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27 Apr 1972
“लकी और लवली बनने का पुरुषार्थ”
27 April 1972 · हिंदी
अपने को लवलीएस्ट और लकीएस्ट दोनों समझते हो? लवली भी हो और लकी भी हो, यह दोनों ही अपने में समझते हो तो सदा निर्विघ्न, लगन में मगन अवस्था का अनुभव करेंगे। अगर सिर्फ लक्की हैं लेकिन लवली नहीं हैं तो भी सदा लगन में मगन रहेंगे लेकिन निर्विघ्न अवस्था का अनुभव नहीं करेंगे। और सिर्फ लवली हैं, लक्की नहीं तो भी जो अवस्था सुनाई उसका अनुभव नहीं कर पायेंगे। इसलिए दोनों की आवश्यकता है। लवली और लक्की - दोनों की प्राप्ति के लिए मुख्य तीन बातें आवश्यक हैं। अगर वह तीनों बातें अपने में अनुभव करेंगे तो लक्की और लवली जरूर होंगे। वह तीन बातें कौन-सी हैं जिससे सहज ही यह दोनों स्थिति अनुभव कर सकते हो? लक को बनाया भी जा सकता है वा बना हुआ होता है? अपने को लक्की बना सकते हो वा पहले से जो लक्की बने हुए हैं वही बन सकते हैं? अपनी लक बनाई जा सकती है वा बनी हुई के ऊपर चलना होता है? तकदीर को चेन्ज कर सकते हो वा नहीं? अनलक्की से लक्की बन सकते हो? लक बनाने के लिए पुरुषार्थ की मार्जिन है? (हाँ) तकदीर जगाकर आये हो वा तकदीर जगाने के लिए आये हो? तकदीर जो जगी हुई है वह साथ ले आये हो ना, फिर क्या बनायेंगे? तकदीर जो जगाकर आये हैं उस अनुसार ही बाप के बने लेकिन बाप के बनने में ही तकदीर की बात है ना। तकदीर बनाकर भी आये हैं और बना भी सकते हैं, ऐसे? जब कोई बात पर ज्यादा पुरुषार्थ कर लेते हो तो अपने अन्दर से कब संकल्प आता है कि मेरी तकदीर में तो यही देखने में आता है? पुरुषार्थ के बाद भी सफलता नहीं होती है तो समझते हो ना - तकदीर में यह ऐसा है। सफलता न मिलने का कारण क्या है? अपनी रीति से पुरुषार्थ किया फिर भी सफलता नहीं मिलती तो फिर क्या कहते हो? ड्रामा में ऐसा ही है। तो ड्रामा का बना हुआ लक ही ले आये हो ना? पुरुषार्थी को कभी भी यह समझना नहीं चाहिए कि मेरे पुरुषार्थ करने के बाद कोई असफलता भी हो सकती है। सदैव ऐसा ही समझना चाहिए कि पुरुषार्थ जो किया वह कभी भी व्यर्थ नहीं जा सकता। अगर सही प्रकार से पुरुषार्थ किया तो उसकी सफलता अब नहीं तो कब मिलनी जरूर है। असफलता का रूप देखकर समझना है कि यह परीक्षा है, इससे पार होने के बाद परिपक्वता आने वाली है। तो वह असफलता नहीं है लेकिन अपने पुरुषार्थ के फाउन्डेशन को पक्का करने का एक साधन है। कभी भी कोई चीज को मजबूत करना होता है तो पहले उसके फाउन्डेशन को ठोका जाता है, ठोक-ठोक कर पक्का किया जाता है। वह ठोकना ही परिपक्वता का साधन है। तो कब भी अपने व्यक्तिगत पुरुषार्थ में वा संगठन के सम्पर्क में वा ईश्वरीय सेवा में - तीनों प्रकार के पुरुषार्थ में बाहर का रूप असफलता का दिखाई भी दे तो ऐसे ही समझना चाहिए कि यह असफलता नहीं लेकिन परिपक्वता का साधन है। जैसे सुनाया था कि तूफान को तूफान न समझकर एक तोह़फा समझना चाहिए। नइया में झोंके आते हैं लेकिन वह आगे बढ़ाने का एक साधन है। इसी प्रकार असफलता में सफलता समाई हुई है, यह समझ कर आगे बढ़ना चाहिए। ‘असफलता' शब्द ही बुद्धि में नहीं आना चाहिए अगर पुरुषार्थ सही है तो। अच्छा!
सुना रहे थे कि लक्की और लवली बनने के लिए तीन बातें आवश्यक हैं वह कौन-सी? पहले सोचो - लक कैसे बन सकता है? अपने को ही देख लो कि हम लक्की, लवली हैं? अपने लक को क्यों नहीं जगा सकते हो? उसका मूल कारण, नॉलेजफुल नहीं हो। नॉलेजफुल में सभी प्रकार की नॉलेज आ जाती है। जितना जो नॉलेजफुल होगा उतना लकी जरूर होगा। क्योंकि नॉलेज की लाइट और माइट से आदि-मध्य-अन्त को जानकर जो भी पुरुषार्थ करेगा उसमें उनको सफलता अवश्य प्राप्त होगी। सफलता प्राप्त होना, यह एक लक की निशानी है। एक तो वह नॉलेजफुल होगा अर्थात् फुल नॉलेज होगी। फुल में अगर कोई भी कमी है तो लकीएस्ट में भी नम्बरवार है। नॉलेजफुल है तो लकीएस्ट भी नम्बर वन होगा। कर्म की भी नॉलेज होती है और अपनी रचयिता और रचना की भी नॉलेज होती है। चाहे परिवार, चाहे ज्ञानी आत्माओं के सम्पर्क में कैसे आना चाहिए, उसकी भी नॉलेज होती है। नॉलेज सिर्फ रचयिता और रचना की नहीं लेकिन नॉलेजफुल अर्थात् हर संकल्प और हर शब्द, हर कर्म में ज्ञान स्वरूप होगा - उनको ही नॉलेजफुल कहते हैं। दूसरी बात - जितना नॉलेजफुल होगा उतना ही केयरफुल भी होगा। जितना केयरफुल होगा उतना ही उसकी निशानी चियरफुल (हर्षित) होगा। अगर कोई चियरफुल नहीं तो भी लवली नहीं लगेगा। अगर कोई केयरफुल नहीं तो भी लवली नहीं लगेगा।
जो केयरफुल नहीं रहता है उनसे समय-प्रति-समय स्वयं के वा दूसरों के सम्पर्क में आने से कोई न कोई छोटी-बड़ी भूल होने कारण न स्वयं लवली रहेगा, न दूसरों का लवली बन सकेगा। इसलिए जो केयरफुल होगा वह चियरफुल जरूर होगा। ऐसा नहीं समझना कि केयरफुल जो होगा वह अपने पुरुषार्थ में अधिक मगन होने कारण चियरफुल नहीं रह सकता, ऐसी बात नहीं है। केयरफुल की निशानी चियरफुल है। तो यह तीनों ही क्वालिफिकेशन वा बातें अगर हैं तो लक्की और लवली दोनों बन सकते हैं। एक-दो के सहयोग से भी अपने लक को बना सकते हो। लेकिन एक-दो का सहयोग तब मिलेगा जब केयरफुल और चियरफुल होंगे। अगर चियरफुल नहीं तो सक्सेसफुल भी नहीं होंगे। केयरफुल और चियरफुल है तो सक्सेसफुल अर्थात् लक्की है। तो यह तीन बातें अपने आप में देखो, अगर तीनों ही ठीक परसेन्टेज में हैं तो समझो हम लक्की और लवलीएस्ट दोनों हैं, अगर परसेन्टेज में कमी है तो फिर यह स्टेज नहीं हो सकती है। अब समझा, निशानी क्या है? मुख से ज्ञान सुनाना इतना प्रभाव नहीं डाल सकता है। सदैव चियरफुल चेहरा रहे, दु:ख की लहर संकल्प में भी न आये - इसको कहा जाता है चियरफुल। तो अपने चियरफुल चेहरे से ही सर्विस कर सकते हो। जैसे चुम्बक के तरफ ऑटोमेटिकली आकर्षित होकर लोहा जायेगा, इसी प्रकार सदा चियरफुल स्वयं ही चुम्बक का स्वरूप बन जाता है। उनको देखते ही सभी समीप आयेंगे। समझेंगे आज की दुनिया में जबकि चारों ओर दु:ख और अशान्ति के बादल छाये हुए हैं, ऐसे वायुमण्डल में यह सदा चियरफुल रहते हैं। यह क्यों और कैसे रहते हैं, वह देखने की उत्कण्ठा होगी। जैसे जब बहुत तूफान लगते हैं वा वर्षा पड़ती है तो उस समय लोग जहाँ बारिश-तूफान से बचाव देखते हैं, वहाँ न चाहते भी भागते हैं। स्थान कोई बुलाता नहीं है, लेकिन वायुमण्डल प्रमाण वह सेफ्टी का साधन है तो लोग जरूर वहाँ भागेंगे। अपने आपको बचाने के लिए उस स्थान का सहारा लेते हैं। खिंच कर आ जाते हैं ना। तो ऐसे ही समझो - वर्तमान समय चारों ओर माया के तूफान और दु:ख के बादल गरज रहे हैं। ऐसे समय में सेफ्टी के साधन को देख आपकी तरफ आकर्षित होंगे। वह आकर्षित करने वाला बाहर का रूप कौन-सा है? चियरफुल चेहरा। तो लवली और लक्की दोनों होना चाहिए। कहाँ-कहाँ नॉलेजफुल हैं, केयरफुल भी हैं लेकिन चियरफुल नहीं। केयर करते हैं, केयर करते-करते चेयर छोड़ देते हैं, तो चियरफुल नहीं बन सकते हैं। इसलिए जो दोनों का होना चाहिए वो नहीं होता। दोनों ही अपने में धारण करना चाहिए। उसके लिए मुख्य पुरुषार्थ वा अटेन्शन वा केयर किस बात में रहे जो यह तीनों बातें सहज ही अपने में ला सको, वह जानते हो? केयरफुल तो होना ही है लेकिन मुख्य केयर किस बात की रखनी है? केयरफुल किन-किन बातों में होते हैं? (भिन्न-भिन्न उत्तर मिले) बाप ने क्या केयर किया जिससे ऐसा बना? वह मुख्य बात कौन-सी है? आप लोगों की जो महिमा गाई जाती है, वह पूरी वर्णन करो - सर्व गुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी, मर्यादा पुरुषोतम...। जब मर्यादाओं का उल्लंघन होता है तब ही केयरलेस होते हो। आप लोगों के सम्पूर्ण स्टेज का जो गायन है, जैसे सीता को मर्यादा की लकीर के अन्दर रहने की आज्ञा दी, और कोई लकीर नहीं थी लेकिन यह मर्यादा ही लकीर है। अगर ईश्वरीय मर्यादाओं की लकीर से बाहर निकल जाते हैं तो फ़कीर बन जाते हैं अर्थात् जो भी कोई प्राप्ति है उससे भिखारी, फ़कीर बन जाते हैं। फिर चिल्लाते हैं जैसे फ़कीर चिल्लाते हैं - दो पैसा दे दो, कपड़ा दे दो...। ऐसे ही जो मर्यादा की लकीर का उल्लंघन करते हैं उनकी स्थिति फ़कीर के समान बन जाती है। वह कहेंगे - कृपा करो, आशीर्वाद करो, सहयोग दो, स्नेह दो। तो गोया फ़कीर हो गये ना। लेकिन मेरा अधिकार है, उनको कहेंगे बालक और मालिकपन। अधीन होकर मांगना, फिर कोई भी चीज मांगने वाले को फ़कीर ही कहा जाता है। तो यह जो मर्यादाओं की लकीर है, उससे अगर बाहर निकलते हो तो फ़कीर बन जाते हो। फिर मदद लेनी पड़ती है। वैसे तो जो भी बाप के बच्चे बने हैं तो लक्की भी हैं, लवली भी हैं। वह स्वयं ईश्वरीय कार्य में मददगार हैं, न कि मदद लेने वाले हैं। आप लोगों का मददगार बनने का चित्र भी है, मदद मांगने का नहीं है। भक्तों का चित्र मांगने का ही होता है। बालक सो मालिक जो हैं वह सदैव मददगार हैं। जो स्वयं ही मददगार हैं, वह मदद मांग नहीं सकते, वह देने वाले हैं न कि लेने वाले। दाता कब लेता नहीं है, दाता देने वाला होता है। तो अपने आपको एक ही बाप अर्थात् राम की सच्ची सीता समझकर सदा मर्यादाओं की लकीर के अन्दर रहें अर्थात् यह केयर करें तो केयरफुल रहेंगे। केयरफुल से ऑटोमेटिकली चियरफुल बनेंगे। तो वह मर्यादायें क्या-क्या हैं, वह सभी बुद्धि में रहनी चाहिए।
सवेरे से रात तक कौन-कौनसी मर्यादायें किस-किस कर्म में रखनी हैं, वह सभी नॉलेज स्पष्ट होनी चाहिए। अगर नॉलेज नहीं तो केयरफुल भी नहीं हो सकते। तो सीता समझ करके इस लकीर के अन्दर रहो अर्थात् जो केयरफुल होगा, मर्यादाओं की लकीर के अन्दर रहेगा वही पुरुषोतम बन सकता है। जब देखो चियरफुल नहीं रहते हैं तो अवश्य कोई मर्यादा का उल्लंघन किया है। मर्यादा संकल्प के लिए भी है। व्यर्थ संकल्प भी नहीं करना है। अगर इस लकीर से बाहर व्यर्थ संकल्प-विकल्प उत्पन्न होते हैं तो मानों संकल्प में मर्यादाओं को उल्लंघन किया तब चियरफुल नहीं हैं। ऐसे ही मुख से क्या बोल बोलना है और किस स्थिति में स्थित होकर मुख से बोलना है, यह है मर्यादा वाणी के लिए। अगर वाणी में भी कोई उल्लंघन होता है तो चियरफुल नहीं रहते। अपने व्यर्थ संकल्प, विकल्प ही अपने को चियरफुल स्टेज से गिरा देते हैं क्योंकि मर्यादा का उल्लंघन किया। अगर मर्यादा की लकीर के अन्दर सदा अपने को रखो तो यह रावण अर्थात् माया अथवा विघ्न इसी मर्यादा की लकीर के अन्दर आने की हिम्मत नहीं रख सकते। कोई भी विघ्न अथवा तूफान, परेशानी वा उदासाई आती है तो समझना चाहिए - कहाँ न कहाँ मर्यादाओं की लकीर से अपने बुद्धि रूपी पांव को निकाला है। जैसे सीता ने पांव निकाला। बुद्धि भी पांव है जिससे यात्रा करते हो। तो बुद्धि रूपी पांव जरा भी मर्यादाओं की लकीर से बाहर निकालते हो, तब यह सभी बातें आती हैं और क्या बना देती हैं? बाप के लक्की और लवली को फ़कीर बना देती हैं। फ़कीर बनने की निशानी - एक तो आत्माओं से, बाप से सहारा मांगेंगे। अपना ख़ज़ाना जो शक्तियां हैं वह खत्म हो जायेंगी। कहावत है - लकीर के फ़कीर। तो ऐसा जो फ़कीर बनता है वह लकीर के भी फ़कीर होते हैं। वह शक्तिशाली स्टेज खत्म हो जाती है। भले ज्ञान बोलता रहेगा, पुरुषार्थ करता रहेगा परन्तु लकीर के फ़कीर के समान। अपनी प्राप्ति का नशा वा शक्ति जो होनी चाहिए वह नहीं रहेगी। भक्ति मार्ग में भी लकीर के फ़कीर होते हैं ना। तो ऐसे मर्यादाओं के लकीर को उल्लंघन करने वाले दोनों प्रकार के फ़कीर बन जाते हैं। इसलिए कभी भी फ़कीर नहीं बनना। इस समय जो विश्व के बादशाह बनेंगे उनके भी बादशाह हो। जैसे राजाओं का राजा कहा जाता है, वह तो विश्व के राजा जब बनेंगे उस समय की स्टेज को राजाओं का राजा कहा जाता है लेकिन इस समय ब्राह्मणपन की जो स्टेज है वा डायरेक्ट बाप द्वारा नॉलेजफुल बनने की स्टेज ऊंच है, तो ऐसे स्टेज को छोड़ कर फ़कीर बनना शोभता तो नहीं है ना? इसलिए हर संकल्प और कर्म में यह चेक करो अर्थात् केयर करो - बाहर तो नहीं निकलते? ऐसे अपने को मर्यादा पुरुषोत्तम बनाओ। ऐसे मर्यादा पुरुषोत्तम बनने के तीव्र पुरुषार्थी, नॉलेजफुल, केयरफुल और चियरफुल श्रेष्ठ आत्माओं को नमस्ते। अच्छा!