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Apni Dharti Ko Bachaye Aao
Vishal Kothari, Priyani Vani · 5:30
Lyrics
पूछती है धरा पूछता है आसमान प्यासी क्यों है ये नदियां क्यों वीरान वादिया
अनजान अब ना बनो इंसाफ इनसे करो
अनजान अब ना बनो इंसाफ इनसे करो
हर भरा ये जग करो खुद को माफ तुम करो
पूछती है धरा पूछता है आसमान प्यासी क्यों है ये नदियां क्यों वीरान वादिया
विलुप्त जीव हो रहे विलुप्त है वनस्पति
बिलखता है ये मौसम प्यासे है पशु पंछी
मुरझाये हुए चमन कहती तपती धरती
इनकी लू में वेदना दिशा दिशा जो रोती
तेरा मेरा छोड़कर रहम कर्म इनपे करो
तेरा मेरा छोड़कर रहम कर्म इनपे करो
हर भरा ये जग करो खुद को माफ तुम करो
पूछती है धरा पूछता है आसमान प्यासी क्यों है ये नदियां क्यों वीरान वादिया
पिघल रहे सारे हिमनग उफन रहे है सागर डूब रहे टापू सारे फिर भी हम है बेखबर
वातावरण को साफ रख के घर घर ये पैग़ाम दे
सजा दे सारे सृष्टि को सभी जिए फिर शान से
आंखे बंद मत करो बहरे बनके ना रहो
आंखे बंद मत करो बहरे बनके ना रहो
हराभरा ये जग करो खुद को माफ तुम करो
पूछती है धरा पूछता है आसमान प्यासी क्यों है ये नदियां क्यों वीरान वादिया
अनजान अब ना बनो इंसाफ इनपे करो
अनजान अब ना बनो इंसाफ इनपे करो
हर भरा ये जग करो खुद को माफ तुम करो
पूछती है धरा पूछता है आसमान प्यासी क्यों है ये नदियां क्यों वीरान वादिया
प्यासी क्यों है ये नदियां क्यों वीरान वादिया
प्यासी क्यों है ये नदियां क्यों वीरान वादिया
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