ब्रिजशान्ता दादी के श्रीमुख-कमल से सुनाए गए ये अनमोल अनुभव हैं, जिनमें दादी ने बाबा के स्नेह तथा अपने जीवन की मधुर स्मृतियों को साझा किया है।
सन 1937 का समय था। हैदराबाद (सिंध) में बाबा ने पहली बार ज्ञान सुनाना शुरू किया। उस समय बाबा का घर, "जोता निवास" कहलाता था। बाबा पहले से ही माताओं का बहुत सम्मान करते थे। उनका घर साधारण था, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने उसे एक बड़े घर का रूप दे दिया। उस घर का नाम किसी बेटे या बेटी के नाम पर नहीं रखा गया, बल्कि अपनी धर्मपत्नी जोता के नाम पर "जोता निवास" रखा। बाबा का नाम सिंध में बहुत प्रसिद्ध था। लोग उन्हें दादा लेखराज के नाम से जानते थे।
उस समय मेरी आयु लगभग 13 वर्ष थी और मैं हैदराबाद सिंध के तोलाराम गर्ल्स स्कूल में पढ़ती थी। मेरी बड़ी बहन और कुछ अन्य बहनें बाबा की क्लास में जाती थीं। वे लौटकर हमें बताती थीं कि बाबा क्या कहते हैं। मेरी बड़ी बहन मनमोहिनी दीदी, जो बाद में यज्ञ की प्रमुख निमित्त बनीं, भी उन दिनों ज्ञान में थीं।
एक दिन हमने भी बाबा की बातें सुनीं। बाबा कहते थे,
"तुम आत्मा हो।"
आत्माओं के लिए यह सारा संसार एक मंच है। तुम बच्चे कहाँ से आए हो? तुम कौन हो? तुम आत्मा हो। बाबा ने हम आत्माओं को ऐसा ज्ञान दिया जिससे हमारा देह-अभिमान समाप्त होने लगा।
शुरुआत में केवल 12-15 ही क्लास में जाते थे। वे जो सुनते, वही आकर हमें सुनाते थे। फिर एक बार स्कूल की छुट्टियाँ थीं। मैंने पाँचवीं अंग्रेज़ी पास की थी और छठी में गई थी। उन्हीं छुट्टियों में मैं पहली बार बाबा के पास गई। उस समय संस्था का नाम "ओम मंडली" रखा था। "ओम" का अर्थ है "मैं आत्मा" और "मंडली" अर्थात् सारी दुनिया मेरा परिवार है। और फिर धीरे-धीरे मैं नियमित रूप से ओम मंडली जाने लगी।
बाबा माताओं को पहले स्थान पर रखते थे। वे कहते थे कि जिस बच्चे को माता का सम्मान नहीं मिलता, वह जीवन में भटक जाता है। शिवबाबा ने ब्रह्मा बाबा के द्वारा हमें यह मान दिया कि परमात्मा हमारा पिता भी है और माता भी। उस समय समाज में विधवाओं की भी स्थिति बहुत कठिन थी। यदि किसी स्त्री का पति शरीर छोड़ देता, तो उसे अनेक सामाजिक बंधनों में बाँध दिया जाता था। पर बाबा ने माताओं को सम्मान दिया और उन्हें आत्म-सम्मान के साथ जीना सिखाया जाएगा।
बाबा के इस विश्वविद्यालय का नाम इतना प्रसिद्ध क्यों हुआ?
क्योंकि ब्रह्मा बाबा ने अपने तन, मन और धन को पूर्ण रूप से ईश्वरीय कार्य में समर्पित कर दिया था। ब्रह्मा बाबा ने केवल अपने नाम से यह घोषणा नहीं की थी, बल्कि हैदराबाद सिंध के दो प्रतिष्ठित और सम्पन्न व्यक्तियों को भी इसके साथ जोड़ा था। बाबा अपने वचन के पक्के थे। उन्होंने जो संकल्प लिया, उसे जीवन भर निभाया।
हमारे परिवार में भी ज्ञान को लेकर विरोध शुरू हो गया। मैं लगभग चौदह-पंद्रह वर्ष की थी। धीरे-धीरे उन्होंने हम पर निगरानी बढ़ा दी।
एक समय ऐसा आया जब हमारे घर में मेरे ऊपर अठारह ताले लगा दिए गए। मैंने स्वयं गिनकर देखे थे—पूरे अठारह ताले। मानो मैंने कोई अपराध कर दिया हो। जबकि मैंने कोई चोरी नहीं की थी, केवल अपने दिल में परमात्मा को बसा लिया था। जब भी अवसर मिलता, मैं बाहर निकलने का प्रयास करती। एक दिन मैंने देखा कि चौकीदार अपनी जगह पर नहीं है। मैंने सोचा कि आज मैं निकलकर बाबा के पास पहुँच जाऊँगी। मैं घर से बाहर निकली, लेकिन रास्ते में मुझे देखकर चौकीदार को संदेह हो गया। मैं छोटी थी, लगभग पंद्रह वर्ष की। डर के कारण मैं वापस लौट आई। मैंने सोचा कि कहीं रास्ते में कोई अपमानजनक स्थिति न बन जाए।
लेकिन परमात्मा के प्रति प्रेम कम नहीं हुआ।
उस समय अनेक विधवा माताएँ भी बड़ी कठिनाइयों के बीच सत्संग में आती थीं। उधर मेरे घर में ताले और पहरे और भी बढ़ते जा रहे थे। हर दरवाज़े पर ताला था। उस समय गैस का चलन नहीं था, कोयले का उपयोग होता था। यहाँ तक कि जिस स्थान से कोयला लाया जाता था, वहाँ भी ताला लगा दिया गया था। घर का कोई भी रास्ता ऐसा नहीं छोड़ा गया था जिससे मैं बाहर जा सकूँ।
फिर भी मन में एक ही संकल्प था—किसी न किसी तरह संस्था पहुँचना है।आज इतने वर्षों बाद भी वे दृश्य मेरी स्मृति में बिल्कुल स्पष्ट हैं। बाद में वह घर पाकिस्तान में रह गया, लेकिन उसकी यादें आज भी मेरे साथ हैं।
एक दिन ऐसा भी आया जब मैंने अपनी माँ, जिनका नाम लीलावती था, से कहा कि अब हमें भी कुछ करना चाहिए। घर में इतनी बंदिशें थीं कि सांस लेना भी कठिन लगने लगा था। मेरी माँ भी ज्ञान से प्रेम करती थीं। एक अवसर पर वे घर से निकल गईं, लेकिन परिवार के अन्य लोगों ने तुरंत शोर मचा दिया कि “अम्मी जा रही हैं, अम्मी जा रही हैं।” बात इतनी बढ़ गई कि हमारे पिता तक समाचार पहुँचा दिया गया।
समय बीतता गया। परिस्थितियाँ बदलती रहीं, लेकिन अंततः वह समय भी आया जब हम कराची पहुँच गए। हैदराबाद और कराची के बीच लगभग चार घंटे का सफर था। परंतु वहाँ पहुँच जाने के बाद भी मेरे पिता ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। वे मेरे लिए अदालत का वारंट लेकर कराची पहुँचे। मैं उस समय नाबालिग थी, लगभग पंद्रह या सोलह वर्ष की। अदालत में मुझे बुलाया गया। वहाँ मुझे मेरे लौकिक पिता को दिखाया गया और कहा गया कि यह तुम्हारे पिता हैं और तुम्हें इनके साथ जाना होगा। चूँकि मैं उस समय वयस्क नहीं थी, इसलिए अदालत ने मुझे पिता के साथ वापस भेज दिया।
घर पहुँचने पर मेरी माँ ने आश्चर्य से पूछा कि यह सब क्या हुआ। उन्हें तो बताया गया था कि पिता किसी परिचित की शादी में दो दिनों के लिए बाहर गए हैं। उन्हें वास्तविकता का कोई पता नहीं था। जब उन्हें सच्चाई मालूम हुई, तो वे भी बहुत दुखी हुईं।
इसके बाद विभाजन का समय आया। पाकिस्तान बनने के बाद बहुत से सिंधी परिवार भारत आ गए। कोई मुंबई गया, कोई दिल्ली और कोई अन्य स्थानों पर बस गया। हमारे परिवार के सामने भी नई परिस्थितियाँ थीं।
मेरे पिता को गीता के ज्ञान से बहुत प्रेम था। वे नियमित रूप से गीता पढ़ते थे। धीरे-धीरे उन्होंने यह भी देखा कि उनके बच्चे किसी गलत मार्ग पर नहीं जा रहे हैं। वे किसी सांसारिक आकर्षण के पीछे नहीं भाग रहे थे, बल्कि ईश्वरीय ज्ञान और आध्यात्मिक जीवन की ओर आकर्षित थे। यह बात उनके मन को कहीं न कहीं प्रभावित करने लगी।
जब विभाजन के बाद यज्ञ को कराची से भारत लाने की आवश्यकता हुई, तब एक बहुत बड़ी चुनौती सामने थी। इतने सारे बच्चों, माताओं और बहनों को सुरक्षित रूप से भारत कैसे लाया जाए? उस समय मेरे लौकिक पिता, दादा मूलचंद, इस कार्य में एक महत्वपूर्ण निमित्त बने।
उन्होंने पूरे यज्ञ को कराची से भारत लाने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की। यह बहुत बड़ा कार्य था। लेकिन परमात्मा किसी-न-किसी को निमित्त बनाकर अपना कार्य कराते हैं।
इसके बाद हम भारत आ गए। धीरे-धीरे हम आबू पहुँचे। आज जब मैं आबू में बैठकर उन दिनों को याद करती हूँ, तो लगता है जैसे एक पूरा युग बीत गया हो। प्रारंभिक दिनों में हम ब्रिजकोठी में भी रहे। उस समय उस भवन को लोग विभिन्न नामों से पुकारते थे, यहाँ तक कि कुछ लोग उसे “भूत बंगला” भी कहते थे।
यज्ञ की परिस्थितियाँ भी समय-समय पर बदलती रहीं। कभी आर्थिक चुनौतियाँ आईं, कभी रहने की व्यवस्था की कठिनाइयाँ सामने आईं, लेकिन ब्रह्मा बाबा ने हर परिस्थिति में रास्ता निकाला। कराची से भारत आने तक और फिर भारत में स्थिर होने तक अनेक आत्माएँ निमित्त बनीं।
मैं आज जब अपनी जीवन-कहानी सुनाने बैठती हूँ, तो महसूस करती हूँ कि यह केवल मेरी कहानी नहीं है। इसमें पूरे यज्ञ की कहानी समाई हुई है। हैदराबाद सिंध के वे दिन, ओम मंडली की शुरुआत, माताओं को मिला सम्मान, घर-परिवार का विरोध, अठारह तालों का अनुभव, कराची की घटनाएँ, अदालत का प्रसंग, विभाजन का समय, और फिर भारत तथा आबू तक की यात्रा—ये सब मिलकर उस ईश्वरीय इतिहास का हिस्सा बन गए हैं जिसे हमने अपनी आँखों से देखा और जिया है।
यह सब मेरे जीवन का अनुभव है—जो मैंने देखा, सुना, समझा और जिया। बाबा ने हमें आत्मा का बोध कराया, आत्म-सम्मान दिया, परमात्मा से संबंध जोड़ना सिखाया और जीवन को एक नई दिशा दी।




