सैकड़ों बार पुलिस से गोली चली। पुलिस के भी जवान मारे गए। मेरे भी मारे गए। ये मारामारी की जिंदगी हमारी 14 वर्ष तक रही। लेकिन डाकू जीवन में मैंने जो अनुभव किया कि सन 70 और 72 के बीच में चंबल घाटी में डाकुओं का इतना बड़ा आतंक था। मेरे नाम से बच्चा रोना बंद, कुत्ता भौंकना बंद। बड़े-बड़े शहर बंद हो जाते थे। 25 जिलों में हमारा शासन था।
लेकिन डाकू जीवन में मैंने जो अनुभव किया कि मैंने नोटों पर सोकर देखा, तानाशाही करके देखा, अटूट भक्ति करके देखा लेकिन डाकू जीवन में शांति नहीं थी और यही संकल्प लिया था कि चंबल घाटी में 25 जिलों में जितने मंदिर हैं उनको तोडूंगा, मस्जिदों को तोडूंगा, साधु संतों को मारूंगा, भगवान का नाम लेता मिलेगा उसकी नाक कान काटेंगे। ये मेरे अंदर धुंध पैदा हो गई, एसएलआर बंदूक थी, बंदूक लेकर ऊपर पहाड़ी पे आए तो मेरे सामने ये (ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालय के संस्थापक -प्रजापिता ब्रह्मा बाबा) सफेद वस्त्रधारी प्रकट हो गया।
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने चैलेंज किया था ब्रह्माकुमारीज़ विद्यालय को कि आपकी संस्था भारत में जब चलेगी पहले डाकुओं का परिवर्तन करके दिखाओ। जिस कार्य को सरकार नहीं कर सकी, समाज नहीं कर सका, उस कार्य को ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालय ने करके दिखाया है जो भारत का विख्यात डाकू आपके सामने लाया है।
एक समय था हत्या करना, लूटपाट करना, लोगों को दुख देना। आज दूसरों को प्यार देना, सत्य ज्ञान देना ये हमारा धर्म बन गया है।
ओम शांति।
हर व्यक्ति के अंदर एक छोटा सा प्रकाश है जो जीवन को रास्ता बताने में मदद करता है। व्यक्ति अपने को भूल और परमपिता परमात्मा को भूलकर, सही मार्ग को छोड़कर और गलत मार्ग पकड़ कर दर-दर की ठोकरें खाता है ना। जैसे मेरे जीवन ने सही मार्ग को छोड़कर और गलत मार्ग पकड़ कर जो 14 वर्ष डाकू जीवन बिताया जंगलों में, पहाड़ों में और चंबल घाटी में, इस जीवन के द्वारा जो कुछ अपराध हुए उसकी तो मैं सदा परमपिता परमात्मा से और सर्व आत्माओं से क्षमा चाहता हूं।
आज मेरी उम्र करीबन 97 वर्ष की होने जा रही है। 97 वर्ष की उम्र में मैंने जो अनुभव किया कि हर व्यक्ति एक परिस्थितियों का दास होता है। परिस्थितियां इंसान को जहां ले जाना चाहें इंसान को जाना ही पड़ता है। परिस्थितियां इंसान से जो कार्य कराना चाहें इंसान को करना ही पड़ता है। यह मैंने एक जीवन में अनुभव किया और परिस्थितियां इंसान को ऐसे नचाती हैं जैसे बंदर को मदारी नचाता है लेकिन ये भी मैंने अनुभव किया कि जो परिस्थितियां आती हैं इंसान को आगे बढ़ाने के लिए आती हैं, अनुभवी बनाने के लिए आती हैं। और जब परिस्थितियां आती हैं तो कोई साथ भी नहीं देता है। परिस्थितियों की बनती है कहानी।
अगर राम के सामने परिस्थिति नहीं आती तो रामायण भी नहीं लिखी जाती। मीराबाई देखो, हरिश्चंद्र को देखो। लेकिन जो व्यक्ति परिस्थितियों में भी अपनी मर्यादा को नहीं तोड़ता है उनका गायन और पूजन भी होता है।
इसके कई प्रमाण हैं। कहावत है कि सत्य ना छोड़े सूरमा और सत छोड़े सत जाए। सत्य की बांधी लक्ष्मी सो फिर मिलेगी आय।' परिस्थिति आती है मेरा पेपर लेने के लिए, तुम कितने महावीर हो, कितने बड़े बहादुर हो। तो परिस्थितियों ने मुझे डाकू बनाया।
मध्य प्रदेश में मेरे छोटे से गांव में जन्म हुआ। चार क्लास पढ़ाई की और 14 वर्ष की उम्र में मेरी शादी हो गई थी। सन 58 में मेरे गांव में एक छोटा सा पंचायती चुनाव हुआ था। चुनाव के कारण दो पार्टियां हो गईं। तो दूसरी पार्टी के लोगों ने मुझे इतना मारा पीटा कि जीने की आशा ना रही। पिताजी आए, बैलगाड़ी में रखकर मुझे थाने में ले गए। रिपोर्ट की, 20 दिन हम अस्पताल में रहे। ठीक होकर अपने गांव में आए। फिर लोग दोबारा परेशान करने लगे। जो होनी होती वो टाले से नहीं टलती। यह भी मेरा अनुभव है। मेरे पिताजी को भी पीट दिया। तो मेरे अंदर एक बदला लेने की भावना जागृत हुई और बदले की भावना को लेकर चंबल घाटी में हम डाकुओं से मिले। डाकुओं ने मुझे अपने साथ में रख लिया। एक दिन 12 लोगों को लेकर अपने गांव में गया और छह लोगों को गोली से परमधाम पहुंचा दिया। डाकू बन गए। जब डाकू बन गए तो डाकुओं का काम तो आप जानते ही हो डाका, डकैती, लूट-पाट हमारा धंधा बन गया ।
जब डाकू बन गया तो मैं देवी मां की बहुत पूजा करता था क्योंकि भक्ति भावना तो मेरे अंदर बचपन से थी। मांस मदिरा मैंने बचपन से ही नहीं खाया। मैं देवी मां की बहुत पूजा करता था। मेरा प्रतिदिन का नियम था एक किलो घी का हवन करना, 2000 गायत्री मंत्र का जाप करना, उंगली काट के खून चढ़ाना, 5 किलो आटा शक्कर मिला के चींटियों को चुगाना, मंदिर बनाया। वहां भी अखंड ज्योत आज भी जल रही है। हजारों लड़कियों की शादी भी करवाते थे। स्कूल भी खोले। मेरे स्कूल का पांच वर्ष का लड़का एक भी फेल नहीं हुआ। सैकड़ों बार पुलिस से गोली चली। पुलिस के भी जवान मारे गए। मेरे भी मारे गए। ये मारामारी की जिंदगी हमारी 14 वर्ष तक रही।
डाकू जीवन में मैंने जो अनुभव किया कि सन 70 और 72 के बीच में चंबल घाटी में डाकुओं का इतना बड़ा आतंक था। मेरे नाम से बच्चा रोना बंद, कुत्ता भौंकना बंद, बड़े-बड़े शहर बंद हो जाते थे। 25 जिलों में हमारा शासन था। दसवां हिस्सा हम वसूल करते थे और दसवां हिस्सा वसूल करने के बाद दसवां हिस्सा पुण्य का भी निकालते थे। इस प्रकार का हमारा डाकू जीवन रहा। लेकिन डाकू जीवन में मैंने जो अनुभव किया कि मैंने नोटों पर सोकर देखा, तानाशाही करके देखा, अटूट भक्ति करके देखा लेकिन डाकू जीवन में शांति नहीं थी। कहावत है 'कर देखे सब कर्म गोसाई, सुखी न भये... के नाई'।
एक बार मन में आया कि देवी मां की पूजा करते-करते कई वर्ष हो गए। सैकड़ों मन घी का हवन किया। कई मंदिर बनवाए, यज्ञ भागवत किया लेकिन देवी मां के दर्शन तो नहीं किए। एक बार मैंने चंबल घाटी में प्रतिज्ञा की थी कि जब तक देवी मां मुझे दर्शन नहीं देंगी तब तक मैं अन्न पानी नहीं खाऊंगा। रात में नहीं, मुझे दिन के 12:00 बजे दर्शन दो। इस उद्देश्य को लेकर चंबल घाटी में गुफा में बैठकर मैंने तीन रात और दो दिन देवी मां की आराधना की। जब तीन रात दो दिन हो जाते हैं। मैंने पानी नहीं पिया, ना खाना खाया और ना मेरे सामने कोई आया। बाद में मैं रोने लगा। और रोने के बाद फिर हमको क्रोध आया। जो मूर्ति थी वो तो फोड़ी मैंने पत्थर से और यही संकल्प लिया था कि भगवान भगवती कोई नहीं है। सब ढोंग है पाखंड है। अश्रद्धा हो गई।
बाद में मुझे क्रोध आया तो मैंने जो मेरे पास मूर्ति थी वो तो फोड़ी पत्थर से, सारा पूजा का सामान तोड़फोड़ दिया और यही संकल्प लिया था कि चंबल घाटी में 25 जिलों में जितने मंदिर हैं उनको तोडूंगा, मस्जिदों को तोडूंगा, साधु संतों को मारूंगा, भगवान का नाम लेता मिलेगा उसकी नाक कान काटेंगे। ये मेरे अंदर धुंध पैदा हो गई, एसएलआर बंदूक थी, बंदूक लेकर ऊपर पहाड़ी पे आया तो मेरे सामने ये सफेद वस्त्रधारी प्रकट हुआ। जब मैंने सफेद वस्त्रधारी को देखा तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए। सफेद धोती, सफेद कुर्ता ऐसा लाड सा आ रहा था। जब मैंने सफेद वस्त्रधारी को देखा तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए। बुद्धि में आया स्थान का कोई संत महात्मा होगा।
जैसे मैं चरणों के लिए दौड़ा उस समय आवाज हुआ कि बच्चे धीर धरो, तुम्हारे पास कुछ दिन के बाद चेतन देवियां आएंगी और वो ले जाएंगी, भगवान से मिलाएंगी।
दो मिनट का सीन मैंने आंखों से देखा। देखो ईश्वर की लीला, इधर हमको भी साक्षात्कार हुआ। उधर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को हुआ। तीन दिन के बाद लोकनायक जयप्रकाश नारायण, सुब्बाराव जी हम लोगों के सामने आए और उन्होंने कहा कि आप लोग समर्पण कर दो। सरकार आपकी मदद करेगी। तो हम लोगों ने कहा डाकू की सरकार मदद क्यों करेगी? जिनके ऊपर 2 करोड़ का इनाम, हजारों पकड़ डकैती के आरोप, भारत विख्यात डाकू को सरकार मदद करेगी। लोकनायक जयप्रकाश नारायण बोले कि मुझे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भेजा है। विश्वास रखो। तो हम 556 डाकुओं ने चंबल घाटी में एक मीटिंग की थी। उसमें प्रस्ताव रखा था कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मेरी आठ शर्तों को मानेंगी, हम लोग समर्पण कर देंगे। जिसमें पहली शर्त थी किसी डाकू को फांसी ना हो। खुली जेल में रखा जाए। 30 बीघा जमीन दी जाए। बच्चों के लिए पढ़ाई लिखाई, नौकरी दी जाए और फैमिली के बीच में रखा जाए। इसी प्रकार की सुविधा उनको भी दी जाए, जिनको मैंने लूटा है, पकड़ा है, मारा है। उनके बच्चों को भी 30 बीघा जमीन दी जाए। उनके बच्चों को नौकरी दी जाए।
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मेरी सभी शर्तों को मंजूर किया था। उन शर्तों के आधार पर हम 556 डाकुओं ने सन 1972 में समर्पण किया था। वो समर्पण की आवाज भारत में क्या सारे विश्व में गूंजी थी। हजारों मीडिया देश विदेश का आया था। मेला भर गया था। खुली जेल मुंगावली, भोपाल के पास में मध्य प्रदेश में बनवाई गई। वहीं न्यायालय बनाई गई। वहीं हमारे ऊपर मुकदमा चले जो मेरे ऊपर 100 कत्ल के आरोप थे। 200 पकड़ डकैती के आरोप थे। न्यायालय ने मुझे फांसी की सजा दी। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने अपील की। राष्ट्रपति ने वो भी माफ कर दी। गोलियों से बचाया, कानून से बचाया, फांसी से बचाया और 97 वर्ष की उम्र में संपूर्ण निरोगी बनाया। ये मेरी गुरु की देन है।
जो व्यक्ति हमारे गुरु की शरण में आएगा उसका बेड़ा पार हो जाएगा। हम आपको गुरु का परिचय देते हैं। ये दादा लेखराज थे। हीरा जवाहरात का धंधा करते थे और नंबर वन के व्यापारी थे, नंबर वन के सुंदर थे।
इनके अंदर परब्रह्म ने काया प्रवेश की इसलिए इनका नाम ब्रह्मा पड़ा। जो इनका उल्लेख गीता में भी है तीसरे अध्याय में कि प्रजापिता ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजा को रचकर कहा कि तुम वृद्धि को पाओगे।
आज आंखों से देख रहे हैं कि ब्रह्माकुमारीज़ विद्यालय की इतनी वृद्धि हो गई है। कोई गिनती नहीं कर सकता।
इसके बाद जब खुली जेल मुंगावली में रखा गया तो प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने चैलेंज किया था ब्रह्माकुमारीज़ विद्यालय को कि आपकी संस्था भारत में जब चलेगी पहले डाकुओं का परिवर्तन करके दिखाओ तो सरकार ने इन लोगों के लिए खानेपीने की व्यवस्था की थी, रहने की व्यवस्था की थी। तीन वर्ष तक खुली जेल मुंगावली में मध्य प्रदेश में ब्रह्माकुमारीज़ विश्वविद्यालय की शिक्षाएं दी गईं। जब हम 556 डाकुओं का परिवर्तन हो गया तो सरकार ने आठ वर्ष में छोड़ दिया था।
छोड़ने के बाद हमको बहनें भाई माउंट आबू लाए, तो वहां भी हमको गुरु का साक्षात्कार हुआ पांडव भवन में, उससे निश्चय हुआ, हमारे समर्पण के बाद फूलन देवी बनीं। अन्य डाकू बने, उनका भी हम लोगों ने समर्पण कराया। चंबल घाटी में डाकू समस्या 100 वर्षों से चली आ रही थी। जिसके लिए सरकार ने करोड़ों रुपया खर्च किया। कई बार समर्पण कराया लेकिन डाकू समस्या हल नहीं हुई।
ब्रह्माकुमारीज़ विश्वविद्यालय के माध्यम से आज चंबल घाटी में एक भी डाकू नहीं। जिस कार्य को सरकार नहीं कर सकी, समाज नहीं कर सका, उस कार्य को ब्रह्माकुमारीज़ विश्वविद्यालय ने करके दिखाया है जो भारत का विख्यात डाकू आपके सामने लाया है।
ब्रह्माकुमारीज़ विश्वविद्यालय की शिक्षाएं एक समाज के लिए बहुत महत्वपूर्ण शिक्षाएं हैं। आप सभी आएं, इन शिक्षाओं को धारण करें। विश्वविद्यालय की शिक्षाओं में मुझे पांच बातें अच्छी लगीं।
मनुष्य से देवता बनना है तो पांच बातों को धारण करना है।
पहला है ब्रह्मचर्य। दूसरा है शुद्ध अन्न, तीसरा है दैवी गुण और चौथा सत्संग जो पांच बातों को अपनाएगा तो मनुष्य से देवता बन जाएगा।
एक समय था हत्या करना, लूटपाट करना, लोगों को दुख देना। आज दूसरों को प्यार देना, सत्य ज्ञान देना ये हमारा धर्म बन गया है।
अब विश्वविद्यालय के सदस्य होने के नाते करीबन हम 28 राज्यों में गए हैं और हजारों जिलों में भी गए हैं। हजारों स्कूलों में भी गए हैं। सभी मीडिया वाले हमारा इंटरव्यू ले रहे हैं।
हमारा यह धर्म ही है कि हमारे विचारों में भगवान ने जो प्रेरणा दी है, मेरे गुरु ने दे दी है, गुरु का आदेश है कि अन्य लोगों के विचारों को परिवर्तन करना हमारा एक कर्म और धर्म है।
ओम शांति, ओम शांति।




