अंतर्मन की जागृति की लहर

अंतर्मन की जागृति की लहर

हमारी मान्यताएँ या तो हमें भीतर से सुला देती हैं या जागृत रखती हैं। भले ही हम शारीरिक रूप से जाग रहे हों, लेकिन यदि भीतर से सोए हुए हैं, तो अधिकांश समय हमें इसका एहसास भी नहीं होता। ऐसे में हम लोगों, परिस्थितियों और दुनिया को सही दृष्टि और सकारात्मक नज़रिए से नहीं देख पाते। हम वास्तविकता को गलत तरीके से समझते और उसका गलत अर्थ निकालते हैं, जिससे हमें दुख होता है। हम मानसिक या भावनात्मक पीड़ा को सामान्य मान लेते हैं और यह सोचते हैं कि हमारे दुख का कारण दूसरे लोग, हमारे अपने संबंध या परिस्थितियाँ हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारे भीतर कई गलत मान्यताएँ होती हैं। इनमें सबसे बड़ी मान्यता यह है कि हम आत्मा नहीं, बल्कि केवल यह शरीर हैं। जब यह सूक्ष्म पीड़ा असहनीय हो जाती है, तभी हम उसका समाधान खोजने लगते हैं या महसूस करते हैं कि अब कुछ बदलने की आवश्यकता है। हममें से अधिकांश लोग पूरी ज़िंदगी इसी आंतरिक नींद में रहते हैं और इसलिए दुख का अनुभव करते हैं। आंतरिक जागृति का अर्थ है शरीर-अभिमान पर आधारित इन गलत मान्यताओं को पहचानना और उन्हें बदलने का साहस करना। जैसे-जैसे हमारी मान्यताएँ बदलती हैं, हमारा दुख कम होने लगता है। फिर स्वाभाविक रूप से हमारी इच्छा होती है कि दूसरे लोग भी जागें, ताकि वे भी अपने दुखों से मुक्त हो सकें।

आज मानव के इतिहास का समय ऐसा है कि एक ओर बहुत-सी आत्माएँ और गहरी आंतरिक नींद में जा रही हैं। देह-अभिमान बढ़ रहा है और उसके साथ दुनिया में दुख भी बढ़ रहा है। वहीं दूसरी ओर, आंतरिक जागृति की एक लहर भी उठ रही है, जो अनेक आत्माओं को अपने साथ आगे ले जा रही है। अधिक से अधिक आत्माएँ अपनी गहरी नींद से जाग रही हैं, आत्म-अभिमानी बन रही हैं और दूसरों को भी आत्म-जागृति की ओर प्रेरित कर रही हैं। यह समय ऐसा है, जैसे एक ही समय में कुछ लोगों के लिए गहरी रात हो और कुछ के लिए सुबह। समय तो एक ही है, लेकिन अधिकांश आत्माओं के लिए अभी भी अंधेरी रात है, जबकि कुछ के लिए यह जागने की सुबह बन चुकी है। यह परिवर्तन परमात्मा द्वारा दिए गए आध्यात्मिक ज्ञान के कारण हो रहा है। वे सदा आत्म-अभिमानी रहते हैं और वही ज्ञान देकर अनेक आत्माओं की चेतना और मान्यताओं में परिवर्तन ला रहे हैं। ऐसी जागृत आत्माओं की संख्या प्रतिदिन बढ़ रही है। इस कारण वे अपने जीवन में अधिक शांति, खुशी और संतोष का अनुभव कर रही हैं, क्योंकि जीवन के प्रति उनकी सोच बदल चुकी है। दोनों प्रकार की आत्माओं के जीवन में लोग और परिस्थितियाँ लगभग समान हैं। अंतर केवल उनकी चेतना और मान्यताओं का है। दूसरी श्रेणी की आत्माएँ अपनी बदली हुई मान्यताओं के कारण उन्हीं परिस्थितियों में भी स्थिर रहती हैं, दुख और भावनात्मक कमजोरी से मुक्त रहती हैं। उनकी आंतरिक स्थिरता उनकी चेतना में आए परिवर्तन की गहराई को दर्शाती है।

आज का अभ्यास

आज अपनी प्रत्येक प्रतिक्रिया से पहले स्वयं को आत्मा अनुभव करें। बदली हुई चेतना ही जीवन की परिस्थितियों को शांति, स्थिरता और संतोष के साथ स्वीकारना सिखाती है।

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