सिर्फ 20 वर्ष की आयु में संगदोष के कारण मुझे शराब की लत लग गई। धीरे-धीरे यह केवल एक आदत नहीं रही, बल्कि मानसिक सहारा बन गई। लेकिन यही सहारा धीरे-धीरे मेरे जीवन की गति को रोकने लगा।
आलस्य, काम टालने की प्रवृत्ति और भूख की कमी ने मेरे स्वास्थ्य और व्यवसाय दोनों को प्रभावित करना शुरू कर दिया।
30 वर्ष की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते मुझे यह समझ आने लगा कि जिसे मैं सुकून का साधन समझता था, वही वास्तव में मेरे जीवन को भीतर से खोखला कर रहा है।
अध्यात्म में पहले से रुचि होने के कारण मैं ब्रह्माकुमारीज़ सेवा केंद्र पहुँचा और वहाँ राजयोग का कोर्स किया। सात्विक भोजन, अनुशासित दिनचर्या और नियमित राजयोग अभ्यास ने मेरे जीवन को एक नई दिशा दी। धीरे-धीरे शराब और मांसाहार सहज ही छूट गए। मेरी सोच सकारात्मक हुई, जीवन में स्वच्छता, संतुलन और आत्मविश्वास बढ़ने लगा।
आज मैं स्वयं प्रेरणा का माध्यम बन चुका हूँ। मेरे अनुभव से प्रेरित होकर लगभग 20 लोग राजयोगी जीवनशैली अपना चुके हैं और नशा मुक्त जीवन की राह पर आगे बढ़ रहे हैं। मेरे अनुभव का सार यही है —
जब आत्मा जागती है, तो व्यसन स्वतः समाप्त हो जाते हैं।





