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20 Aug 1971
“सबसे श्रेष्ठ तख्त और ताज”
20 August 1971 · हिंदी
आज यह भट्ठी का ग्रुप डबल भट्ठी करने लिए आये हुए हैं। डबल भट्ठी कौनसी है? डबल भट्ठी के रहस्य को समझते हो? मधुबन तो है ही भट्ठी, लेकिन मधुबन भट्ठी के अन्दर भी विशेष कौनसी भट्ठी में अपने रहे हुए संस्कारों को भस्म करने लिए आये हैं? तो डबल भट्ठी का फोर्स भी बढ़ता है ना क्योंकि कोर्स मिलता है। एक तो जनरल, दूसरा पर्सनल। डबल कोर्स होने कारण डबल फोर्स भी बढ़ता है। तो जैसे डबल फोर्स बढ़ता है, वैसे ही सदा अपने को डबल ताजधारी समझ कर चलते रहें तो यह डबल कोर्स सदैव फोर्स में रहे। डबल ताज कौन सा है? अभी डबल ताजधारी हो कि भविष्य में बनेंगे। अभी डबल ताज कौन सा है? एक है लाइट अर्थात् प्योरिटी की निशानी का। और दूसरा है जो संगमयुग पर सर्व प्राप्तियां होती हैं, जिस शक्ति द्वारा ही ज़िम्मेवारी को धारण कर सकते हैं। तो लाइट का क्राउन भी और माइट का भी है। प्योरिटी का भी और पावर का भी, यह डबल ताज निरन्तर धारण करने वाले। तो बताओ, डबल फोर्स सदा कायम नहीं रहेगा? दोनों की आवश्यकता है। और दोनों सदा कायम रहने से सदा शक्तिशाली स्वरूप दिखाई देंगे। सर्विस में सफलता प्राप्त करने लिए भी यह दो ताज आवश्यक हैं। फिर जितना-जितना नम्बरवार हरेक ने धारण किये हैं, उस प्रमाण स्वरूप में सफलता वा अपने पुरुषार्थ में सफलता पाते जा रहे हैं। तो डबल ताज भी चाहिए और डबल तख्त भी चाहिए। डबल तख्त कौन सा है? (हरेक ने अपना अपना रेसपान्स किया) एक तो बापदादा के दिल रूपी तख्त नशीन होना है। सभी से श्रेष्ठ तख्त तो बापदादा के दिल तख्तनशीन बनना ही है। साथ-साथ इस तख्त पर बैठने के लिए भी अचल, अड़ोल, एकरस स्थिति का तख्त चाहिए। अगर इस स्थिति के तख्त पर स्थित नहीं हो पाते तो बापदादा के दिल रूपी तख्त पर भी स्थित नहीं हो सकते हैं। इसलिए यह अचल, अड़ोल वा एकरस स्थिति का तख्त बहुत आवश्यक है। इस तख्त से बार-बार डगमग हो जाते हैं। इसलिए अपने अकाल तख्त नशीन न बनने के कारण इस एकरस स्थिति के तख्त पर भी स्थित नहीं हो सकते। तो अपने इस भृकुटि के तख्त पर अकालमूर्त बन स्थित होंगे तो एकरस स्थिति के तख्त पर और बापदादा के दिल तख्त पर विराजमान हो सकेंगे। तो डबल ताजधारी भी हो, डबल तख्तनशीन भी हो और जो नालेज मिल रही है वह नालेज भी मुख्य दो बातों की है। वह कौनसी है?
नालेज भी मुख्य दो बातों की मिलती है ना। ‘अल्फ' और ‘बे' कहो वा ‘रचयिता' और ‘रचना' कहो। रचना में पूरी नालेज आ जाती है। तो रचयिता और रचना - इन दोनों मुख्य बातों में अगर नालेजफुल हैं तो पावरफुल भी बन सकते हैं। अगर कोई रचना की नालेज में पूरा नालेजफुल नहीं हैं, कमजोर हैं तो स्थिति डगमग होती है। रचना की भी पूरी नालेज को जानना है, जानना सिर्फ सुनने को नहीं कहते। जानना अर्थात् मानना और चलना - इसको कहते हैं नालेजफुल। जो जानता, मानता और चलता भी है। अगर मानना और चलना नहीं है तो नालेजफुल वा ज्ञान-स्वरूप नहीं कहा जाता। चलना-मानना अर्थात् स्वरूप बनना। कुछ न कुछ रचयिता और रचना के नालेज की कमी हो जाने कारण पुरुषार्थ में कमी पड़ती है। इसलिए सारी नालेज की इन दो बातों को ध्यान में रखते हुए चलो। अच्छा, यह तो हुई नालेज। ऐसे ही डबल कर्तव्य में भी रहना है। यह डबल कर्तव्य कौन सा है? आज दो की गिनती ही सुना रहे हैं। दो कर्तव्य बताओ। सारे दिन में डबल कर्तव्य आपका चलता रहता है। मुख्य कर्तव्य है ही विनाश और स्थापना का। कुछ विनाश करना है और कुछ रचना रचनी है। रचना सभी प्रकार की रचते हो। एक तो सर्विस द्वारा अपनी राजधानी की रचना कर रहे हो और दूसरी करनी है बुद्धि में शुद्ध संकल्पों की रचना। और व्यर्थ संकल्पों वा विकल्पों के विनाश की विधि भी आप लोग समझ गये हो। रचना मनसा द्वारा भी और वाणी द्वारा भी दोनों प्रकार की रचना रचते हो। इसी प्रकार डबल कर्तव्य करते हो। इसी कार्य में सारा दिन बिजी रहें तो बताओ एकरस स्थिति नहीं हो सकती? एकरस स्थिति नहीं रहती उसका कारण रचना रचने नहीं आती वा विनाश करना नहीं आता। दोनों कर्तव्य में कमी होने कारण एकरस स्थिति ठहर नहीं सकती। इसलिए डबल कर्तव्य में रहना है। यह डबल कर्तव्य भी तब कर सकेंगे जब पोजीशन में रहेंगे। डबल पोजीशन कौन सा है? इस समय का पूछ रहे हैं। डीटी (देवत्व) से इस समय का गॉडली पोजीशन हाईएस्ट है। तो एक यह पोज़ीशन है कि गॉडली चिल्ड्रेन हैं, ब्रह्माकुमार कुमारियां भी हैं। यह हुआ साकारी पोजीशन और दूसरा है निराकारी पोजीशन। हम सभी आत्माओं से हीरो पार्टधारी आत्मायें, श्रेष्ठ आत्माएं हैं। और दूसरा पोजीशन है ईश्वरीय सन्तान ब्रह्माकुमार-कुमारीपन का। यह दोनों पोजीशन स्मृति में रहें तो कर्म और संकल्प दोनों ही श्रेष्ठ हो जायेंगे। श्रेष्ठ आत्मा अथवा हीरो अपने को समझने से ऐसा कोई व्यवहार नहीं करेंगे जो ईश्वरीय मर्यादाओं के वा ब्राह्मण कुल की मर्यादा के विपरीत हो। इसलिए यह दोनों पोजीशन स्मृति में होंगी तो माया की अपोजीशन खत्म हो जायेगी। इसलिए डबल पोजीशन भी सदैव स्मृति में रखो।
अच्छा, डबल निशाना कौन सा है? जो डबल नशा होगा वही डबल निशाना होगा। एक है निराकारी निशाना। सदैव अपने को निराकारी देश के निवासी समझना और निराकारी स्थिति में स्थित रहना। साकार में रहते हुए अपने को निराकारी समझ कर चलना। एक, सोल-कॉन्सेस वा आत्म-अभिमानी बनने का निशाना और दूसरा, निर्विकारी स्टेज जिसमें मनसा की भी निर्विकारीपन की स्टेज बनानी पड़ती है। तो एक है निराकारी निशाना और दूसरा है साकारी। तो निराकारी और निर्विकारी - यह हैं दो निशाना। सारा दिन पुरुषार्थ योगी और पवित्र बनने का करते हो ना? जब तक पूरी रीति आत्म-अभिमानी न बने हैं तो निर्विकारी भी नहीं बन सकते। तो निर्विकारीपन का निशाना और निराकारीपन का निशाना जिसको फरिश्ता कहो, कर्मातीत स्टेज कहो। लेकिन फरिश्ता भी तब बनेंगे जब कोई भी इमप्योरिटी अर्थात् पांच तत्वों की आकर्षण आकर्षित नहीं करेगी। जरा भी मनसा संकल्प भी इमप्यूअर अर्थात् अपवित्रता का न हो तब फरिश्तेपन की निशानी में टिक सकेंगे। तो यह डबल निशाना भी सदैव स्मृति में रखना। औरडबल प्राप्ति कौनसी हैं? अतीन्द्रिय सुख की प्राप्ति, उसमें शान्ति और खुशी समाई हुई है। यह हुआ संगमयुग का वर्सा। अभी जो प्राप्ति है वह फिर कभी भी प्राप्त नहीं हो सकती। तो डबल प्राप्ति है बाप और वर्सा। बाप की प्राप्ति भी सारे कल्प में नहीं कर सकते। और बाप द्वारा अभी जो वर्सा मिलता है वह भी सारे कल्प के अन्दर अभी ही मिलता है। फिर कभी भी नहीं मिलेगा। इस समय की प्राप्ति अतीन्द्रिय सुख और फुल नालेज फिर कभी भी नहीं मिल सकती। तो दो शब्दों में डबल प्राप्ति बाप और वर्सा। इसमें नालेज भी आ जाती है तो अतीन्द्रिय सुख भी आ जाता और रूहानी खुशी भी आ जाती। रूहानी शक्ति भी आ जाती है। तो यह है डबल प्राप्ति। समझा।
यह सभी दो-दो बातें धारण तब कर सकेंगे जब अपने को भी कम्बाइन्ड समझेंगे। एक बाप और दूसरा मैं, कम्बाइन्ड समझने से यह सभी दो-दो बातें सहज धारण हो सकती हैं। भट्ठी में आये हो ना तो यह सभी जो दो-दो बातें सुनाई वह अच्छी तरह से स्मृति स्वरूप भट्ठी से बनकर जाना। सिर्फ सुनकर नहीं जाना। सुना तो बहुत है। सुनना अर्थात् मानना और चलना अर्थात् स्वरूप बनना। तो ज्ञानी हो लेकिन ज्ञान स्वरूप बनकर जाना। योगी हो लेकिन योगयुक्त, युक्तियुक्त बनकर जाना। तपस्वी कुमार हो लेकिन त्याग-मूर्त भी बन जाना। त्याग-मूर्त के बिना तपस्वी मूर्त बन नहीं सकते। तो तपस्वी हो लेकिन साथ-साथ त्याग-मूर्त भी बनना है। ब्रह्माकुमार हो लेकिन ब्रह्माकुमार वा ब्राह्मणों के कुल की मर्यादाओं को जानकर मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर जाना। ऐसे मर्यादा पुरुषोत्तम बनो जो आपके एक एक संकल्प वायुमण्डल पर प्रभाव डालें ऐसे पावरफुल बनकर जाना। पावर है लेकिन पावरफुल बनकर जाना। जो फुल होता है वह कभी फेल नहीं होता। फुल की निशानी है - एक तो फील नहीं करेंगे, दूसरा फेल नहीं होगे और फ्लो नहीं होगा। तो फुल बनकर जाना, इसलिए भट्ठी में आये हो। क्या सीखना है? बहुत पाठ पढ़ा। इतना पाठ प्रैक्टिकल में पढ़कर जाना। पाठ ऐसा पक्का करना जो प्रैक्टिकल एक्टीविटी पाठ बन जाए। एक पाठ होता है मुख से पढ़ना, एक होता है सिखलाना। मुख से पढ़ाया जाता है, एक्ट से सिखाया जाता है। तो हर चलन एक-एक पाठ हो। जैसे पाठ पढ़ने से उन्नति को पाते हैं ना। इस रीति से आप सभी की एक-एक एक्ट ऐसा पाठ सभी को पढ़ाये वा सिखलाये जो उन्नति को पाते जायें। पढ़ना भी है और पढ़ाना भी है। सप्ताह का कोर्स तो सभी ने कर लिया है ना? साप्ताहिक कोर्स जो किया है वह फोर्स फुल किया है या सिर्फ कोर्स किया है? कोर्स का अर्थ ही है अपने में फोर्स भरना। अगर फोर्स नहीं भरा तो कोर्स भी क्या किया? निर्बल आत्मा से शक्तिशाली आत्मा बनने के लिए कोर्स कराया जाता है, तो अगर कोर्स का फोर्स नहीं है तो वह कोर्स हुआ? तो अभी फोर्स फुल कोर्स करने लिए आये हो ना।
डबल तिलकधारी भी बनना है। डबल तिलक कौन सा है? रोज अपना तिलक देखते हो? अमृतवेले जब ज्ञान स्नान करते हो तो तिलक भी लगाते हो? आत्मिक स्मृति वा स्वरूप का तिलक तो हो गया। दूसरा है निश्चय का तिलक। एक तो आत्मिक स्थिति का तिलक है और दूसरा हम विजयी रत्न हैं। हर संकल्प, हर कदम में विजय, सफलता भरी हुई हो। यह विजय का तिलक विक्टरी है। तो आप लोगों का तिलक है विजय का और विजयी रूप का। यह डबल तिलक सदैव स्मृति में रहे। स्मृति अर्थात् तिलकधारी बनना है। तो डबल तिलक को भी कभी भूलना नहीं है। मैं विजयी हूँ - इस स्मृति में रहने से कभी भी भिन्न-भिन्न परिस्थितियां हिला नहीं सकती। विजय हुई पड़ी है वर्तमान समय अपनी स्थिति डगमग होने कारण विजय अर्थात् सफलता में डगमग दिखाई देते हैं। लेकिन विजय हर कर्तव्य में हुई पड़ी है। जैसे कोई सीजन की खराबी होती है तो सीजन की खराबी के कारण टेलीविज़न में भी स्पष्ट दिखाई नहीं देता है, इस रीति से अपनी स्थिति की हलचल होने कारण विजय का अथवा सफलता का स्पष्ट अनुभव नहीं कर पाते हो। कारण क्या है! अपनी स्थिति की हलचल, स्पष्ट को भी अस्पष्ट बना देती है। उलझनों के कारण उज्जवल नहीं बन सकते हो। इसलिए अपनी स्थिति की हलचल नहीं होगी तो स्मृति क्लीयर होगी। वह होती है सीजन क्लीयर, यह है स्मृति क्लीयर। अगर स्मृति क्लीयर है तो सफलता भी क्लीयर रूप में दिखाई देगी। अगर स्मृति क्लीयर नहीं वा अपने ऊपर पूरी केयर नहीं, केयरफुल कम होने कारण रिजल्ट भी फुल नहीं दिखाई देती। जितना अपने ऊपर केयर रखते हो उतना क्लीयर होते हो और इतना ही सफलता अपने पुरुषार्थ में वा सर्विस में स्पष्ट और समीप दिखाई देगी। नहीं तो न स्पष्ट दिखाई देती है, न समीप दिखाई देती है। टेलीविज़न में दूर का दृश्य समीप और स्पष्ट भी होता है ना। इस रीति से एकरस स्थिति होने कारण, केयरफुल और क्लीयर होने कारण सफलता समीप और स्पष्ट दिखाई देगी। समझा? अगर दोनों से एक की भी कमी होगी तो सफलता अनुभव नहीं करेंगे। फिर उलझेंगे। फिर कमजोरी की भाषा होती है कि “क्या करें, यह कैसे होगा'' - यह भाषा हो जाती है। इसलिए दोनों ही बातें धारण करके जायेंगे तो सफलतामूर्त बन जायेंगे सफलता इतनी समीप आयेगी, जैसे गले में माला कितनी समीप आ जाती है। तो सफलता भी गले की माला बन जायेगी। अच्छा।