकार को समाप्त कर उसके स्थान पर ज्ञान का सिर स्थापित करते हैं। बुद्धि हमें अपनी सभी बाधाओं को नष्ट करने की शक्ति देती है। इस प्रकार से श्री गणेश का जन्म और उनके गुण हमें सिखाते हैं कि, अपने जीवन में आने वाली बाधाओं के विघ्न विनाशक कैसे बनें।

(कल भी जारी रहेगा…)

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